Charchit Chehra: सोनम वांगचुक के अलावा 23 दिन भूख हड़ताल पर बैठी रहीं नेहा बोरा कौन हैं? जानिए उनकी पूरी कहानी

रूपक प्रियदर्शी

• 01:36 PM • 21 Jul 2026

Charchit Chehra Neha Bora: जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक और शिक्षा सुधार की मांग को लेकर 23 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठीं नेहा बोरा आखिर कौन हैं? JNU की पीएचडी स्कॉलर, AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष और छात्र आंदोलन की नई आवाज बनीं नेहा बोरा की पूरी कहानी जानिए.

AISA National President Neha Bora
AISA National President Neha Bora
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दिल्ली का जंतर-मंतर, एक ऐसी जगह जिसने देश में न जाने कितने सत्ता परिवर्तन और बड़े आंदोलनों को देखा है. आंदोलन बदलते रहे, चेहरे बदलते रहे लेकिन जंतर मंतर की तासीर नहीं बदली. आज जंतर मंतर पर फिर गवाह बना है एक ऐसी छात्र क्रांति का, जिसने देश की संसद से लेकर हर आम परिवार के ड्रॉइंग रूम तक को झकझोर कर रख दिया. इस आंदोलन का चेहरा बने सोनम वांगचुक, अभिजीत दिपके. जंतर मंतर पर जब भूखे-प्यासे सोनम वांगचुक के हाथ मजबूत करने देश के हर कोने से लोग आए तब उन्हें एक और मंच दिखता रहा जिस पर भूखे-प्यासे 23 दिनों तक लेटी थी 25 साल की एक लड़की नेहा बोरा. जंतर मंतर के इस आंदोलन में कम चर्चित होने के बाद भी हौसले और दम से आज सबसे चर्चित चेहरा बनी हैं नेहा बोरा. आइए विस्तार से जानते हैं उनकी पूरी कहानी.

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सोनम वांगचुक के जाने के बाद भी डटी रही नेहा

नेहा भी वही कर रही थी जिसके लिए सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके जान की बाजी लगाए रहे. NEET परीक्षा में हुई धांधली और देश के लाखों युवाओं के भविष्य को बचाने के लिए JNU की ये पीएचडी स्कॉलर और आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष पूरे 23 दिनों तक मौत से आंख मिचौली खेलती रहीं. सिर्फ पानी के सहारे 23 दिन जिंदा रही नेहा बोरा. डॉक्टर चेतावनी देते रहे कि मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर हो सकता है, अंग काम करना बंद कर सकते हैं और लड़की कोमा में जा सकती है...लेकिन हौसला टस से मस नहीं हुआ. जब दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक को जबरन मंच से हटाकर अस्पताल में भर्ती कराया, तब भी नेहा अपने साथी मनीष और आमीन के साथ डटी रहीं.

जंतर-मंतर पर चल रहे इस ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान ये चर्चा रही कि सोनम वांगचुक की तो पूछ होती रही लेकिन नेहा और उनके साथियों की उपेक्षा होती रही. पुलिस ने ध्यान नहीं दिया. मीडिया के कैमरे-माइक के बड़े हिस्से का भी फोकस सोनम वांगचुक पर रहा, नेहा बोरा पर नहीं. पुलिस ने वांगचुक को तो जबरन अस्पताल पहुंचा दिया लेकिन नेहा बोरा और उनके साथियों को उनके हाल पर छोड़ दिया.

क्यों कवरेज से गायब रही नेहा बोरा?

जब लद्दाख के सेलिब्रिटी एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक उसी मैदान पर अनशन पर बैठे, तो देश भर के कैमरों और डिजिटल चैनलों की पूरी हेडलाइंस उन पर केंद्रित हो गईं. इसके विपरीत, ठीक उसी जगह, उन्हीं 21 से 23 दिनों तक नीट (NEET) पेपर लीक जैसी देश की सबसे बड़ी छात्र त्रासदी के खिलाफ अपनी जान की बाजी लगाने वाली जेएनयू स्कॉलर नेहा बोरा की कवरेज मीडिया से लगभग गायब रही. इसका एनालिसिस ये निकला कि उनकी उपेक्षा के दो बड़े कारण बने. पहला ये कि नेहा बोरा का लेफ्ट छात्र संगठन AISA से जुड़ा होना, जिसके कारण उनकी इमेज जेएनयू एक्टिविज्म के चश्मे से देखा गया. दूसरा, मेनस्ट्रीम मीडिया जिसने मुश्किल से वांगचुक को तो कवर किया लेकिन नेहा में कोई खास इंटरेस्ट नहीं दिखाया. 

मुद्दा एक तो नेहा-वांगचुक क्यों अलग-अलग?

आंदोलन के दौरान यह सवाल भी उठा कि नेहा और आइसा के छात्रों का मंच सोनम वांगचुक के मुख्य मंच से अलग क्यों था? सोशल मीडिया पर मतभेदों की अफवाहों को खारिज करते हुए नेहा बोरा ने खुद कहा कि मुद्दा एक है और संघर्ष भी एक है. दरअसल, कॉकरोच जनता पार्टी के आयोजक और प्रवक्ता यह चाहते थे कि आंदोलन का मुख्य फोकस और लाइमलाइट सोनम वांगचुक पर केंद्रित रहे. नेहा ने भी साफ किया कि वो कभी भी 'स्टेज' या जगह के लिए राजनीति नहीं करतीं, बल्कि छात्रों के बुनियादी सुधारों के लिए लड़ती हैं. अलग मंच होने के बावजूद दोनों खेमे जमीन पर एक-दूसरे की मदद कर रहे थे, एक-दूसरे का हालचाल ले रहे थे और उनके बीच कोई वैचारिक टकराव नहीं था.

नेहा ने CJP की सराहना की तो अभिजीत ने नेहा की!

AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते नेहा बोरा की अपनी एक मजबूत राजनीतिक और वैचारिक लाइन थी, लेकिन सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके के प्रति उनकी राय बेहद सम्मानजनक रही. जब सोशल मीडिया पर ये अफवाह उड़ी कि छात्रों का मंच अलग होने के कारण दोनों गुटों में मतभेद हैं तो नेहा ने कहा कि, 'सोनम वांगचुक का इस उम्र में 21 दिनों तक छात्रों के लिए भूखे रहना हमारे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है. यह संघर्ष स्टेज या मंच की होड़ का नहीं बल्कि देश के युवाओं को न्याय दिलाने का है.'

नेहा ने अभिजीत दीपके की सीजेपी मुहिम की भी सराहना करते हुए कहा था कि सीजेपी ने देश के बेरोजगार युवाओं और नीट परीक्षा के पीड़ितों के गुस्से को एक रचनात्मक और व्यंग्यात्मक मंच दिया, जिससे लाखों छात्र इस लड़ाई से जुड़ सके. नेहा कहती रहीं कि भले ही उनके काम करने के तरीके अलग हों, लेकिन उनका लक्ष्य एक ही है, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही तय करना.

मंच जरूर रहा लेकिन सोनम वांगचुक और 'कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इस आंदोलन में नेहा बोरा के चट्टानी इरादों की खुलकर सराहना की है. जब दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक को जबरन मंच से हटाकर अस्पताल में भर्ती कराया, तो अभिजीत दीपके ने मंच पर भावुक होते हुए कहा था, 'सोनम सर को ले जाने के बाद भी हमारी ताकत कम नहीं हुई है, क्योंकि नेहा बोरा जैसी देश की बेटियां जंतर-मंतर पर अग्रिम मोर्चे पर डटी हुई हैं'.

सोनम वांगचुक ने भी अस्पताल जाने से पहले युवाओं और छात्रों के जज्बे को सलाम किया था, खासकर उन छात्र नेताओं (नेहा, मनीष, आमीन) को, जिन्होंने बिना अन्न-जल के इस आंदोलन की मशाल को चौबीसों घंटे जलाए रखा. दीपके ने साफ तौर पर माना कि भले ही सीजेपी एक अलग डिजिटल और युवा-केंद्रित अभियान के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन जमीन पर नेहा बोरा की वैचारिक परिपक्वता और जमीनी पकड़ ने इस धरने को एक व्यापक छात्र आंदोलन में बदल दिया.

कौन हैं नेहा बोरा?

नेहा बोरा की लाइफ जर्नी एक सामान्य परिवार की लड़की के नेशनल फेस बनने की कहानी है. नेहा बोरा की कहानी में कई राज्यों से होते हुए जंतर मंतर पहुंची. नेहा बोरा असम की है. उनका परिवार उत्तर प्रदेश और सिलीगुड़ी में भी रहा. नेहा का बचपन सिलीगुड़ी में बीता. उन्होंने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS), सिलीगुड़ी से पूरी की. बचपन से ही पढ़ाई और सामाजिक बहसों में आगे रहने वाली नेहा हायर एजुकेशन के लिए दिल्ली आईं, जहां उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) से सोशियोलॉजी में ग्रेजुएशन किया. इसके बाद उन्होंने अंबेडकर विश्वविद्यालय से अपनी आगे की पढ़ाई की और फिर देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी JNU में पीएचडी रिसर्चर बनकर एडमिशन लिया. इसी सफर के दौरान वे छात्र अधिकारों और सामाजिक आंदोलनों का हिस्सा बनीं.

क्रांतिकारी लड़की के तौर पर बनाया पहचान!

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की पीएचडी स्कॉलर नेहा बोरा आज देश के युवाओं और छात्र राजनीति की सबसे बुलंद आवाज बन चुकी हैं. उत्तराखंड की रहने वाली 25 साल नेहा ने बहुत कम समय में पहचान बनाई. लेफ्ट छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में, नेहा जेएनयू कैंपस से लेकर देश भर में शिक्षा के निजीकरण, फीस वृद्धि और सामाजिक न्याय जैसे बड़े मुद्दों पर लगातार विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करती आई हैं. जेएनयू में उन्हें क्रांतिकारी लड़की के तौर पर देखा जाता है, जो हर नौजवानों, नागरिकों मुद्दे पर मुस्तैदी से खड़ी मिलती हैं. नेहा जेएनयू से Sociology में ही अपनी पीएचडी (PhD) की पढ़ाई कर रही हैं.

'सुधार के लिए जमीन पर उतरना जरूरी'

नेहा का मानना है कि केवल किताबों में समाज को पढ़ना काफी नहीं है, बल्कि उसके सुधार के लिए जमीन पर उतरना जरूरी है. यही वजह है कि वे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और भाषणों में अक्सर 'ब्राह्मणवाद', जातीय भेदभाव और जेंडर जस्टिस  जैसे गंभीर अकादमिक विषयों पर बेहद तार्किक और बेबाक ढंग से अपनी राय रखती हैं. समाजशास्त्र की इसी गहरी समझ के कारण वे शिक्षा के निजीकरण (Privatization) और पेपर लीक जैसी राष्ट्रीय समस्याओं को केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं मानतीं, बल्कि इसे एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट मानती हैं, जो गरीब और पिछड़े वर्ग के छात्रों को उच्च शिक्षा से पूरी तरह बेदखल कर देता है.

नेहा के साथ देने वाले दो छात्र कौन?

आंदोलन की शुरुआत अभिजीत दीपके के सोशल मीडिया पर बनाए गए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम की डिजिटल अभियान से हुई थी, जो बेरोजगार युवाओं और छात्रों की आवाज उठाने के लिए शुरू हुआ था. जब देश के इस सबसे बड़े छात्र आंदोलन को समर्थन देने लद्दाख वाले सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पहुंचे, तो नेहा बोरा और आइसा के छात्र भी इस महा-आंदोलन का मुख्य हिस्सा बन गए. नेहा और अन्य छात्र नेताओं ने सोनम वांगचुक के साथ कदम से कदम मिलाकर इस आंदोलन को आगे बढ़ाया, जिससे यह लड़ाई केवल छात्रों की न रहकर एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गई.

नेहा के साथ दो और छात्र भी साथ डटे रहे. आमीन अमितोज दिल्ली की डॉ. बी.आर. आंबेडकर यूनिवर्सिटी में अर्बन स्टडीज के पीएचडी रिसर्चर हैं. पंजाब के रहने वाले आमीन 2020-21 के किसान आंदोलन में भी सक्रिय रहे थे. तीसरे अनशनकारी मनीष कुमार AISA के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान से पीएचडी कर रहे हैं. 

शबाना आजमी ने ऐसा तुड़वाया नेहा का अनशन!

जब नेहा बोरा जंतर-मंतर पर मौत से जूझते हुए आमरण अनशन पर बैठी थीं, तब उनका परिवार पल-पल एक गहरी मानसिक और भावनात्मक प्रताड़ना से गुजर रहा था. एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए अपनी 25 साल बेटी को इस तरह बिना अन्न-जल के जिंदगी दांव पर लगाते देखना किसी बेहद दर्दनाक अग्निपरीक्षा से कम नहीं था. जैसे-जैसे नेहा का वजन गिर रहा था और डॉक्टरों ने उनके कोमा में जाने की चेतावनी दी, वैसे-वैसे उनके माता-पिता और परिजनों की सांसें अटक रही थीं. परिवार लगातार नेहा से अपनी जिद छोड़ने और जान बचाने की गुहार लगा रहा था.

जब नेहा बोरा अलग-थलग अपनी लड़ाई लड़ती रहीं तब शबाना आजमी का आना उनके लिए जीवनदान बना. इस अनोखी कहानी का समापन भी उतना ही भावुक था. जब अभिनेत्री शबाना आजमी मंच पर पहुंचीं, तो उन्होंने नेहा की राजनीतिक विचारधारा पर बात नहीं की, बल्कि एक मां और देश के नागरिक के तौर पर सीधे नेहा के उस कमजोर हाथ को अपने हाथों में ले लिया, जो 23 दिनों से कांप रहा था. शबाना आजमी ने नेहा के हाथों को चूमते हुए कहा कि, 'हमें सरकार को जगाने के लिए तुम्हारी लाश नहीं, बल्कि इस लड़ाई को आगे ले जाने के लिए तुम्हारा जिंदा रहना जरूरी है.' यह इस आंदोलन की सबसे बड़ी जीत थी कि एक छात्र नेता की भूख ने देश के सबसे बड़े बुद्धिजीवियों और आम परिवारों के दिलों में सोई हुई चेतना को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया था. इसी भावुक अपील और बड़ों के मान को रखते हुए नेहा बोरा ने मनीष और आमीन के साथ शबाना आजमी के हाथों से पानी पीकर अपना अनशन तोड़ा.

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