दीपक प्रकाश को क्या सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा की टकराहट की वजह से नहीं मिला टिकट? जानें अंदर की कहानी

Bihar MLC Election: बिहार की राजनीति में बीजेपी के एमएलसी उम्मीदवार के ऐलान के बाद नई सियासी चर्चा छिड़ गई है. सवाल उठ रहा है कि क्या उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और पूर्व मंत्री दीपक प्रकाश को टिकट नहीं मिलने के पीछे बीजेपी की अंदरूनी गुटबाजी, सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा के बीच खींचतान या फिर जातीय समीकरण जिम्मेदार हैं? जानिए पूरी कहानी.

Bihar MLC Election Controversy
Bihar MLC Election Controversy

इन्द्र मोहन

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बिहार की राजनीति में इन दिनों एमएलसी चुनाव और मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर हलचल तेज है. हाल ही में भारतीय जनता पार्टी ने एमएलसी की एक खाली सीट के लिए सूर्य कुमार शर्मा उर्फ अरविंद शर्मा को अपना उम्मीदवार घोषित किया है. इस घोषणा के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और पूर्व मंत्री दीपक प्रकाश का क्या होगा? पहले यह कयास लगाए जा रहे थे कि मंगल पांडे द्वारा छोड़ी गई सीट पर दीपक प्रकाश को मौका मिलेगा, लेकिन बीजेपी के इस फैसले ने सबको चौंका दिया है. विस्तार से जानिए अंदर की बात.

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क्या उपेंद्र कुशवाहा के साथ हुआ खेल या है कोई दूसरी रणनीति?

बीजेपी द्वारा अरविंद शर्मा को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या पार्टी ने उपेंद्र कुशवाहा को किनारे लगा दिया है. हालांकि, फ्लैशबैक में जाएं तो बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी, जिसमें आरएलएम को 6 विधानसभा सीटें और एक एमएलसी सीट देने का वादा किया गया था. इसी वादे के तहत नवंबर में सरकार बनते ही दीपक प्रकाश को मंत्री बनाया गया था. नियम के मुताबिक मंत्री बने रहने के लिए 6 महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य होना अनिवार्य है, इसलिए माना जा रहा था कि वह मंगल पांडे की खाली सीट से एमएलसी बनेंगे. लेकिन बीजेपी के ताजा फैसले ने फिलहाल इन अटकलों पर विराम लगा दिया है.

सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा के बीच की अदावत और जातीय समीकरण

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दीपक प्रकाश को इस सीट से टिकट न मिलने के पीछे बीजेपी की आंतरिक गुटबाजी और जातीय समीकरण भी एक बड़ी वजह हो सकते हैं. मंगल पांडे द्वारा छोड़ी गई सीट सवर्ण कोटे की थी. बिहार में जब सम्राट चौधरी की सरकार बनी, तब बीजेपी के भीतर उनके और विजय सिन्हा (जो सवर्ण समाज से आते हैं) के बीच की खींचतान चर्चा में रही. ऐसे में किसी सवर्ण की सीट को काटकर अगर दीपक प्रकाश को दी जाती, तो सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री रहते हुए एक नया विवाद खड़ा हो सकता था. इसके अलावा, मंगल पांडे की सीट का कार्यकाल मात्र 4 साल ही बचा था, जिसे दीपक प्रकाश के लिए पूर्णकालिक अवसर नहीं माना जा रहा था.

क्या कहती है एनडीए की रणनीति?

दीपक प्रकाश के लिए रास्ते अभी बंद नहीं हुए हैं. बिहार में जल्द ही एमएलसी की 11 अन्य सीटों पर चुनाव होने वाले हैं. खास बात यह है कि इनमें से एक सीट खुद सम्राट चौधरी की भी है, जिनका कार्यकाल पूरा हो रहा है. सूत्रों की मानें तो दीपक प्रकाश इसी कोटे से चुनावी मैदान में उतर सकते हैं. जेडीयू विधायक दल के नेता श्रवण कुमार ने भी संकेत दिए हैं कि आगे और चुनाव होने वाले हैं और एनडीए नेतृत्व सही समय पर सही फैसला लेगा. चूंकि नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद कैबिनेट भंग हो चुकी है, इसलिए दीपक प्रकाश के पास नई कैबिनेट में शपथ लेने के बाद फिर से 6 महीने का समय होगा, जिसके भीतर वह एमएलसी बन सकते हैं.

कौन हैं दीपक प्रकाश और क्यों हैं चर्चा में?

दीपक प्रकाश आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं. 2025 में जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी थी, तब उन्हें आरएलएम कोटे से मंत्री बनाया गया था. उस समय विपक्ष ने परिवारवाद के आरोप भी लगाए थे. हालांकि, बिना एमएलसी बने ही सरकार गिरने से उनका कार्यकाल फिलहाल खत्म हो गया है. अब सम्राट चौधरी की नई कैबिनेट में उन्हें फिर से जगह मिलने की पूरी संभावना है. बीजेपी के पुराने वादों और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह लगभग तय माना जा रहा है कि बीजेपी अपना वादा निभाएगी और दीपक प्रकाश न केवल मंत्री बनेंगे बल्कि आगामी एमएलसी चुनावों में सदन के सदस्य भी चुने जाएंगे.

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