सोने की कीमतों में लगातार उतार चढ़ाव दिख रहा है. इस साल जनवरी महीने में सोने ने अपना ऑल टाइम हाई लेवल टच किया था. उसके बाद से सोने की कीमतें काफी नीचे आ चुकी हैं. लेकिन सवाल ये है कि सोने की कीमतें अभी और गिरेंगी या फिर यहां से इनमें तेजी देखने को मिलेगी. इसी बीच एक्सपर्ट सोने पर बड़ी चेतावनी दे रहे हैं, जिसके लिए 1970 का दशक सोने की कीमतों पर एक बड़ा संकेत दे रहा है. दरअसल, इस दशक को सोने के इतिहास का सबसे बड़ा 'बुल रन' माना जाता है, जब सोना महज 35 डॉलर से उछलकर रिकॉर्ड 850 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया था. विस्तार से जानिए पूरी कहानी.
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सोने-चांदी का ताजा भाव!
सोने-चांदी की कीमतों की बात करें तो आज तेजी देखने को मिली है. मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी MCX पर 12 जून को करीब 4 बजे 5 अगस्त की डिलीवरी वाला सोना 1598 रुपये की तेजी के साथ 1,50,530 रुपये प्रति 10 ग्राम पर ट्रेड कर रहा था. वहीं 3 जुलाई 2026 की डिलीवरी वाली चांदी 3181 रुपये की तेजी के साथ 2,42,834 रुपये प्रति किलो पर ट्रेड कर रही थी.
क्या सोने में आएगी 1970 के दशक वाली तेजी?
आज जब दुनिया ईरान-इजरायल तनाव, महंगाई और आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है, तब एक सवाल बार-बार उठ रहा है- क्या सोना फिर से वैसी ही ऐतिहासिक तेजी दिखा सकता है जैसी 1970 के दशक में दिखाई थी? और इतिहास सोने पर हमें क्या चेतावनी दे रहा है. दिलचस्प बात ये है कि पिछले कुछ वर्षों में सोने ने पहले ही शानदार प्रदर्शन किया है. भारत में 2023 के आसपास जहां सोना करीब 63 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर था, वहीं 2026 में यह लगभग 1.8 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया, यानी करीब तीन गुना उछाल. हालांकि हाल के महीनों में ईरान से जुड़े युद्ध और वैश्विक तनाव के बावजूद सोना अपने शिखर स्तर से करीब 20% तक फिसल चुका है.
1970 के दशक में क्या हुआ था?
यह स्थिति कई निवेशकों को हैरान करती है क्योंकि आमतौर पर युद्ध और भू-राजनीतिक संकट के दौरान सोने की कीमतें बढ़ती हैं. लेकिन इतिहास बताता है कि गोल्ड का सफर कभी सीधी रेखा में नहीं चलता. 1970 का दशक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. ये वो दशक था जब गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म हुआ और खेल बदल गया था. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक वित्तीय व्यवस्था Bretton Woods System पर आधारित थी. इस व्यवस्था के तहत अमेरिकी डॉलर सीधे सोने से जुड़ा हुआ था और एक औंस सोने की कीमत 35 डॉलर तय थी.
लेकिन 15 अगस्त 1971 को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया. उन्होंने घोषणा की कि अब अमेरिकी डॉलर को सोने में परिवर्तित नहीं किया जाएगा. इस घटना को 'निक्सन शॉक' कहा जाता है. इसके साथ ही Bretton Woods System प्रभावी रूप से समाप्त हो गया और पहली बार सोने की कीमत बाजार की मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होने लगी. यहीं से आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े गोल्ड बुल रन की शुरुआत हुई.
1970 की शुरुआत में सोना करीब 35 डॉलर प्रति औंस था. गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म होने के बाद निवेशकों ने सोने को सुरक्षित निवेश के रूप में खरीदना शुरू कर दिया. 1974 तक इसकी कीमत करीब 180 डॉलर प्रति औंस पहुंच गई. लेकिन इसके बाद पहली बड़ी गिरावट आई और 1976 तक सोना वापस लगभग 100 डॉलर प्रति औंस के आसपास आ गया. कई लोगों को लगा कि तेजी खत्म हो गई है. लेकिन असली विस्फोट तो अभी बाकी था. 1978 के बाद सोने में दूसरी और कहीं ज्यादा शक्तिशाली रैली शुरू हुई. महज दो वर्षों में कीमतें आसमान छूने लगीं और जनवरी 1980 में सोना करीब 850 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया. यानी लगभग एक दशक में सोने ने करीब 24 गुना रिटर्न दिया. यह आधुनिक वित्तीय इतिहास की सबसे बड़ी कमोडिटी रैलियों में गिनी जाती है.
1980 में फिर लगा था झटका!
अब बात करते हैं 1980 की. इतिहास का सबसे बड़ा सबक यहीं छिपा है. जनवरी 1980 में रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद सोना लगातार नहीं बढ़ता रहा. इसके उलट इसमें लंबी गिरावट शुरू हो गई. सोने की कीमत गिरकर लगभग 300 से 400 डॉलर प्रति औंस के दायरे में आ गई, यानी अपने शिखर स्तर से 50% से अधिक की गिरावट. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके बाद कई वर्षों तक सोना अपने पुराने रिकॉर्ड के आसपास भी नहीं पहुंच सका.
कुल मिलाकर 1970 के दशक की कहानी केवल सोने की तेजी की कहानी नहीं है, बल्कि निवेश का एक बड़ा सबक भी है. इतिहास बताता है कि जब दुनिया में महंगाई बढ़ती है, आर्थिक अनिश्चितता होती है, युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ते हैं और लोगों का मुद्राओं पर भरोसा कमजोर पड़ता है, तब सोना चमकता है. लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि सिर्फ युद्ध या संकट होना ही सोने की कीमत बढ़ने की गारंटी नहीं है.
अगर केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ा दें, महंगाई नियंत्रण में आ जाए और निवेशकों का भरोसा वित्तीय बाजारों में लौट आए, तो सोना लंबे समय तक दबाव में भी रह सकता है. यही वजह है कि आज जब सोना रिकॉर्ड स्तरों के आसपास है और दुनिया फिर से भू-राजनीतिक तनावों से घिरी हुई है, तब निवेशकों को सिर्फ तेजी की कहानी नहीं, बल्कि 1980 के बाद आई लंबी गिरावट को भी याद रखना चाहिए.
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