दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच भरोसा दरक रहा है और जब भरोसा टूटता है तो असर सिर्फ देशों पर नहीं आपकी जेब पर भी पड़ता है. कहानी शुरू होती है न्यूयॉर्क से जहां जमीन के नीचे करीब 25 मीटर गहराई में एक ऐसी तिजोरी है जिसे दुनिया का सबसे सुरक्षित खजाना माना जाता है. ये है अमेरिका का फेडरल रिजर्व गोल्ड वॉल्ट. यहां 5 लाख से ज्यादा सोने की ईंटें रखी हैं, जिसका कुल वजन करीब 6300 टन और कीमत एक ट्रिलियन डॉलर से भी ज्यादा है.
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हालांकि ये सिर्फ अमेरिका का सोना नहीं है, दुनिया के कई देशों का सोना यहां रखा है खासकर यूरोप के देशों का. लेकिन अब यूरोप के देश न्यूयॉर्क के तहखाने में रखे अपने सोने को वापस लाना चाहते हैं. अब सवाल उठता है यूरोप ने अपना सोना अमेरिका में क्यों रखा और क्यों अब ये देश सोना वापस लाना चाहते हैं? क्या कोई बड़ा खतरा मंडरा रहा है? सोने-चांदी के इस खास एपिसोड में आइए जानते हैं इन्हीं सवालों के जवाब.
सोने-चांदी का भाव
खबर में आगे बढ़ने से पहले पहले जानिए मार्केट में सोने-चांदी का भाव कितना चल रहा है. MCX एक्सचेंज पर 7 अप्रैल शाम करीब 7 बजे 5 जून 2026 की डिलीवरी वाला सोना 71 रुपए की गिरावट के साथ 1,49,910 रुपए प्रति 10 ग्राम पर ट्रेड कर रहा था. वहीं 5 मई 2026 की डिलीवरी वाली चांदी 1356 रुपए की गिरावट के साथ 2,32,023 रुपये प्रति किलो पर ट्रेड कर रही थी.
यूरोप ने अमेरिका में क्यों रखा है अपना सोना?
इस सवाल के जवाब के लिए हमें इतिहास का रुख करना होगा. दरअसल, दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका सबसे मजबूत आर्थिक ताकत बन गया था. डॉलर सबसे भरोसेमंद करेंसी थी और सोना डॉलर से जुड़ा हुआ था. उस समय यूरोप के देशों को सोवियत संघ का डर था तो उन्होंने अपना सोना अमेरिका में रखना ज्यादा सुरक्षित समझा. यहां एक और फायदा था न तो स्टोरेज का खर्च, न ट्रांसपोर्ट का झंझट सब कुछ सुरक्षित वो भी मुफ्त में.
अब सोना वापस क्यों चाहता है यूरोप?
लेकिन अब कहानी बदल रही है, अब वही यूरोप के देश अपने सोने को वापस लाने की बात कर रहे हैं और इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका की राजनीति खासकर डोनाल्ड ट्रंप की वापसी है. ट्रंप के बयान, उनकी नीतियां और उनका अनिश्चित रवैया, इन सबने यूरोप के नेताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है. जर्मनी जैसे देश, जिसके पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड रिजर्व है उसका करीब 1200 टन सोना अभी भी न्यूयॉर्क में रखा है, जिसकी कीमत करीब 200 अरब डॉलर है.
अब वहां के कई एक्सपर्ट कह रहे हैं कि इतना बड़ा खजाना अमेरिका में रखना जोखिम भरा है. डर यह है कि अगर भविष्य में अमेरिका और यूरोप के रिश्ते बिगड़ते हैं तो क्या यूरोप अपने ही सोने तक पहुंच पाएगा. क्या होगा अगर राजनीतिक टकराव बढ़ा या आर्थिक दबाव बना. कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि ट्रंप जैसे नेता किसी भी वक्त कड़े फैसले ले सकते हैं.
क्या कोई खतरा मंडरा रहा?
60 के दशक में फ्रांस ने भी ऐसा ही किया था, उसे डर था कि डॉलर की वैल्यू गिर सकती है तो उसने अपना सोना अमेरिका से वापस मंगा लिया और कुछ साल बाद वही हुआ. अमेरिका ने डॉलर को सोने से अलग कर दिया और पूरी दुनिया का वित्तीय सिस्टम हिल गया. अब वही डर फिर से उठ रहा है.
यूरोप ने वापस लिया सोना तो क्या होगा?
कुल मिलाकर दुनिया बदल रही है. जियोपॉलिटिक्स बदल रहा है और जब ताकतों के बीच तनाव बढ़ता है तो सबसे पहले भरोसा टूटता है. अब एक और बड़ी बात अगर यूरोप अपने सोने को वापस लाने लगता है तो इसका असर सिर्फ सोने तक सीमित नहीं रहेगा. ये एक बड़ा संकेत होगा कि दुनिया अब अमेरिका पर पहले जैसा भरोसा नहीं कर रही और अगर ऐसा हुआ तो ग्लोबल फाइनेंस सिस्टम में दरार आ सकती है. डॉलर की ताकत पर असर पड़ सकता है और बाजारों में भारी उथल पुथल हो सकती है.
यानी न्यूयॉर्क के तहखाने में रखा ये सोना अब सिर्फ सोना नहीं रहा यह भरोसे की परीक्षा बन गया है और अगर ये भरोसा टूटा तो इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था से लेकर आपके निवेश तक हर जगह दिखाई देगा. अब देखना ये है कि क्या यूरोप अपना सोना वापस लाएगा या फिर ये तनाव सिर्फ बातों तक ही सीमित रहेगा.
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