Goldman Sachs का बड़ा अलर्ट: 2027 में $140 तक जा सकता है कच्चा तेल, भारत और शेयर बाजार पर क्या होगा असर?

चिराग ठाकुर

• 12:52 PM • 02 Nov 2026

गोल्डमैन सैक्स ने 2027 में ब्रेंट क्रूड के 140 डॉलर तक जाने का खतरा बताया है. जानें महंगा तेल रुपये, महंगाई, निफ्टी और अलग-अलग कंपनियों पर कैसे असर डालेगा.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

खाड़ी देशों का उत्पादन रोज 35 लाख बैरल घटने का अनुमान है

भारत अपनी तेल जरूरत का 85 से 90 फीसदी आयात करता है

कमजोर रुपया आयात बिल और घरेलू महंगाई का दबाव बढ़ाएगा

शेयर बाजार में तेजी के बीच निवेशकों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो सकती है. यह चुनौती है कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें. वैश्विक निवेश बैंक Goldman Sachs ने ब्रेंट क्रूड को लेकर अपने अनुमान में बड़ा बदलाव किया है. बैंक ने दिसंबर के लिए ब्रेंट क्रूड का अनुमान 90 डॉलर से बढ़ाकर 105 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है. वहीं, 2027 में औसत कीमत का अनुमान 80 डॉलर से बढ़ाकर 88 डॉलर प्रति बैरल कर दिया गया है.

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हालांकि, सबसे ज्यादा चिंता बैंक के उस अनुमान को लेकर है, जिसमें कच्चे तेल की कीमत 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका जताई गई है. Goldman Sachs के मुताबिक, अगर 2027 में खाड़ी देशों का तेल उत्पादन 2025 के औसत स्तर से रोजाना 35 लाख बैरल कम रहता है, तो ब्रेंट क्रूड 140 डॉलर तक पहुंच सकता है. इस स्थिति में पूरे साल का औसत भाव करीब 130 डॉलर प्रति बैरल रह सकता है.

यह बैंक का सामान्य अनुमान नहीं, बल्कि लंबे समय तक तेल की सप्लाई बाधित रहने की स्थिति पर आधारित एक जोखिम वाला परिदृश्य है.

मिडिल ईस्ट का तनाव बढ़ा सकता है तेल की कीमतें

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की आशंका के पीछे मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव बड़ी वजह है. अमेरिका-ईरान संघर्ष, तेल के जहाजों पर हमले और उत्पादन से जुड़े ठिकानों को नुकसान पहुंचने का खतरा वैश्विक सप्लाई को प्रभावित कर सकता है.

तेल की कीमतें सिर्फ इस बात से तय नहीं होतीं कि कितना उत्पादन हो रहा है. यह भी अहम है कि उत्पादित तेल सुरक्षित तरीके से दुनिया के बाजारों तक पहुंच पा रहा है या नहीं. अगर समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ता है या तेल उत्पादन केंद्रों को नुकसान पहुंचता है, तो बाजार में उपलब्ध सप्लाई घट सकती है. ऐसी स्थिति में कीमतों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है.

भारत के लिए महंगा तेल क्यों है बड़ी चिंता?

भारत अपनी जरूरत का करीब 85-90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है. 2 नवंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था, जबकि रुपया 95 रुपये प्रति डॉलर के करीब था.

भारत के लिए यह दोहरी चुनौती है. एक तरफ तेल की कीमत बढ़ने से ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, दूसरी तरफ रुपया कमजोर होने पर उसी तेल को खरीदने की लागत और बढ़ जाती है.

इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है.

  • आयात बिल: महंगे तेल से देश का विदेशी मुद्रा खर्च बढ़ सकता है.

  • रुपया: डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव गहरा सकता है.

  • महंगाई: ईंधन और माल ढुलाई महंगी होने से सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं.

  • आम आदमी: पेट्रोल-डीजल से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक की लागत बढ़ने का खतरा रहता है.

किन कंपनियों के मुनाफे पर पड़ सकता है दबाव?

महंगे कच्चे तेल का असर सभी कंपनियों पर एक जैसा नहीं होता. कुछ कंपनियों के लिए यह बढ़ती लागत की समस्या बन सकता है, खासकर उन कारोबारों में जहां ईंधन या पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल की बड़ी भूमिका है.

1. एविएशन कंपनियां: विमान ईंधन यानी ATF एयरलाइंस के बड़े खर्चों में शामिल है. तेल महंगा होने पर ईंधन का बिल बढ़ सकता है. अगर कंपनियां टिकट की कीमतें बढ़ाकर इस खर्च की भरपाई नहीं कर पातीं, तो उनके मुनाफे पर दबाव आ सकता है.

2. पेंट और टायर कंपनियां: इन उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले कई कच्चे माल पेट्रोलियम से जुड़े होते हैं. तेल महंगा होने से उत्पादन लागत बढ़ सकती है और कंपनियों के मार्जिन घट सकते हैं.

3. ऑयल मार्केटिंग कंपनियां: IOC, BPCL और HPCL जैसी कंपनियां महंगा कच्चा तेल खरीदती हैं. अगर वे बढ़ी हुई लागत ग्राहकों तक नहीं पहुंचा पातीं, तो उनकी प्रति लीटर कमाई प्रभावित हो सकती है.

ONGC और Oil India को कैसे मिल सकता है फायदा?

महंगे तेल की तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है. ONGC और Oil India जैसी कंपनियां कच्चा तेल खरीदने के बजाय उसका उत्पादन करती हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने पर इनके तेल की बिक्री से मिलने वाली रकम बढ़ सकती है. इससे इनकी कमाई को सहारा मिल सकता है.

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कच्चे तेल की हर तेजी से इन कंपनियों का मुनाफा अपने आप बढ़ जाएगा. सरकारी नीतियां, उत्पादन लागत और अन्य कारोबारी स्थितियां भी इनके नतीजों को प्रभावित करती हैं.

क्या महंगा तेल Nifty की तेजी रोक सकता है?

महंगे तेल का असर केवल चुनिंदा कंपनियों तक सीमित नहीं रह सकता. अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और उनके मुनाफे के अनुमान कमजोर पड़ सकते हैं. वहीं, महंगाई बढ़ने पर ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों को भी झटका लग सकता है.

ऐसे माहौल में निवेशक जोखिम लेने से बच सकते हैं, जिसका असर शेयर बाजार की तेजी पर पड़ सकता है. हालांकि, 140 डॉलर का तेल सीधे Nifty में गिरावट की गारंटी नहीं है. असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल कितने समय तक महंगा रहता है और कंपनियां बढ़ी हुई लागत का कितना हिस्सा ग्राहकों पर डाल पाती हैं.

निवेशकों के लिए इसलिए सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों को देखना काफी नहीं होगा. कंपनियों के आने वाले तिमाही नतीजों, लागत और मुनाफे के मार्जिन पर भी नजर रखनी होगी. Goldman Sachs का 140 डॉलर वाला अनुमान एक गंभीर सप्लाई संकट की स्थिति है, लेकिन यह भारत के लिए महंगे तेल से पैदा होने वाली चुनौतियों की ओर इशारा जरूर करता है.

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