Lalu Yadav Launda Naach Video: बिहार की राजधानी पटना में लंबे समय के बाद आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव अपने पुराने और चिरपरिचित अंदाज में दिखाई दिए. दरअसल, पटना में राबड़ी देवी के सरकारी आवास पर चैता और लौंडा नाच का एक कार्यक्रम किया गया. इस दौरान बिहार की पारंपरिक लोक संस्कृति की खूबसूरत झलक देखने को मिली. इस मौके पर बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी मौजूद रहे और उन्होंने लोक गायन के साथ-साथ पारंपरिक नृत्य का भी आनंद लिया.
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सालों बाद राबड़ी आवास पर दिखा उत्सव जैसा नजारा
जानकारी के अनुसार इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए राष्ट्रीय जनता दल के कई बड़े और दिग्गज नेताओं को न्योता दिया गया था. बताया जा रहा है कि बहुत सालों के बाद लालू और राबड़ी के आवास पर इस तरह का कोई बड़ा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया है. पूरे आयोजन के दौरान पारंपरिक गीतों और डांस की प्रस्तुतियों से आवास माहौल पूरी तरह उत्सव जैसा रहा. कार्यक्रम में आए सभी मेहमानों और पार्टी नेताओं ने बिहार की इस मिट्टी से जुड़ी संस्कृति का भरपूर मजा उठाया. अब ये आयोजन राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है.'
तेजस्वी यादव ने एक्स पर शेयर किया वीडियो
वही इस कार्यक्रम की वीडियो खुद बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने एक्स पर शेयर की. इस दौरान उन्होंने लिखा कि, ''चैत्र मास में आयोजित होने वाले पारंपरिक लोक संस्कृति एवं लोक संगीत के कार्यक्रम चैता का आज आवास पर श्रद्धा और धूमधाम से आयोजन किया गया.''
तेजस्वी यादव ने आगे कहा कि ''सनातन धर्म में चैत्र मास को मधुमास भी कहा जाता है. हम किसान भाई लोग खुशहाली के लिए गायन-वादन संग हिंदू नववर्ष का उल्लास मनाने के अलावा राम नवमी के आसपास चैता का आयोजन कर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्म की भी खुशियां मनाते हैं. इस आयोजन में लोग प्रेम रस, वीर रस और भगवान राम की लीलाओं से भरे आनंदमय गीतों का गायन व श्रवण करते हैं.
चैता और फगुआ के आयोजन सामुदायिक सद्भाव, आपसी सहयोग, अपनापन, परस्पर विश्वास व प्रेम का संचार कर लोक संस्कृति और भरोसे को बढ़ावा देते हैं''
जानिए क्या होता है लौंडा नाच?
भारत के भोजपुरी भाषी क्षेत्र (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड) का एक प्राचीन लोक नृत्य-नाट्य रूप है, जिसमें पुरुष कलाकार (लौंडा) महिलाओं का वेश धारण कर साड़ी, मेकअप, घूंघरू और नकली श्रृंगार पहनकर नृत्य, गान, हास्य, संवाद तथा सामाजिक व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं. कहा जाता है कि इसकी शुरुआत 11वीं शताब्दी में हुई थी. इसके बाद 19वीं-20वीं शताब्दी में भिखारी ठाकुर (भोजपुरी के शेक्सपियर) ने इसे लोक थिएटर का रूप देकर लोकप्रिय बनाया, जिसमें दहेज, पलायन, जातिवाद जैसी सामाजिक समस्याओं पर जागरूकता फैलाई जाती है. यह शादियों, जन्मोत्सव, होली-छठ जैसे शुभ अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है और नेपाल, मॉरीशस व कैरेबियन तक फैल चुका है.
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