छत्तीसगढ़ की राजनीति और सामाजिक बदलाव के लिहाज से आज एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक पल देखने को मिला. रायपुर स्थित विधानसभा की दहलीज पर आज वो लोग खड़े थे. जिन्होंने कभी लोकतंत्र का विरोध किया था लेकिन आज वे उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को करीब से समझने आए थे.
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बीजापुर और कांकेर से आए 140 पूर्व नक्सलियों ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मुलाकात की. ये वो लोग हैं जो बंदूक छोड़कर अब कलम और विकास की भाषा बोल रहे हैं.
जंगल के खौफ से 'अपनों' के प्यार तक
मुख्यमंत्री के साथ बातचीत के दौरान इन आत्मसमर्पित नक्सलियों के चेहरों पर एक अलग ही सुकून नजर आया. चर्चा के दौरान उन्होंने अपने पुराने और नए जीवन के बीच का बड़ा अंतर साझा किया. उन्होंने बताया कि पहले का जीवन सिर्फ डर, असुरक्षा और भाग-दौड़ के बीच कटता था. अब वे अपने परिवार के साथ चैन की नींद सोते हैं.
कुछ पूर्व नक्सलियों की आंखें उस वक्त नम हो गईं जब उन्होंने बताया कि सालों बाद उन्होंने इस बार अपनी होली परिवार के साथ मनाई. जंगल की बंदूकों के बीच उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे फिर कभी रंगों के त्योहार का हिस्सा बन पाएंगे. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अब उनके गांवों तक सड़कें, बिजली और पानी जैसी सुविधाएं पहुंच रही हैं, जिससे आम लोगों का जीवन आसान हो गया है.
यह उज्ज्वल भविष्य की शुरुआत है
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सभी का गर्मजोशी से स्वागत किया और उनके इस फैसले की सराहना की. उन्होंने साफ कहा कि जब माओवादी विचारधारा छोड़कर लोग लोकतंत्र में भरोसा जताते हैं तो यह राज्य की जीत होती है.
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कहते हैं, "आपका मुख्यधारा में लौटना सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के बेहतर कल की एक नई तस्वीर है. सरकार आपके पुनर्वास और रोजगार के लिए हर संभव कदम उठा रही है."
लोकतंत्र की पाठशाला बना विधानसभा
इन 140 खास मेहमानों ने न केवल मुख्यमंत्री से मुलाकात की, बल्कि विधानसभा परिसर का भ्रमण भी किया. उन्होंने देखा कि कैसे प्रदेश के विकास के लिए कानून बनाए जाते हैं और चर्चाएं होती हैं. यह उनके लिए एक नया और प्रेरणादायक अनुभव था, जो यह साबित करता है कि 'शांति, विकास और विश्वास' की त्रिवेणी अब छत्तीसगढ़ के उन इलाकों तक भी पहुंच रही है जो कभी अशांत माने जाते थे.
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