भिलाई-दुर्ग से जुड़ा साइबर ठगों का मायाजाल, किराए के बैंक खातों से 3 करोड़ फ्रीज, बैंक मैनेजर भी जांच के दायरे में!

रघुनंदन पंडा

• 04:27 PM • 01 Aug 2026

छत्तीसगढ़ की दुर्ग पुलिस ने 1,242 'म्यूल' (किराए के) बैंक खातों के जरिए चल रहे करोड़ों रुपये के साइबर ठगी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। इस मामले में पुलिस ने 122 आरोपियों को गिरफ्तार कर ठगी के लगभग 3 करोड़ रुपये सफलतापूर्वक फ्रीज करा दिए हैं.

छत्तीसगढ़ से आया हैरान करने वाला मामला
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अगर आप सोचते हैं कि साइबर क्राइम सिर्फ एक फोन कॉल का खेल है, तो थोड़ा ठहरिए. फोन पर मीठी बातें करने वाले ठगों के पीछे एक बहुत बड़ा और उलझा हुआ नेटवर्क काम करता है. कोई जाल बिछाता है, कोई शिकार को फांसता है, तो कोई पलक झपकते ही ठगी का पैसा गायब कर देता है. और इस पूरे खेल का सबसे अहम मोहरा बनते हैं- 'म्यूल बैंक अकाउंट्स' यानी किराए पर लिए गए खाते. छत्तीसगढ़ की दुर्ग पुलिस ने ठगी के इसी खतरनाक तंत्र पर बड़ा हमला बोला है. पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ किया है जो 1,242 फर्जी और किराए के बैंक खातों के जरिए ठगी की रकम को इधर-उधर घुमा रहा था.

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122 लोग गिरफ्तार, 3 करोड़ रुपये फ्रीज

इस बड़े क्रैकडाउन में पुलिस ने अब तक कुल 122 लोगों को दबोच लिया है. इनमें 117 वे लोग शामिल हैं जिन्होंने अपने खाते किराए पर दिए थे जबकि 5 वे शातिर एजेंट हैं जो लोगों को झांसे में लेकर ये खाते तैयार करवाते थे. यही नहीं, पुलिस ने खातों में मौजूद करीब 3 करोड़ रुपये की संदिग्ध रकम को फ्रीज भी करा दिया है, ताकि ठग इस पैसे को निकाल न सकें.

घर बैठे कमाई का लालच और फिर... खेल शुरू!

पुलिस जांच में सामने आया कि ये ठग सीधे-सादे या जरूरतभरे लोगों को निशाना बनाते थे. उन्हें 'घर बैठे आसान काम', 'कमीशन' या 'पार्ट-टाइम जॉब' का झांसा दिया जाता था. जैसे ही कोई व्यक्ति इनके झांसे में आता, ये ठग उससे बैंक खाता खुलवाते या उसका मौजूदा खाता इस्तेमाल करने लगते. इसके बाद एटीएम कार्ड, पासबुक, चेकबुक, सिम कार्ड और नेट बैंकिंग का पूरा एक्सेस अपने हाथ में ले लेते.

पैसे गायब करने की तरकीब:

  • सबसे पहले ठगी (जैसे शेयर ट्रेडिंग फ्रॉड, डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन सट्टा या फर्जी इनवेस्टमेंट) का पूरा पैसा इन म्यूल खातों में मंगाया जाता.
  • पुलिस और जांच एजेंसियों की नजर से बचने के लिए, उस रकम को तुरंत दर्जनों छोटे-छोटे टुकड़ों में अलग-अलग खातों में बांट दिया जाता.
  • आखिर में यूपीआई, नेट बैंकिंग या एटीएम के जरिए कैश निकालकर मुख्य सरगना तक पहुंचा दिया जाता.

कैसे खुली इस सिंडिकेट की पोल?

दुर्ग पुलिस ने 1 जनवरी से 29 जुलाई 2026 के बीच एक विशेष अभियान चलाया. इस दौरान राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP), भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), अलग-अलग राज्यों से मिली शिकायतों और बैंकों के डेटा का बारीकी से विश्लेषण किया गया.

ट्रांजेक्शन हिस्ट्री, केवाईसी पेपर्स, नेट बैंकिंग लॉग्स और यूपीआई डेटा की कड़ियां जोड़ते हुए पुलिस आखिरकार 18 मुकदमों तक पहुंची और 1,242 संदिग्ध खातों को बेनकाब कर दिया.

बैंक अधिकारियों पर भी लटकी तलवार

मामला सिर्फ खाताधारकों तक सीमित नहीं है. भिलाई नगर के सीएसपी सत्य प्रकाश तिवारी के मुताबिक, जांच के दायरे में कुछ बैंक अधिकारी और मैनेजर भी आ चुके हैं. पुलिस यह पता लगा रही है कि क्या खाते खोलते वक्त केवाईसी (KYC) और संदिग्ध लेन-देन की अनदेखी में बैंक स्टाफ की भी मिलीभगत थी. अगर लापरवाही या साठगांठ साबित हुई, तो गाज गिरना तय है.

आगे क्या?

पुलिस की कार्रवाई अभी रुकी नहीं है. करीब 2,000 और संदिग्ध खातों की टेक्निकल जांच चल रही है, जिससे आने वाले दिनों में और भी गिरफ्तारियां हो सकती हैं. रही बात फ्रीज किए गए 3 करोड़ रुपये की, तो कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह रकम सीधे पीड़ितों के खातों में वापस कराने का प्रयास किया जा रहा है.

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