बिहार में अब खत्म हो जाएगी शराबबंदी? होली से पहले NDA के अंदर ही उठी समीक्षा की मांग, क्या सहयोगियों के आगे झुकेंगे नीतीश कुमार?
Bihar liquor ban news: बिहार में 9 साल से लागू शराबबंदी कानून पर फिर सियासी हलचल तेज हो गई है. होली से पहले नीतीश कुमार की सरकार पर NDA सहयोगियों का दबाव बढ़ रहा है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर समीक्षा की मांग उठने से राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं.जानिए शराबबंदी पर ताजा राजनीतिक अपडेट और संभावित बदलाव.

बिहार में पिछले 9 सालों से लागू पूर्ण शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है. चर्चा इस बात की है कि क्या होली से पहले नीतीश सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार करेगी? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि विपक्षी दलों के अलावा अब एनडीए (NDA) के सहयोगी दलों ने भी खुलकर शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग शुरू कर दी है.
एनडीए सहयोगियों का बढ़ता दबाव
शराबबंदी को लेकर अब तक पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ही मुखर रहते थे, लेकिन अब उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी (RLM) ने भी इस सुर में सुर मिला लिया है. आरएलएम विधायक माधव आनंद ने सदन में बड़ी ही विनम्रता से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से आग्रह किया है कि अब वक्त आ गया है जब शराबबंदी कानून की व्यापक पैमाने पर विस्तृत समीक्षा होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि एक अर्थशास्त्री होने के नाते वे मानते हैं कि हर कानून का आकलन जरूरी है कि उससे राज्य को क्या मिला और क्या खोया.
राजस्व का भारी नुकसान और बढ़ती तस्करी
शराबबंदी के आर्थिक पहलुओं पर गौर करें तो आंकड़े चौंकाने वाले हैं. साल 2010 से 2015 के बीच बिहार सरकार को शराब की बिक्री से हर साल औसतन 4000 से 5000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था. शराबबंदी के बाद यह आय पूरी तरह खत्म हो गई है, जबकि राज्य के खर्चों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इसके अलावा, राज्य के सीमावर्ती इलाकों (नेपाल, यूपी, बंगाल और झारखंड) से अवैध शराब की तस्करी एक बड़ी चुनौती बन गई है.
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सरकार का पक्ष: 16 लाख गिरफ्तारियां और करोड़ों की शराब जब्त
विधान परिषद में ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी ने शराबबंदी से जुड़े जो आंकड़े पेश किए, वे इस कानून की सख्ती को दर्शाते हैं. उन्होंने बताया कि 2016 से अब तक लगभग 10 लाख केस दर्ज किए गए हैं. साथ ही 16 लाख लोगों की गिरफ्तारी, 4 करोड़ लीटर से ज्यादा शराब जब्ती और 1.6 लाख वाहनों को जब्त किया गया है. मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार संवेदनशील है और पुलिस व्यवस्था के साथ मिलकर ड्रग्स और शराब के खिलाफ अभियान जारी रखेगी.
सामाजिक लाभ बनाम जहरीली शराब का खतरा
नीतीश कुमार के लिए शराबबंदी कानून हमेशा से एक सामाजिक सुधार का बड़ा कदम रहा है. शुरुआती वर्षों में घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न के मामलों में 12 से 18% तक की गिरावट देखी गई थी. यही वजह है कि महिला वोट बैंक नीतीश कुमार के साथ मजबूती से खड़ा रहा है. हालांकि, शराबबंदी के बाद जहरीली शराब से होने वाली मौतों की घटनाओं ने सरकार की चिंता बढ़ाई है. छपरा जैसी घटनाएं इस कानून की विफलता की ओर इशारा करती हैं.
क्या बदलेगी नीतीश सरकार की नीति?
फिलहाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने फैसले पर अडिग नजर आ रहे हैं, लेकिन 2026 के राजनीतिक समीकरण थोड़े अलग हैं. भाजपा (BJP) इस बार गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में है और सहयोगी दलों का दबाव लगातार बढ़ रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि भले ही शराबबंदी पूरी तरह खत्म न हो, लेकिन आने वाले समय में इसके कड़े नियमों में कुछ ढील या बड़े संशोधनों पर विचार किया जा सकता है.
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