हजारों सालों से सोना सिर्फ एक धातु नहीं बल्कि भरोसे, सुरक्षा और संपत्ति का प्रतीक माना जाता रहा है. लेकिन बीते 3 सालों में जो कुछ हुआ, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि संकट के दौर में सोने की चमक फीकी नहीं पड़ती. पिछले तीन साल में सोने की कीमतें दोगुने से ज्यादा बढ़ चुकी हैं. हालांकि 2026 में सोने की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है और रिकॉर्ड ऊंचाइयों से इसमें गिरावट भी आई है.
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इसके बावजूद दुनिया भर के केंद्रीय बैंक यानी सेंट्रल बैंक सोने की खरीदारी को लेकर पहले से ज्यादा उत्साहित नजर आ रहे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि जब सोने की कीमतों में दबाव है तो केंद्रीय बैंक खरीदारी क्यों बढ़ा रहे हैं? क्या उन्हें आने वाले समय में किसी बड़े आर्थिक खतरे की आशंका है? और क्या ये संकेत देता है कि सोने की लंबी अवधि की तेजी अभी खत्म नहीं हुई है? विस्तार से जानिए इन्हीं सवालों के जवाब.
सोने-चांदी के ताजा भाव!
16 जून को सोने के भाव में मामूली बढ़त तो चांदी फ्लैट दिखाई दी. MCX पर 16 जून को शाम करीब 7 बजे 5 अगस्त को डिलीवरी वाला सोना 144 रुपए की बढ़त के साथ 1,53,060 रुपए प्रति 10 ग्राम पर ट्रेड कर रहा था. वहीं 3 जुलाई की डिलीवरी वाली चांदी 81 रुपए की गिरावट के साथ 2,51,377 रुपए प्रति किलो पर ट्रेड कर रही है.
एक सर्वे ने मार्केट में बढ़ाई हलचल
सोने के भाव को लेकर एक ओर जहां इतनी उठा-पटक जारी है, उसी बीच सेंट्रल बैंक्स की खरीदारी ने सवाल खड़े कर दिए है. एक सर्वे में सामने आया है कि इस साल सेंट्रल बैंक होल्ड रिजर्व बढ़ाने की प्लानिंग कर रहे हैं. ये सर्वे World Gold Council और YouGov ने मिल कर दिया है. इस सर्वे में 74 सेंट्रल बैंक्स से बातचीत की गई है और इस सर्वे का सबसे बड़ा निष्कर्ष ये रहा कि 45% केंद्रीय बैंकों ने कहा कि वे अगले 12 महीनों में अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की योजना बना रहे हैं. ऐसे में यह 2018 से अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है.
दिलचस्प बात ये है कि सिर्फ एक केंद्रीय बैंक ऐसा है जिसने अपने गोल्ड होल्डिंग्स घटाने की इच्छा जताई है. ये बताता है कि दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय संस्थाएं अभी भी सोने को एक रणनीतिक और सुरक्षित संपत्ति के रूप में देख रही हैं. सर्वे के अनुसार उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के केंद्रीय बैंक सोना खरीदने को लेकर सबसे ज्यादा उत्साहित हैं. करीब 53% विकासशील देशों के केंद्रीय बैंकों ने कहा कि वे अगले एक साल में अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की उम्मीद कर रहे हैं. इसके मुकाबले विकसित देशों के केवल 18% केंद्रीय बैंक ही ऐसा सोच रहे हैं. ये आंकड़ा बताता है कि आने वाले वर्षों में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सोने की मांग का बड़ा सोर्स बन सकते हैं.
क्यों बढ़ी सोने की कीमतें?
सर्वे का एक और दिलचस्प पहलू ये है कि कई देश विदेशी मुद्रा भंडार खर्च किए बिना सोना खरीदना चाहते हैं करीब 38% केंद्रीय बैंक अपने दूसरे रिजर्व एसेट्स बेचकर गोल्ड खरीदने की तैयारी में हैं. अक्सर निवेशक सोने की कीमतों को महंगाई, डॉलर या ब्याज दरों से जोड़कर देखते हैं. लेकिन पिछले 3 वर्षों की कहानी कुछ और कहती है. सोने की कीमतें दोगुने से ज्यादा बढ़ीं और इसके पीछे सबसे बड़ी ताकत केंद्रीय बैंकों की रिकॉर्ड खरीदारी रही. 2025 में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने सामूहिक रूप से करीब 863 टन सोने की शुद्ध खरीदारी की, तब ये लगातार चौथा वर्ष था जब केंद्रीय बैंकों की खरीदारी ऐतिहासिक रूप से ऊंचे स्तर पर रही यानी जब निजी निवेशक और हेज फंड कभी खरीद रहे थे तो कभी बेच रहे थे, उस दौरान केंद्रीय बैंक लगातार बाजार में खरीदार बने रहे.
सेंट्रल बैंक्स के पास है बहुत सोना!
आज दुनिया के केंद्रीय बैंकों के पास कुल मिलाकर 36,000 टन से ज्यादा सोना मौजूद है. ये कई दशकों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है. कई निवेशकों को लगता है कि केवल चीन सोना खरीद रहा है. लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है. 2025 में पोलैंड दुनिया क सबसे बड़ा गोल्ड खरीदार रहा है. पोलैंड के केंद्रीय बैंक ने करीब 102 टन सोना खरीदा. इसके बाद उसके कुल गोल्ड रिजर्व लगभग 543 टन तक पहुंच गए.
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पोलैंड ने अपनी वित्तीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सोने पर बड़ा दांव लगाया है. चीन पिछले कई वर्षों से लगातार सोना खरीद रहा है. वर्तमान में चीन के पास लगभग 2,300 टन से अधिक गोल्ड रिजर्व है. विश्लेषकों का मानना है कि चीन अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और इसी वजह से वह लगातार सोना जमा कर रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक ने भी पिछले कुछ वर्षों में लगातार सोने की खरीदारी की है. भारत का गोल्ड रिजर्व अब करीब 880 टन तक पहुंच चुका है.
सेंट्रल बैंक्स क्यों गोल्ड खरीद रहे हैं?
सेंट्रल बैंक्स के गोल्ड खरीदने के पीछे की बड़ी वजह डॉलर पर निर्भरता कम करना, जियो पॉलिटिकल रिस्क को मैनेज करना और वित्तीय सुरक्षा है. यही वजह है कि केंद्रीय बैंक गोल्ड को अंतिम सुरक्षा कवच के रूप में देखते हैं. एक समय था जब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड को दुनिया का सबसे सुरक्षित रिजर्व एसेट माना जाता था. लेकिन तस्वीर बदल रही है. हाल के वर्षों में केंद्रीय बैंकों ने इतनी तेजी से सोना खरीदा है कि कई रिपोर्टों के अनुसार ग्लोबल रिजर्व पोर्टफोलियो में गोल्ड की हिस्सेदारी अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड के बराबर या उससे भी ज्यादा दिखाई दे रही है. यह बदलाव बताता है कि दुनिया धीरे-धीरे अपने रिजर्व का स्वरूप बदल रही है.
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