पटना की गली-मोहल्ले से गुजरता वाला एक कबाड़ी वाला आज दुनिया के सबसे बड़े मेटल किंग में से एक है. लेकिन क्या इस किंग के साम्राज्य पर ग्रहण लग गया है? एक तरफ छत्तीसगढ़ की पुलिस और एफ़आईआर की तलवार, तो दूसरी तरफ देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने अदाणी ग्रुप से सीधी टकराहट.
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क्या 3 लाख करोड़ प्लस वाले वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने सरकार के फेवरेट से बैर मोल लेकर लाइफ की सबसे बड़ी और भारी मिस्टेक कर दी है? क्या जेपी ग्रुप की बेशकीमती जमीन के लिए छिड़ी जंग अनिल अग्रवाल को भारी पड़ने वाली है? क्या प्रो-बीजेपी और पीएम मोदी की विजनरी लीडरशिप के प्रचंड समर्थक रहे अनिल अग्रवाल अब सत्ता के ही आंखों में खटकने लगे हैं? क्या सब कुछ अब दांव पर लग गया है? अनिल अग्रवाल कहते हैं हम भाग्यशाली हैं कि हमारे पास एक ऐसा प्रधानमंत्री है जो न केवल जमीनी हकीकत से वाकिफ है बल्कि सभी भारतीयों के प्रति गहरी सहानुभूति भी रखता है. लेकिन 72 साल के वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल आजकल बड़े कॉर्पोरेट और कानूनी विवाद के सेंटर में हैं. चर्चित चेहरा के इस एपिसोड में आज जानिए अनिल अग्रवाल की पूरी कहानी.
पहले जानिए पूरा मामला
बीजेपी शासित छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले के वेदांता पावर प्लांट ब्लास्ट जिसमें 20 लोगों की मौत हुई के मामले में एफ़आईआर दर्ज हुई है. एक प्लांट में हुए हादसे के बाद सीधे लंदन में रह रहे ग्रुप चेयरमैन पर एफआईआर? सोशल मीडिया के लोगों को पच नहीं रही है, सब कुछ नॉर्मल लग नहीं रहा है. एफ़आईआर को सोशल मीडिया और कॉर्पोरेट गलियारों में अदाणी ग्रुप के साथ चल रहे कॉरपोरेट वार से सीधा जोड़ा जा रहा है.
अनिल खाली हाथ पहुंचे थे मुंबई
अनिल अग्रवाल की कहानी 70 के दशक में जब शुरू हुई तब कहां किसी को पता था कि पटना का एक मामूली लड़का देश-दुनिया में क्या कुछ कर जाएगा. पटना के मिलर हाई स्कूल से पढ़े अग्रवाल कभी पढ़ाई में अच्छे नहीं रहे. उन्हें अंग्रेजी तक नहीं आती थी. उन्होंने अपने पिता के छोटे से एल्युमीनियम बिजनेस में हाथ बंटाने के लिए 15 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी लेकिन कुछ करना था अपने दम पर. 19 साल की उम्र में एक टिफिन और बिस्तरे के साथ पटना से मुंबई आ गए. तब उनकी जेब खाली थी लेकिन इरादे फौलादी.
कबाड़ से शुरू किया था बिजनेस
मुंबई में अनिल अग्रवाल ने पुरानी मशीनों और स्क्रैप का बिजनेस शुरू किया. लोग हंसे, लेकिन अनिल अग्रवाल ने उसी कबाड़ से सोना निकालना सीख लिया. जैसे-जैसे पैसे आने लगे उन्होंने छोटी कंपनियों को खरीदना, फिर मुनाफे की मशीन बनाना उनका हुनर बन गया. कबाड़ के बिजनेस से शुरुआत कर दुनिया का बड़ा माइनिंग साम्राज्य खड़ा कर लिया.
जब टूटी-फूटी इंग्लिश ने बदल दी किस्मत
अपनी पास्ट लाइफ के बारे में कहानियां शेयर करना अनिल अग्रवाल का शौक रहा है. ऐसी एक कहानी ये कि जब मुंबई आए तो उन्हें अंग्रेजी के सिर्फ दो शब्द आते थे- Yes और No. अंग्रेजी नहीं आती, इसे उन्होंने अपनी तरक्की के रास्ते कतई भटकने नहीं दिया. अनिल अग्रवाल ने असंभव-सा सपना देखा कि उनकी कंपनी लंदन स्टॉक एक्सचेंज (LSE) में लिस्ट होने वाली पहली भारतीय कंपनी बने. इंग्लिश फीयर के कारण लंदन में बैंकर्स की मीटिंग में डर से बोलते नहीं थे कि कहीं रॉन्ग इंग्लिश बोली तो डील कैंसिल न हो जाए.
बैंकर ने पूछ लिया. मिस्टर अग्रवाल, आपके पास न तो बड़ी डिग्री है, न ठीक से अंग्रेजी आती है, फिर हम आप पर अरबों डॉलर क्यों लगाएं? बिहारी जवाब ने बाजी पलट दी-अनिल अग्रवाल ने टूटी-फूटी अंग्रेजी में आंखों में आंखें डालकर कहा- I don't have a degree, but I have a 'Zidd. If I can survive the streets of Mumbai with 20 rupees, I can make your money grow 100 times. सादगी और जिद ने डील फाइनल कर दी. दिसंबर 2003 में वेदांता के लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होते ही अनिल अग्रवाल रातों-रात दुनिया के अमीर लोगों की लिस्ट में शामिल हो गए.
कैसे खड़ा किया 3 लाख करोड़ का बिजनेस?
अग्रवाल का पहला बड़ा ब्रेक तब आया जब उन्होंने 1976 में कर्ज में डूबी कंपनी शमशेर स्टर्लिंग कॉर्पोरेशन को खरीदा. तब उन्होंने 16 लाख का कर्ज लिया. उस कर्ज को उन्होंने लाइफ का सबसे बड़ा मानते रहे. इसी से उस साम्राज्य की नींव पड़ी जो आज 3 लाख करोड़ से ज्यादा का बिजनेस ग्रुप है.
पुरानी डूबी हुई कंपनियों को खरीदकर मुनाफे कमाने का हुनर बहुत काम आया. भारत के टेकओवर किंग बन गए. ऐसा आदमी जिसने भारत सरकार की कंपनियां खरीदने का करेज दिखाया. वाजपेयी सरकार के दौरान उन्होंने सरकारी एल्युमीनियम कंपनी बालको, फिर 2022 में एक और सरकारी कंपनी हिंदुस्तान जिंक खरीदा जो आज वेदांता ग्रुप की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों में से एक है. सोसा गोवा, केयर्न इंडिया, इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स जैसे प्राइवेट कंपनियां खरीदकर वेदांता का बिजनेस स्टील, आयरन ओर, तेल और गैस सेक्टर में बढ़ाया. अब उन्होंने जिस जेपी एसोसिएट्स के लिए इतना बड़ा दांव खेला वो सीमेंट, रियल एस्टेट की बड़ी कंपनी रही लेकिन फिर डूब गई. जेपी एसोसिएट्स भले डूब गई लेकिन बिजनेस इतना बड़ा कि वो अदाणी जैसे ग्रुप से भिड़ने के लिए आगा-पीछा नहीं सोचा.
अनिल अग्रवाल और गौतम अदाणी के बीच आई दरार
72 साल की उम्र में अनिल अग्रवाल की लाइफ में खलबली तब मची जब दिल्ली-NCR की बेशकीमती जमीनों और सीमेंट के कारखानों पर 'किंग' की नजर पड़ी. जेपी ग्रुप जो कर्ज के दलदल में धंसा था, उसकी नीलामी शुरू हुई. अनिल अग्रवाल का दावा है कि उन्होंने 16 हजार 726 करोड़ की सबसे बड़ी बोली लगाई. लेकिन बाजी पलट गई और यह गौतम अदाणी के हाथ लग गई. अग्रवाल ने इस हार को चुपचाप स्वीकार नहीं किया. उन्होंने खुलेआम जंग ए एलान कर दिया कि मेरी बोली बड़ी थी तो फिर अदाणी को क्यों चुना गया? वही से शुरू हुई दो बड़े कॉर्पोरेट दिग्गजों की वो जंग, जिसने दिल्ली में सत्ता के गलियारे में हलचल मचा दी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट से अनिल अग्रवाल जीत नहीं सके.
अनिल अग्रवाल हमेशा से प्रधानमंत्री मोदी के बड़े फैन रहे हैं. बीजेपी को मोटा चंदा भी देते रहे. लेकिन राजनीति और व्यापार के रिश्ते कांच की तरह होते हैं. जैसे ही अग्रवाल ने जेपी ग्रुप के मामले में अदाणी के खिलाफ कानूनी मोर्चा खोला, वैसे ही छत्तीसगढ़ से एक खबर आती है. प्लांट ब्लास्ट मामले में पुलिस ने अनिल अग्रवाल के खिलाफ FIR दर्ज कर ली. जानकार इसे 'संयोग' नहीं, 'प्रयोग' कह रहे हैं. क्या ये एफआईआर अदाणी से टकराने की सजा है? या फिर कानून अपना काम कर रहा है?
कहा जाता है सफलता असफलताएं भी मांगती है, कुर्बानियां मांगती है सुख, चैन का. दर्द देती है और खालीपन भी. आज अरबों का साम्राज्य खड़ा करने वाले अनिल अग्रवाल 9 बार बिजनेस में फेल हुए. तब जाकर सक्सेसफुल होने की फीलिंग और ब्रैडिंग शरू हुई.
अनिल अग्रवाल की लव लाइफ!
अनिल अग्रवाल की पर्सनल लव लाइफ किसी बॉलीवुड फिल्म की तरह है, जिसमें बचपन का प्यार, संघर्ष के दिन और एक बेहद गहरा भावनात्मक मोड़ शामिल है. अनिल अग्रवाल की शादी किरण अग्रवाल से 1975 में हुई थी. किरण उनकी 'चाइल्डहुड स्वीटहार्ट' और फैमिली फ्रेंड रही हैं. अग्रवाल ने खुद सोशल मीडिया पर साझा किया है कि सगाई के बाद भी उस दौर में मिलना मना था.
मंगेतर किरण से छिपकर मिलने की दीवानगी इतनी कि उनके भाइयों, अपने सालों को पटाते थे. उन्होंने अपनी पहली फिल्म राजेश खन्ना वाली राजा रानी पटना के अशोक टॉकीज में साथ देखी थी. जब मुंबई में 400 वर्ग फुट के छोटे से घर में रहकर साम्राज्य के सपने बुन रहे थे तब किरण ढाल बनी रहीं. उनका रिश्ता ओल्ड वाइन की तरह जितना पुराना होता गया, लवली होता गया. इस साल फरवरी में शादी की 50वीं सालगिरह मनाई तो अपनी लाइफ सक्सेस का सारा क्रेडिट किरण को दिया.
जब अनिल पर टूटा था दुखों का पहाड़!
अनिल अग्रवाल ने सब कुछ पाया जो चाहा. मेहनत और ईश्वर के आशीर्वाद से सब कुछ मिला लेकिन खुशियों को नजर लगी किसी की. कहते हैं दौलत सब कुछ खरीद सकती है, लेकिन अपनों को हमेशा रोककर नहीं सकता. 7 जनवरी का दिन खुशियों को मातम में बदलने वाला साबित हुआ. इकलौते बेटे 49 साल के अग्निवेश अग्रवाल का अमेरिका में निधन हो गया. अग्निवेश एक स्कीइंग हादसे के बाद न्यूयॉर्क के अस्पताल में रिकवर हो रहे थे, लेकिन अचानक कार्डियक अरेस्ट ने उनकी जान ले ली.
एक पिता का दर्द बोल पड़ा एक पिता के कंधे पर बेटे की अर्थी जाए, इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता. पैसा होना खराब है. पहले पत्नी थाली लेकर 2 बजे रात तक मेरा इंतजार करती थी, आज बड़ा मकान और खूब पैसा है, लेकिन 8 बजे आता हूं तो कोई नहीं मिलता. बेटे के खोने के दर्द ने जीवन जीने के नजरिए को पूरी तरह बदल दिया.
बेटे के जाने के बाद किया बड़ा ऐलान
फोर्ब्स के अनुसार, उनकी अनुमानित कुल संपत्ति करीब 3.66 लाख करोड़ रुपये है. बेटे की मौत के बाद उन्होंने अपनी 75% संपत्ति (लगभग ₹21,000 करोड़) समाज सेवा के लिए दान करने का एलान कर दिया. कंपनी के प्रमोटर नहीं, बल्कि आगे ट्रस्टी के तौर पर काम करेंगे.
हालांकि अनिल अग्रवाल का सब कुछ खत्म नहीं हुआ. बेटे के जाने के बाद, अब अग्रवाल के साम्राज्य की जिम्मेदारी उनकी बेटी प्रिया अग्रवाल हेब्बार के कंधों पर है. प्रिया वेदांता लिमिटेड की नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और हिंदुस्तान जिंक की चेयरपर्सन हैं. प्रिया की शादी आकर्ष हेब्बार से हुई है. पटना की जड़ों से जुड़ाव है. लंदन में रहते हैं लेकिन पटना का मिलर हाई स्कूल, लिट्टी-चोखा भूल नहीं पाते.
आज अनिल अग्रवाल एक दोराहे पर खड़े हैं. एक तरफ उनका 75% संपत्ति दान करने का 'मसीहा' वाला अवतार है, तो दूसरी तरफ कर्ज और कानूनी मुकदमों का बोझ. जेपी ग्रुप की 4000 एकड़ जमीन और सीमेंट के कारखाने अब सुप्रीम कोर्ट के हाथों में हैं. क्या अनिल अग्रवाल इस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाएंगे? क्या 'मेटल किंग' एक बार फिर बाजी पलट देगा या इस बार अदाणी की रफ्तार के आगे वेदांता की चमक फीकी पड़ जाएगी? ये सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं है, यह भारत के सबसे बड़े व्यापारिक वर्चस्व की जंग है.
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