क्या कोई निजी धार्मिक संस्था या शरिया कोर्ट किसी शादी को कानूनी रूप से खत्म कर सकती है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस सवाल का बेहद साफ और कड़ा जवाब दिया है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी धार्मिक संस्था खुद को अदालत नहीं मान सकती. इनके दिए आदेश या फतवे सिर्फ एक धार्मिक राय हो सकते हैं, लेकिन इनसे किसी महिला या पुरुष का वैवाहिक दर्जा या कानूनी अधिकार खत्म नहीं होता.
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यह पूरा मामला रायपुर की रहने वाली 38 वर्षीय निरोश अब्बासी से जुड़ा है. साल 2015 में पहले पति के इंतकाल के बाद उन्होंने जुलाई 2020 में मोहम्मद आबिद खान से दूसरी शादी की थी. हालांकि, बच्चों को नए परिवार में ढालने को लेकर दोनों के बीच मनमुटाव शुरू हो गया, जो धीरे-धीरे काफी बढ़ गया.
वन स्टॉप सेंटर से पुलिस स्टेशन तक पहुंचा विवाद
महिला का आरोप है कि पति और ससुराल वालों ने उनके साथ मानसिक और शारीरिक क्रूरता की. मामला जब वन स्टॉप सखी सेंटर में काउंसिलिंग के जरिए नहीं सुलझा, तो महिला ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया. शिकायत के बाद रायपुर के महिला थाने में पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ धारा 498-A (दहेज उत्पीड़न और क्रूरता) के तहत केस दर्ज कर लिया गया. दूसरी तरफ पति का कहना था कि उसने 'तलाक-ए-हसन' के जरिए अगस्त से अक्टूबर 2021 के बीच तीन चरणों में पत्नी को तलाक दे दिया है.
इदारा-ए-शरिया के फैसले को हाईकोर्ट ने बताया बेअसर
मामले में नया मोड़ तब आया जब रायपुर की 'इदारा-ए-शरिया' नामक संस्था ने जनवरी 2022 में एक आदेश जारी कर महिला को तलाकशुदा घोषित कर दिया. जब यह मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने शरिया कोर्ट के इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'विश्व लोचन मदन' केस की नजीर देते हुए कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली संस्थाएं देश के कानून से बनी अदालतें नहीं हैं. कानून की नजर में ऐसे आदेशों की कोई कानूनी मान्यता नहीं है.
कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट ने साफ किया कि वैवाहिक स्थिति का निपटारा या विवाह विच्छेद सिर्फ देश की आधिकारिक अदालतों और तय वैधानिक प्रक्रिया से ही संभव है. हालांकि, कोर्ट ने इस सुनवाई के दौरान 'तलाक-ए-हसन' की संवैधानिक वैधता पर टिप्पणी करने से परहेज किया, लेकिन इदारा-ए-शरिया के फरमान को पूरी तरह निष्प्रभावी करार दे दिया.
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