छत्तीसगढ़ का बस्तर, जिसका नाम सुनते ही कभी जेहन में नक्सली हिंसा, बारूदी सुरंगें और सुरक्षा बलों के बड़े अभियान कौंध जाते थे, आज देश की सबसे बड़ी नीतिगत बैठकों का गवाह बन रहा है. बस्तर के इतिहास में एक नया पन्ना जुड़ने जा रहा है, क्योंकि यहाँ 26वीं सेंट्रल जोनल काउंसिल (केंद्रीय क्षेत्रीय परिषद) की हाई-प्रोफाइल बैठक आयोजित की जा रही है. केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और खुद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री समेत कई आला मंत्री और शीर्ष अधिकारी शामिल हो रहे हैं. यह आयोजन सिर्फ एक प्रशासनिक रस्म नहीं है, बल्कि इसके पीछे देश के गृह मंत्रालय की एक बेहद सोची-समझी राजनीतिक, सुरक्षा और विकास से जुड़ी रणनीति काम कर रही है.
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राजधानी छोड़ बस्तर को ही क्यों चुना गया?
आमतौर पर मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों के स्तर की ऐसी संवेदनशील और बड़ी बैठकें किसी राज्य की राजधानी या चकाचौंध वाले बड़े महानगरों में बुलाई जाती हैं. लेकिन केंद्र सरकार ने जानबूझकर इस बार बस्तर की धरती को चुना. इसके पीछे गृह मंत्रालय का एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक संदेश छिपा है. केंद्र सरकार इस आयोजन के जरिए दुनिया को यह दिखाना चाहती है कि बस्तर से अब नक्सलवाद का दौर खत्म हो चुका है. जहां कभी कदम-कदम पर सुरक्षा का खतरा रहता था, आज वहां चार राज्यों के मुख्यमंत्री और देश के गृह मंत्री पूरी तरह सुरक्षित और शांत माहौल में बैठकर देश के विकास की नीतियां तैयार कर रहे हैं. यह इस बात का सबूत है कि इस इलाके पर अब पूरी तरह से लोकतंत्र और शासन की पकड़ मजबूत हो चुकी है.
'सुरक्षा मॉडल' से 'विकास मॉडल' की तरफ बढ़ते कदम
पिछले कुछ सालों में सरकार ने बस्तर को लेकर अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. शुरुआती दौर में जहां फोकस सिर्फ बड़े एंटी-नक्सल ऑपरेशनों पर था, वहीं अब बंदूक की आवाज को दबाकर सड़कों का जाल, मोबाइल टावर, बैंक, स्कूल और अस्पतालों को आदिवासियों के घरों तक पहुंचाया जा रहा है. गृह मंत्रालय अब बस्तर को एक 'सुरक्षा मॉडल' की बजाय 'विकास मॉडल' के रूप में पेश कर रहा है. हाल ही में शुरू की गई 'जन जन सुविधा केंद्र' जैसी योजनाएं इसी का हिस्सा हैं, ताकि सुदूर जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें.
इस बैठक के एजेंडे में क्या-क्या शामिल है?
केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, इस बैठक में सिर्फ जंगलों की सुरक्षा पर बात नहीं होगी, बल्कि आम जनता से जुड़े कई बुनियादी मुद्दों पर मंथन किया जाएगा. इसके मुख्य एजेंडे में शामिल हैं:
- राज्यों के बीच आपसी तालमेल और सीमाओं से जुड़े विवादों को सुलझाना.
- महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की जांच में तेजी लाना और फास्ट ट्रैक कोर्ट को मजबूत करना.
- ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग नेटवर्क और इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम (ERSS-112) का विस्तार करना.
- पोषण, शिक्षा, बिजली, स्वास्थ्य और सहकारिता (cooperative network) को बढ़ावा देना.
'शहीद वीर गुण्डाधुर सेवा डेरा'
इस मौके पर बस्तर में 'शहीद वीर गुण्डाधुर सेवा डेरा प्रकल्प' की एक नई और क्रांतिकारी शुरुआत की जा रही है. छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों (CAPF) के करीब 200 कैंप मौजूद हैं, जो अब तक केवल सुरक्षा का जिम्मा संभालते थे. अब इनमें से 70 कैंपों को 'शहीद वीर गुण्डाधुर सेवा डेरा' के रूप में बदला जा रहा है, जो विकास के नए केंद्र बनेंगे. इस केंद्र के जरिए ग्रामीण एक ही छत के नीचे करीब 371 सरकारी योजनाओं का लाभ ऑनलाइन ले सकेंगे. यहां से राशन कार्ड बनवाने, सस्ते अनाज की शिकायत दर्ज कराने, बैंक खाता चलाने, स्वास्थ्य सेवाएं लेने और डेयरी मिल्क कलेक्शन जैसी सुविधाएं मिलेंगी. साथ ही, युवाओं के लिए कौशल विकास और प्रौढ़ शिक्षा की शुरुआत भी होगी. राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (NID) की मदद से अगले तीन महीनों में इसका पूरा खाका जमीन पर उतार दिया जाएगा.
क्या होती है सेंट्रल जोनल काउंसिल?
यह परिषद देश की पांच जोनल काउंसिलों में से एक है, जिसकी नींव साल 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम (States Reorganization Act) के तहत रखी गई थी. इसका सीधा मकसद केंद्र और राज्यों के बीच की दूरियों को मिटाकर आपसी समन्वय को बेहतर बनाना है. केंद्रीय गृह मंत्री इसके मुखिया होते हैं और शामिल राज्यों के मुख्यमंत्री व वरिष्ठ मंत्री इसके मेंबर होते हैं. हर साल रोटेशन के आधार पर किसी एक राज्य के मुख्यमंत्री को इसका उपाध्यक्ष बनाया जाता है. बीते 11 सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी कुल 64 बैठकें की जा चुकी हैं, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'कोऑपरेटिव फेडरलिज्म' (सहकारी संघवाद) के सपने को सच करती हैं.
स्थानीय लोगों के लिए इसके क्या मायने हैं?
बस्तर के आम आदिवासियों और नागरिकों के लिए यह कोई आम वीआईपी (VIP) दौरा नहीं है. जब भी किसी संवेदनशील इलाके में इतना बड़ा राष्ट्रीय आयोजन होता है, तो वहां की बुनियादी सुविधाएं जैसे सड़कें, बिजली और इंटरनेट रातों-रात सुधर जाते हैं. इसके अलावा, देश के नक्शे पर बस्तर की एक पॉजिटिव और सुरक्षित छवि बनकर उभरेगी, जिससे आने वाले दिनों में यहां व्यापार, निवेश और पर्यटन (Tourism) के नए रास्ते खुलेंगे. गृह मंत्री के शब्दों में कहें तो, "माओवाद इसलिए नहीं फैला था कि यहां विकास नहीं था, बल्कि विकास न होने की वजह ही हथियारबंद नक्सलवाद था." अब जब वह दौर खत्म हो चुका है, तो बस्तर नई उम्मीदों के साथ देश की मुख्यधारा का नेतृत्व करने के लिए तैयार है.
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