MLC नहीं, विधायक भी नहीं... ऐसे में कब तक मंत्री रह सकते हैं दीपक प्रकाश? जानिए क्या कहता है संविधान और क्या हैं विकल्प

Deepak Prakash Minister: बिहार विधान परिषद चुनाव में एनडीए की सूची से दीपक प्रकाश का नाम गायब रहने के बाद उनके मंत्री पद पर बने रहने को लेकर संकट खड़ा हो गया है. आखिर बिना विधायक या विधान पार्षद बने कोई मंत्री कितने दिन तक पद पर रह सकता है? संविधान क्या कहता है और अब उपेंद्र कुशवाहा के सामने कौन-कौन से राजनीतिक विकल्प बचे हैं? चलिए जानते हैं इस खबर मेें...

दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर मंडराया संकट
दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर मंडराया संकट

शशि भूषण कुमार

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Deepak Prakash News: बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए 10 उम्मीदवारों के नामांकन की प्रक्रिया 8 जून को पूरी हो गई. आज सभी उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों की जांच होगी और अगर सभी के नामांकन सही पाए गए तो 11 जून को उम्मीदवारों के नाम वापसी की समय सीमा खत्म होने के बाद सभी 10 उम्मीदवार निर्विरोध विधान परिषद के लिए निर्वाचित हो जाएंगे. जिन चेहरों का विधान परिषद जाना लगभग तय है उनमें भाजपा के चार, जदयू के चार, एलजेपीआर के एक और राजद के एक उम्मीदवार शामिल हैं. 7 मई को सम्राट कैबिनेट के विस्तार में मंत्री पद की शपथ लेने वाले निशांत कुमार भी विधान परिषद के लिए निर्वाचित हो जाएंगे लेकिन उनके साथ कैबिनेट मंत्री की शपथ लेने वाले उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश के मंत्री बने रहने पर संकट खड़ा हो गया है. ऐसे में चलिए जानते है कि दीपक प्रकाश कब तक मंत्री बने रह सकते हैं क्या क्या कहता है सविधान.

उपेंद्र कुशवाहा की रणनीति और एनडीए की लिस्ट से दीपक का नाम गायब

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दरअसल, उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में बनने वाली नीतीश कैबिनेट में मंत्री बनवाया था. नवंबर 2025 में दीपक पहली दफे राज्य कैबिनेट में मंत्री बने लेकिन वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. उस वक्त भी उनके सामने इस बात की बाध्यता थी कि वह 6 महीने के अंदर किसी सदन के सदस्य निर्वाचित हों. उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा के विधायक बनने के बावजूद बेटे के राजनीतिक भविष्य को ऊंचाई देने के लिए उन्हें मंत्री बनवाया. दीपक नीतीश कैबिनेट में पहली दफा शामिल हुए तो उन्हें पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी दी गई लेकिन नीतीश कुमार ने जब इस साल राज्यसभा जाने का फैसला किया तो बिहार में नए सिरे से सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू हुई.

नहीं रहे किसी सदन के सदस्य फिर भी दो बार बने मंत्री

नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा के बाद राज्य में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बना. सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उसके बाद 7 मई को हुए कैबिनेट विस्तार में एक बार फिर दीपक प्रकाश को आरएलएम कोटे से मंत्री बनाया गया. ऐसा दूसरी बार हुआ है कि किसी सदन का सदस्य नहीं होने के बावजूद दीपक प्रकाश राज्य कैबिनेट में शामिल हुए. तब उम्मीद जताई गई थी कि जून महीने में होने वाले विधान परिषद चुनाव में दीपक प्रकाश एनडीए की तरफ से उम्मीदवार होंगे. उपेंद्र कुशवाहा ने शायद इसी उम्मीद में दीपक प्रकाश को कैबिनेट में जगह दिलवाई लेकिन एनडीए के 9 उम्मीदवारों की लिस्ट में उनके बेटे का नाम शामिल नहीं रहा. 8 जून को नामांकन की समय सीमा खत्म होने के बाद कुशवाहा भी इस बात को समझ चुके थे कि उनके बेटे के लिए अब सदन का सदस्य बनना आसान नहीं होगा.

बिना किसी सदन का सदस्य बने इस तारीख तक रह सकते है मंत्री

दीपक प्रकाश ने दूसरी बार 7 मई 2026 को मंत्री पद की शपथ ली थी. बिना किसी सदन का सदस्य बने वे 6 महीना यानी 6 नवंबर 2026 तक मंत्री रह सकते हैं. लेकिन मौजूदा विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनने के बाद अब आगे इस 6 महीने के दौरान एमएलसी होने की कोई गुंजाइश नहीं नजर आती. विधान परिषद की इस चुनावी प्रक्रिया के बाद बिहार के राज्यपाल द्वारा मार्च 2027 में परिषद के कुछ सदस्यों का मनोनयन होना है लेकिन तबतक दीपक प्रकाश कैबिनेट में बने नहीं रह पाएंगे. संवैधानिक बाध्यता के मुताबिक 7 मई को मंत्री पद की शपथ लेने वाले दीपक प्रकाश 6 नवंबर 2026 के बाद मंत्री नहीं रहेंगे.

नीतीश सरकार में दीपक प्रकाश 5 माह तक मंत्री रहे थे. इस बीच बिहार में विधानसभा का उपचुनाव केवल एक सीट पर होना है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद और राज्यसभा जाने के बाद नितिन नवीन के इस्तीफा के बाद खाली हुई बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना है लेकिन इस बात की उम्मीद बिल्कुल नहीं कि बीजेपी अपनी इस सीटिंग सीट पर दीपक प्रकाश को मौका दे.

उपेंद्र कुशवाहा की बीजेपी के साथ 'डील' पर सस्पेंस

8 जून को विधान परिषद उम्मीदवारों के लिए नामांकन की समय सीमा खत्म होने के बाद उपेंद्र कुशवाहा से उनके बेटे दीपक प्रकाश के मंत्री बने रहने को लेकर सवाल किया गया था, जवाब में उन्होंने इसे विचित्र सवाल बताकर कन्नी काट ली. कुशवाहा ने इस बात को भी लगभग सिरे से खारिज कर दिया कि समय सीमा खत्म होने के पहले दीपक प्रकाश मंत्री पद से इस्तीफा देंगे. पटना से दिल्ली रवाना होने से पहले कुशवाहा को जब बीजेपी के अपने पुराने वादे की याद दिलाई गई तो उन्होंने भाजपा नेताओं से ही इस सवाल का जवाब मांगने के लिए कह दिया. संभव है कि कुशवाहा अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य को लेकर दिल्ली दरबार में संवाद की कोशिश करें. हालांकि 7 जून को अपनी पार्टी की बैठक में उपेंद्र कुशवाहा ने कार्यकर्ताओं को एक मैसेज जरूर दिया था कि वह किसी एक पद के लिए अपनी पार्टी से समझौता नहीं करेंगे.

कुशवाहा को शायद इस बात का अंदाजा हो गया था कि दीपक प्रकाश को भाजपा विधान परिषद नहीं भेजेगा और इसीलिए वह अपने कार्यकर्ताओं को मैसेज दे रहे थे. सियासी जानकार मानते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा और बीजेपी के बीच अंदरखाने जरूर कोई डील हुई होगी. बीजेपी ने शायद इसी डील के तहत उपेंद्र कुशवाहा को इस साल एक बार फिर से राज्यसभा भेजा लेकिन अब भाजपा उनके बेटे दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने से कन्नी काट गई. संभव है कि दोनों दलों के बीच जो फार्मूला तय हुआ होगा उस पर कुशवाहा भी टिके ना रहे हों. हालांकि यह सब कयास हैं और इस पर अब तक ना तो कुशवाहा और ना ही भाजपा के नेताओं ने पत्ते खोले हैं.

कैबिनेट में बने रहने के विकल्प और भविष्य के सियासी समीकरण

मौजूदा हालात में बड़ा सवाल यह है कि अगर दीपक प्रकाश 6 नवंबर के बाद मंत्री नहीं रहते हैं तो उसके पहले या बाद में उपेंद्र कुशवाहा के पास सरकार के अंदर बने रहने का क्या विकल्प बचता है? उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे दीपक प्रकाश की जगह अपनी विधायक पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को मंत्री बनवा सकते हैं. सियासी गलियारे में एक चर्चा यह भी है कि अपनी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा के विधानसभा से इस्तीफे के बाद वहां होने वाले उपचुनाव में कुशवाहा दीपक प्रकाश को उम्मीदवार बनाएं और विधायक बनकर दीपक सम्राट कैबिनेट के अंदर बने रहें, लेकिन यह मामला उतना व्यावहारिक नहीं दिखता. कुशवाहा राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं और वह उपचुनाव का जोखिम लेने में दिलचस्पी शायद ना दिखाएं. उपेंद्र कुशवाहा के दिमाग में भी कई विकल्प घूम रहे होंगे और इन्हीं विकल्पों से दीपक प्रकाश का सरकार के अंदर बने रहने के राजनीतिक भविष्य पर फैसला होगा.

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