क्या नीतीश कैबिनेट से आउट होंगे दीपक प्रकाश? उपेंद्र कुशवाहा के एक इनकार ने फंसाया बेटे के टिकट पेंच

बीजेपी के विलय प्रस्ताव को खारिज करने और बेटे को अपने सिंबल पर चुनाव न लड़ाने के उपेंद्र कुशवाहा के फैसले को टिकट कटने की बड़ी वजह माना जा रहा है.

बिहार की राजनीति में हलचल मची हुई है. (Photo: PTI)
बिहार की राजनीति में हलचल मची हुई है. (Photo: PTI)

हिमांशु मिश्रा

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बिहार के सियासी गलियारों में इन दिनों एक नया सस्पेंस गहरा गया है. चर्चा है कि क्या राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के मुखिया उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को बिहार सरकार में अपना मंत्री पद गंवाना पड़ सकता है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि हाल ही में हुए विधान परिषद (MLC) के टिकट बंटवारे में दीपक प्रकाश का पत्ता साफ हो गया है. राजनीति के जानकार इसे बीजेपी की तरफ से उपेंद्र कुशवाहा को दिया गया एक बड़ा और कड़ा सियासी संदेश मान रहे हैं.

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पर्दे के पीछे की इस पूरी कहानी और इसके पीछे की सियासी क्रोनोलॉजी को आइए आसान भाषा में समझते हैं.

क्यों फंसा है मंत्री पद का पेंच?

दीपक प्रकाश फिलहाल नीतीश सरकार में मंत्री तो हैं, लेकिन वे न तो विधायक (MLA) हैं और न ही विधान परिषद सदस्य (MLC). नियम के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने अधिकतम 6 महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है. अब जब उन्हें विधान परिषद भेजने का मौका टल गया है, तो उनके मंत्री पद के भविष्य पर तलवार लटकने लगी है.

विलय से इनकार... और कट गया टिकट?

सूत्रों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इस पूरे विवाद की जड़ में बीजेपी की एक बड़ी शर्त थी. बीजेपी चाहती थी कि उपेंद्र कुशवाहा अपनी पार्टी 'राष्ट्रीय लोक मोर्चा' का विलय बीजेपी में कर दें. लेकिन कुशवाहा अपनी पार्टी की स्वतंत्र पहचान खोने को तैयार नहीं थे, इसलिए उन्होंने मना कर दिया.

इसके बाद बीजेपी ने बीच का रास्ता निकालते हुए एक और ऑफर दिया. प्रस्ताव था कि दीपक प्रकाश को बीजेपी के सिंबल (टिकट) पर विधान परिषद भेज दिया जाए. लेकिन उपेंद्र कुशवाहा इसके लिए भी राजी नहीं हुए, क्योंकि ऐसा करने पर उनके बेटे को तकनीकी रूप से बीजेपी का सदस्य बनना पड़ता. कुशवाहा के इसी 'नो' के बाद बीजेपी ने भी अपने तेवर कड़े कर लिए.

'एक हाथ में राज्यसभा, दूसरे में MLC'... बीजेपी को मंजूर नहीं!

बीजेपी के भीतर एक धड़े का मानना है कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के पास सिर्फ 4 विधायक हैं, लेकिन उन्हें हिस्सेदारी बहुत ज्यादा मिल चुकी है. विधानसभा चुनाव के ठीक बाद बीजेपी ने उपेंद्र कुशवाहा को खुद राज्यसभा भेजा. अब ऐसे में उनके बेटे को भी विधान परिषद की सीट दे देना, बीजेपी के कई नेताओं को हजम नहीं हो रहा है.

इसके अलावा, बीजेपी के पास अब बिहार में सम्राट चौधरी के रूप में कुशवाहा समाज का एक बड़ा और मजबूत चेहरा है. ऐसे में पार्टी को लगता है कि उपेंद्र कुशवाहा को बहुत ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत अब नहीं रह गई है.

परिवारवाद के आरोप और घर के भीतर ही बगावत!

दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने के बाद से उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के अंदर भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. पार्टी के कुल 4 विधायकों में से एक कुशवाहा की पत्नी भी हैं. ऐसे में पहले पत्नी को विधायक और फिर बेटे को सीधे मंत्री बना देने से बाकी के विधायक बेहद नाराज बताए जा रहे हैं. विपक्ष भी इसे 'विशुद्ध परिवारवाद' का तमगा देकर कुशवाहा पर लगातार हमले बोल रहा है.

कुशवाहा को याद है 'पुराना वादा'

दूसरी तरफ, उपेंद्र कुशवाहा बैकफुट पर जाने को तैयार नहीं हैं. वे एनडीए के पुराने समझौते की दुहाई दे रहे हैं. उनका कहना है कि विधानसभा चुनाव के वक्त सीट शेयरिंग फॉर्मूले में साफ तय हुआ था कि आरएलएम को 6 विधानसभा सीटें और बीजेपी के कोटे से एक विधान परिषद (MLC) सीट दी जाएगी. कुशवाहा इसी वादे को पूरा करने की मांग पर अड़े हैं.

आगे क्या होगा?

सियासी गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि अगले साल राज्यपाल कोटे से होने वाले मनोनयन में शायद दीपक प्रकाश को जगह मिल जाए. लेकिन सबसे बड़ा सस्पेंस यही है कि तब तक के लिए क्या दीपक प्रकाश मंत्री बने रहेंगे या फिर उन्हें इस्तीफा देना होगा? फिलहाल, इस पूरी खींचतान ने यह तो साफ कर दिया है कि एनडीए के भीतर उपेंद्र कुशवाहा के लिए आगे की राह इतनी आसान नहीं होने वाली है.

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