बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों पर होने वाले चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है. महागठबंधन, विशेषकर आरजेडी (RJD) के लिए मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) ने साफ कर दिया है कि वह राज्यसभा चुनाव में आरजेडी या महागठबंधन के उम्मीदवार का समर्थन नहीं करेगी. इस फैसले ने तेजस्वी यादव की रणनीतियों को बड़ा झटका दिया है.
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'हम किसी की सवारी नहीं': अख्तरुल ईमान का कड़ा रुख
AIMIM के बिहार प्रदेश अध्यक्ष और विधायक अख्तरुल ईमान ने मीडिया से बात करते हुए दोटूक लहजे में कहा कि उनकी पार्टी किसी का पिछलग्गू नहीं बनेगी. उन्होंने कहा, 'लोगों को लगता है कि हम कोई सवारी हैं जिस पर कोई भी सवार हो जाएगा. हम खुद अपना उम्मीदवार राज्यसभा चुनाव में उतारने जा रहे हैं.' ईमान ने यहां तक कह दिया कि अगर आरजेडी वाकई सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ना चाहती है, तो उसे ओवैसी के उम्मीदवार का समर्थन करना चाहिए.
राज्यसभा का गणित
बिहार में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 41 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है. वर्तमान संख्या बल को देखें तो महागठबंधन के पास अभी केवल 35 विधायक हैं. यदि उन्हें AIMIM के 5 विधायकों और बसपा (BSP) के 1 विधायक का समर्थन मिल जाता, तब जाकर उनका आंकड़ा 41 तक पहुंचता और वे एक सीट जीत सकते थे. लेकिन AIMIM के इनकार के बाद महागठबंधन के लिए एक भी सीट जीतना नामुमकिन जैसा लग रहा है.
एनडीए की स्थिति मजबूत, पांचों सीटों पर नजर
दूसरी ओर, एनडीए (NDA) के पास विधायकों की संख्या काफी अधिक है. बिहार विधानसभा में एनडीए के पास 202 सीटें हैं. गणित के हिसाब से एनडीए की चार सीटें तो पूरी तरह सुरक्षित हैं, लेकिन पांचवीं सीट के लिए भी उनके पास 38 अतिरिक्त विधायक बच रहे हैं. यदि तीन अन्य विधायकों (चाहे वे निर्दलीय हों या किसी अन्य दल के) का समर्थन एनडीए को मिल जाता है, तो पांच की पांचों सीटें एनडीए के खाते में जा सकती हैं.
किनका कार्यकाल हो रहा है खत्म?
बिहार से राज्यसभा के पांच सांसदों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, जिनमें बड़े नाम शामिल हैं:
आरजेडी: प्रेमचंद गुप्ता और एडी सिंह.
जेडीयू: हरिवंश नारायण सिंह और रामनाथ ठाकुर.
आरएलएम: उपेंद्र कुशवाहा.
क्या होगी कांग्रेस में टूट?
सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि क्या इस चुनाव के दौरान कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों में कोई बड़ी टूट देखने को मिलेगी. जिस तरह से ओवैसी की पार्टी ने हाथ खींच लिए हैं, उससे तेजस्वी यादव के लिए अपनी एक भी सीट बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है. अब देखना यह होगा कि क्या आरजेडी कोई नया गठबंधन फार्मूला निकाल पाती है या फिर एनडीए बिहार में क्लीन स्वीप करने में सफल रहती है.
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