Shrinkflation क्या है? कीमत वही, पैकेट छोटा...ऐसे ग्राहकों की जेब पर पड़ता है असर

तनीषा त्यागी

• 12:02 PM • 10 Aug 2026

शिंकफ्लेशन में दाम वही दिखते हैं, लेकिन पैकेट में सामान कम मिलता है. जानिए कंपनियां ऐसा क्यों करती हैं और खरीदारी में क्या देखना चाहिए, ताकि असली खर्च समझ आए.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

कंपनियां बढ़ती लागत संभालने के लिए सामान की मात्रा धीरे घटाती हैं

ग्राहक अक्सर दाम देखते हैं, इसलिए बदलाव तुरंत पकड़ नहीं पाते

प्रति ग्राम या प्रति लीटर खर्च बढ़ने से असली बोझ बढ़ता

Shrinkflation : महंगाई बढ़ने के साथ रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर नजर रखना अब लोगों की आदत बन चुकी है. लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि कुछ प्रोडक्ट की कीमत लंबे समय तक लगभग वही रहती है, जबकि पैकेट के अंदर मौजूद सामान की मात्रा धीरे-धीरे कम होती जाती है? अगर हां, तो यह सिर्फ पैकेजिंग में बदलाव नहीं, बल्कि Shrinkflation का उदाहरण हो सकता है.

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Shrinkflation में कंपनी प्रोडक्ट की कीमत को सीधे बढ़ाने के बजाय उसकी मात्रा, आकार या पैकेट में मौजूद यूनिट की संख्या कम कर देती है. ग्राहक को बाहर से देखने पर कीमत पहले जैसी ही नजर आती है, लेकिन उसे पहले की तुलना में कम सामान मिलता है. यानी कीमत का टैग भले ही ज्यादा न बदले, लेकिन प्रति ग्राम या प्रति यूनिट ग्राहक की वास्तविक लागत बढ़ सकती है.

Shrinkflation क्या होता है?

सरल भाषा में समझें तो जब किसी प्रोडक्ट की कीमत लगभग समान रखते हुए उसकी मात्रा या साइज कम कर दिया जाता है, तो इसे Shrinkflation कहा जाता है. मान लीजिए किसी प्रोडक्ट का पैकेट पहले 100 ग्राम का था और उसकी कीमत 20 रुपये थी. बाद में कंपनी उसी 20 रुपये की कीमत पर पैकेट को घटाकर 80 ग्राम कर देती है. ग्राहक को ऐसा लगेगा कि प्रोडक्ट अभी भी 20 रुपये का ही है, लेकिन असल में उसे पहले के मुकाबले कम सामान मिल रहा है. यही वजह है कि Shrinkflation को कई बार छिपी हुई महंगाई के रूप में भी समझा जाता है. हालांकि कंपनियों के लिए यह सीधे कीमत बढ़ाने के बजाय लागत बढ़ने का सामना करने की एक कारोबारी रणनीति हो सकती है.

कंपनियां Shrinkflation का सहारा क्यों लेती हैं?

किसी प्रोडक्ट को बनाने की लागत सिर्फ कच्चे माल पर निर्भर नहीं करती. इसके अलावा पैकेजिंग, ट्रांसपोर्टेशन, ऊर्जा, मजदूरी और दूसरे ऑपरेशनल खर्च भी कंपनी की लागत को प्रभावित करते हैं. जब इन खर्चों में लगातार बढ़ोतरी होती है, तो कंपनी के सामने आम तौर पर दो विकल्प होते हैं. पहला, प्रोडक्ट की कीमत बढ़ाई जाए. दूसरा, कीमत को लगभग समान रखते हुए पैकेट में मौजूद मात्रा कम कर दी जाए.

कई कंपनियां दूसरे विकल्प को इसलिए चुन सकती हैं क्योंकि कीमत में सीधी बढ़ोतरी ग्राहक को तुरंत दिखाई देती है. वहीं पैकेट के वजन या अंदर मौजूद यूनिट की संख्या में बदलाव कई बार ग्राहक तुरंत नोटिस नहीं कर पाता. खासकर कम कीमत वाले रोजमर्रा के प्रोडक्ट में यह रणनीति ज्यादा आसानी से अपनाई जा सकती है, क्योंकि ग्राहक अक्सर कीमत पर ज्यादा ध्यान देता है और प्रति ग्राम या प्रति यूनिट लागत की तुलना नहीं करता.

Parle-G का 5 रुपये वाला पैकेट क्यों चर्चा में आता है?

Shrinkflation को समझने के लिए अक्सर 5 रुपये वाले Parle-G बिस्कुट के पैकेट का उदाहरण दिया जाता है. लंबे समय तक इस प्रोडक्ट की कीमत 5 रुपये के आसपास बनी रही, लेकिन समय के साथ पैकेट में मिलने वाली मात्रा कम होने की बात कही जाती रही है. दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 1990 के दशक में 5 रुपये वाले पैकेट में करीब 100 ग्राम बिस्कुट होने का दावा किया जाता है. बाद में यह मात्रा करीब 65-70 ग्राम के स्तर तक आई और अब लगभग 50 ग्राम के आसपास बताई जाती है.

इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि अगर किसी प्रोडक्ट की कीमत वही रहती है लेकिन उसमें मिलने वाली मात्रा घट जाती है, तो ग्राहक को वास्तव में प्रति ग्राम ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही होती है. हालांकि किसी खास ब्रांड या प्रोडक्ट के मौजूदा पैक साइज और कीमत की तुलना करते समय पैकेजिंग में हुए आधिकारिक बदलाव और लेबल पर दी गई मात्रा को देखना सबसे सही तरीका है.

सिर्फ बिस्कुट ही नहीं, इन प्रोडक्ट्स पर भी नजर रखें

Shrinkflation का असर सिर्फ बिस्कुट तक सीमित नहीं माना जाता. रोजमर्रा के कई FMCG प्रोडक्ट्स में पैकेज साइज या मात्रा में बदलाव देखने को मिल सकता है. इनमें चिप्स, नमकीन, साबुन, टूथपेस्ट, ब्रेड, खाने का तेल और दूसरे पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स शामिल हो सकते हैं. उदाहरण के लिए अगर किसी तेल का पैकेट पहले 1 लीटर का था और अब कम मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन कीमत में उसी अनुपात में कमी नहीं हुई है, तो ग्राहक को प्रति लीटर ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है. यही वजह है कि सिर्फ पैकेट की कीमत देखकर किसी प्रोडक्ट को सस्ता या महंगा समझना हमेशा सही नहीं होता.

ग्राहक की जेब पर कैसे पड़ता है असर?

Shrinkflation का सबसे बड़ा असर ग्राहक की वास्तविक खरीद क्षमता पर पड़ता है. मान लीजिए किसी परिवार को हर महीने किसी खास प्रोडक्ट के 10 पैकेट खरीदने पड़ते हैं. अगर कीमत वही रहती है लेकिन हर पैकेट में सामान कम हो जाता है, तो महीने के अंत में परिवार को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए ज्यादा पैकेट खरीदने पड़ सकते हैं. इसका मतलब है कि ग्राहक की कुल खरीदारी का खर्च धीरे-धीरे बढ़ सकता है, भले ही उसे किसी एक प्रोडक्ट की कीमत में बड़ी बढ़ोतरी दिखाई न दे. यानी महंगाई सिर्फ तब नहीं बढ़ती जब किसी प्रोडक्ट का MRP बढ़ता है. अगर मात्रा घटती है और कीमत उसी स्तर पर रहती है, तो ग्राहक के लिए वास्तविक लागत बढ़ सकती है.

ग्राहक को Shrinkflation का पता क्यों देर से चलता है?

इसका एक बड़ा कारण है कि ज्यादातर लोग खरीदारी करते समय सबसे पहले कीमत देखते हैं. अगर किसी पैकेट की कीमत 10 रुपये, 20 रुपये या 50 रुपये ही रहती है, तो ग्राहक को लगता है कि प्रोडक्ट महंगा नहीं हुआ. लेकिन अगर पैकेट पर लिखी नेट मात्रा 100 ग्राम से घटकर 90 ग्राम या 80 ग्राम हो गई है, तो यह बदलाव हर बार आसानी से नजर नहीं आता. यही वजह है कि Shrinkflation कई बार लंबे समय तक ग्राहक की नजर से बच सकता है. इसके अलावा पैकेट का डिजाइन भी ऐसा हो सकता है कि छोटा बदलाव तुरंत महसूस न हो. इसलिए सिर्फ पैकेट के आकार को देखकर नहीं, बल्कि उस पर लिखी Net Quantity को देखना जरूरी है.

Shrinkflation और सामान्य महंगाई में क्या अंतर है?

सामान्य महंगाई में किसी प्रोडक्ट की कीमत बढ़ती है. उदाहरण के लिए जो सामान पहले 50 रुपये का था, वह बाद में 55 रुपये का हो गया. Shrinkflation में तस्वीर थोड़ी अलग होती है. यहां कंपनी प्रोडक्ट की कीमत को समान या लगभग समान रख सकती है, लेकिन मात्रा कम कर सकती है. यानी एक स्थिति में कीमत बढ़ती है, जबकि दूसरी स्थिति में कीमत के बदले मिलने वाला सामान घटता है. दोनों ही मामलों में ग्राहक की वास्तविक खरीद क्षमता प्रभावित हो सकती है.

ग्राहक कैसे बच सकते हैं?

Shrinkflation से बचने का सबसे आसान तरीका है कि खरीदारी के समय सिर्फ MRP नहीं, बल्कि प्रति ग्राम, प्रति किलो, प्रति लीटर या प्रति यूनिट कीमत को भी देखें. अगर दो अलग-अलग पैकेट की कीमत 50 रुपये है, लेकिन एक में 500 ग्राम और दूसरे में 400 ग्राम सामान है, तो दोनों की वास्तविक कीमत समान नहीं है. इसी तरह पुराने पैकेट और नए पैकेट की मात्रा की तुलना करना भी उपयोगी हो सकता है. पैकेट पर दी गई Net Quantity, MRP और यूनिट प्राइस जैसी जानकारी ग्राहक को बेहतर फैसला लेने में मदद कर सकती है.

कंपनियों के लिए क्यों जरूरी हो जाता है यह फैसला?

कंपनियों के लिए भी Shrinkflation कोई आसान फैसला नहीं होता. अगर कच्चे माल और दूसरे खर्च लगातार बढ़ रहे हों, तो मार्जिन बनाए रखना चुनौती बन सकता है. कीमत बढ़ाने पर बिक्री और ग्राहक की मांग प्रभावित होने का जोखिम रहता है. वहीं मात्रा घटाने पर ग्राहक के भरोसे और ब्रांड इमेज पर सवाल उठ सकते हैं, खासकर तब जब ग्राहक को बाद में बदलाव का पता चलता है. इसलिए कंपनी को लागत, बिक्री, प्रतिस्पर्धा और ग्राहक की कीमत संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना पड़ता है.

आखिरकार ग्राहक को क्या समझना चाहिए?

Shrinkflation को समझने का सबसे आसान तरीका है कि सिर्फ कीमत नहीं, कीमत के बदले मिलने वाली मात्रा को देखें. अगर किसी प्रोडक्ट की कीमत कई सालों से लगभग समान है, तो यह जरूरी नहीं कि वह प्रोडक्ट वास्तव में उतना ही सस्ता बना हुआ है. हो सकता है कि इस दौरान उसकी मात्रा, साइज या पैकेट में मौजूद यूनिट की संख्या में बदलाव हुआ हो. इसलिए अगली बार जब आप बिस्कुट, चिप्स, नमकीन, साबुन, टूथपेस्ट, ब्रेड या खाने का तेल खरीदें, तो सिर्फ MRP पर नजर न रखें. पैकेट पर लिखी मात्रा भी जरूर देखें. यही छोटा सा बदलाव आपको यह समझने में मदद कर सकता है कि आप वास्तव में कितना भुगतान कर रहे हैं और बदले में कितना सामान मिल रहा है.

 

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