विकासशील इंसान पार्टी यानी VIP के प्रमुख मुकेश सहनी का एक बयान राजनीतिक बहस का विषय बन गया है. सहनी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर उन्हें एक हत्या की माफी मिलती तो वह सबसे पहले ज्ञानेश कुमार को गोली मार देते. सहनी ने हालांकि इसी बयान में कहा कि वह संविधान को मानने वाले व्यक्ति हैं. उनका तर्क था कि लोकतंत्र और संविधान से जुड़े सवालों का जवाब संवैधानिक तरीके से ही दिया जाना चाहिए. उनका बयान ऐसे समय आया है जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर विपक्ष की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं.
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चुनाव आयोग को 'भाजपा का आयोग' बताया
मुकेश सहनी ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अब भाजपा के पक्ष में काम करने वाला आयोग बन चुका है. सहनी ने चुनाव प्रक्रिया में कथित पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का होता है. उनके मुताबिक जनता के पास यह अधिकार है कि वह काम नहीं करने वाली सरकार को चुनाव के जरिए सत्ता से हटा सकती है. उन्होंने बिहार और देश के लोगों से अपने अधिकारों और संविधान को लेकर जागरूक रहने की अपील भी की.
बयान के बाद क्यों बढ़ी बहस?
सहनी की टिप्पणी ऐसे वक्त आई है जब चुनाव आयोग के भीतर SIR को लेकर कथित मतभेदों की रिपोर्ट सामने आई है. एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कई मौकों पर मतदाता सूची से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं. हालांकि, यहां चुनाव आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण है.
EC ने क्या कहा?
चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि अलग-अलग मुद्दों पर चुनाव आयुक्तों की राय अलग हो सकती है, लेकिन इसे आयोग के फैसले से असहमति नहीं माना जा सकता. आयोग के मुताबिक SIR समेत उसके सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी और सर्वसम्मति से लिए गए हैं. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि विचार-विमर्श के दौरान दर्ज की गई व्यक्तिगत टिप्पणियां अपने आप में आयोग के औपचारिक फैसले नहीं होतीं. यानी एक तरफ विपक्षी नेताओं की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं आयोग इन आरोपों को खारिज करते हुए अपने फैसलों को सर्वसम्मत बता रहा है.
सहनी ने जनता की ताकत का किया जिक्र
मुकेश सहनी ने अपने बयान में लोकतंत्र में जनता की भूमिका पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार के कामकाज का अंतिम फैसला जनता चुनाव के जरिए कर सकती है.उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने अधिकारों को समझें और संविधान की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाएं.
'गोली मारने' वाले बयान पर भी सवाल
मुकेश सहनी की टिप्पणी का सबसे ज्यादा चर्चा में आया हिस्सा उनका ज्ञानेश कुमार को लेकर दिया गया 'गोली मारने' वाला बयान है. यह बयान राजनीतिक मंच से चुनाव आयोग पर लगाए गए उनके आरोपों से अलग एक गंभीर टिप्पणी के तौर पर सामने आया है. सहनी ने अपने बयान में खुद को संविधान में विश्वास रखने वाला बताते हुए संवैधानिक रास्ते की बात भी कही. ऐसे में उनके बयान का यह हिस्सा भी चर्चा में है कि चुनाव आयोग पर राजनीतिक असहमति जाहिर करने के लिए किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
अब मुद्दा सिर्फ SIR तक सीमित नहीं
मुकेश सहनी के बयान के बाद विवाद दो स्तर पर दिखाई दे रहा है. पहला, चुनाव आयोग और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप. दूसरा, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस्तेमाल की गई भाषा. SIR को लेकर चुनाव आयोग ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है और सभी फैसलों को सर्वसम्मत बताया है. दूसरी ओर विपक्षी नेता आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं. इसी राजनीतिक माहौल में सहनी की टिप्पणी ने विवाद को और तेज कर दिया है. अब देखना होगा कि इस बयान पर आगे राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया किस दिशा में जाती है और चुनाव आयोग या अन्य संवैधानिक संस्थाओं की ओर से इस टिप्पणी पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं.
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