Bankipur ByElection Result: बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के आए नतीजों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका कर रख दिया है. जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने बीजेपी के 1995 से चले आ रहे मजबूत किले में सेंध लगाते हुए करीब 19,324 वोटों के एक बड़े अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली है. लगभग 1,30,233 कुल पड़े मतों की तुलना में यह अंतर बेहद निर्णायक माना जा रहा है. इस चुनाव में बीजेपी के खिलाफ बने माहौल और प्रशांत किशोर के पक्ष में चले दांवों ने पूरी बाजी को पलट दिया. आइए समझते हैं वे 5 प्रमुख राजनीतिक कारण, जिन्होंने बांकीपुर में प्रशांत किशोर को जीत दर्ज करने में अहम रोल निभाया.
ADVERTISEMENT
1. नेताओं के बयानों का इस्तेमाल और बीजेपी की कमजोर रणनीति
बांकीपुर चुनाव अभियान के दौरान बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद के एक बयान को लेकर तीखी बहस छिड़ी. प्रशांत किशोर और उनके अभियान ने बार-बार यह आरोप लगाया कि बीजेपी नेताओं (खासकर रविशंकर प्रसाद से जोड़ा गया) ने कहा था कि बांकीपुर इतना मजबूत गढ़ है कि कुत्ता-बिल्ली को भी खड़ा कर दें तो जीत जाएंगे. हालांकि, रविशंकर प्रसाद ने खुद इस तरह का बयान देने से इनकार किया. उन्होंने इसे झूठा और बेबुनियाद बताया. लेकिन फिर भी यह कुत्ता-बिल्ली वाला नैरेटिव अभियान का बड़ा मुद्दा बना और प्रशांत किशोर ने इसे जनता के सामने जोरदार तरीके से उठाया. इस बीच बीजेपी ने जब चुनाव में पहले घोषित उम्मीदवार अभिषेक बंटी ने महज 24 घंटे में अपनी दावेदारी वापस ले ली तो पार्टी ने नीरज सिन्हा को मैदान में उतारा. इससे जनता के बीच यह संदेश गहरा गया कि पार्टी किसी भी प्रत्याशी को उतारकर चुनाव जीतने का भरोसा रख रही थी, जिसका फायदा प्रशांत किशोर ने भुनाया.
2. भरत तिवारी एनकाउंटर और सवर्ण मतदाताओं की लामबंदी
भरत तिवारी के एनकाउंटर मामले पर सरकार के ढुलमुल रवैये के खिलाफ जब सामाजिक संगठन धरने पर बैठे तब प्रशांत किशोर स्वयं उनके समर्थन में धरने में शामिल हुए. बांकीपुर में कायस्थ बहुल वोट बैंक के साथ-साथ करीब 9 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाता भी मौजूद हैं. प्रशांत किशोर के खुद आगे आकर इस मामले पर स्टैंड लेने और धरने पर बैठने से ब्राह्मण व अन्य असंतुष्ट मतदाता उनके पक्ष में गोलबंद हो गए.
3. नीट पेपर लीक और छात्रा की मौत का मुद्दा
चुनाव से ठीक पहले बिहार में गहराए नीट पेपर लीक (NEET Paper Leak) और छात्रा की मौत के मामले को प्रशांत किशोर ने आक्रामक तरीके से उठाया. उनकी टीम और कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे को सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक जमकर भुनाया. बाद में जब यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर गरमाया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की नौबत आई, तो इसका सीधा राजनीतिक लाभ प्रशांत किशोर को मिला क्योंकि वे इस मुद्दे पर सबसे पहले मुखर हुए थे.
4. सम्राट चौधरी पर निशाना और वोट बैंक में बिखराव
प्रशांत किशोर ने अपनी जनसभाओं में सम्राट चौधरी को लगातार निशाने पर लिया. लेकिन इस रणनीति का असल मकसद कुर्मी और कुशवाहा वोट बैंक में विभाजन पैदा करना था. उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि सत्ता परिवर्तन से कुछ पारंपरिक समूहों को किनारे किया गया है. स्थिति को संभालने के लिए नीतीश कुमार को चुनाव से ठीक पहले एक वीडियो संदेश तक जारी करना पड़ा, फिर भी बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में हुई यह टूट प्रशांत किशोर के खाते में चली गई.
5. छात्र आंदोलन (CJP Protest) और पुलिसिया कार्रवाई का असर
बांकीपुर के क्षेत्र में छात्र आंदोलन और सीजेपी प्रोटेस्ट का सबसे ज्यादा असर देखा गया. इस दौरान जब पुलिस पर पथराव और झड़पों की स्थिति बनी, तब चुनाव के मद्देनजर प्रशासन सख्त कार्रवाई करने से झिझक रहा था. सरकार और प्रशासन के प्रति उपजे इस जनाक्रोश का सीधा लाभ प्रशांत किशोर को इनडायरेक्ट समर्थन के रूप में मिला. सत्ता विरोधी लहर ने छात्रों और युवाओं के वोटों को सीधे तौर पर PK के पक्ष में मोड़ दिया.
ADVERTISEMENT


