Delhi Traffic Rule: दिल्ली-NCR में पुरानी गाड़ियों की नो-एंट्री, चेक करें अपनी गाड़ी का स्टेटस और जानें किसे मिली छूट

अलका कुमारी

02 Nov 2026 (अपडेटेड: Nov 2 2026 4:53 PM)

दिल्ली में 1 नवंबर से बाहर से आने वाले गैर-BS-V वाहनों की एंट्री पर रोक लगा दी गई है, जिससे NCR के लाखों पुराने वाहन प्रभावित होंगे. हालांकि, सीएनजी, इलेक्ट्रिक और आपातकालीन वाहनों को इस प्रतिबंध से छूट दी गई है और बॉर्डर पर हाई-टेक कैमरों से सख्त निगरानी की जा रही है.

दिल्ली में गाड़ियों को लेकर आया नया नियम
दिल्ली में गाड़ियों को लेकर आया नया नियम
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क्या आप भी रोज नोएडा, गुरुग्राम या गाजियाबाद से दिल्ली सफर करते हैं? अगर हां तो ये खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. दरअसल दिल्ली में सर्दियों में बढ़ने वाले पॉल्यूशन पर लगाम कसने के लिए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान यानी GRAP का नया नियम लागू हो चुका है. इस नए नियम के तहत 1 नवंबर यानी रविवार से दिल्ली में उन तमाम गाड़ियों की एंट्री पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है जो बाहर के राज्यों में रजिस्टर्ड हैं और 'बीएस-6' यानी भारत स्टेज-6 के मानकों पर खरी नहीं उतरतीं. 

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ये नियम दिल्ली-NCR के लिए बने विंटर एक्शन प्लान यानी  GRAP का हिस्सा है. जो अगले साल 31 जनवरी 2027 तक लागू रहने वाला है. अब आप सोच रहे होंगे कि इसका आम लोगों, रोज दफ्तर जाने वालों और कारोबारियों पर क्या असर पड़ेगा? आइए समझते हैं कि आपको या आपके किसी जानने वाले को बॉर्डर पर परेशानी का सामना न करना पड़े. 

सबसे पहले समझिए BS-6 मानक से नीचे कितनी गाड़ियां आती हैं

परिवहन विभाग के शुरुआती अनुमानों पर अगर नजर डालें तो दिल्ली से सटे पड़ोसी जिलों जैसे गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में BS-6 मानक से नीचे की यानी BS-4 गाड़ियों की संख्या 10 लाख से भी ज्यादा है. 

अकेले नोएडा-ग्रेटर नोएडा में ही ऐसी 4 लाख से ज्यादा गाड़ियां हैं जिनमें आधी से ज्यादा बीएस-4 पेट्रोल कारें हैं, जबकि गुरुग्राम-फरीदाबाद में करीब 2 लाख ऐसे वाहनों के साथ 50,000 कमर्शियल गाड़ियां शामिल हैं. हालांकि इसका ये बिल्कुल मतलब नहीं है कि कल आप बॉर्डर पार करेंगे और इनमें से हर गाड़ी को वापस लौटा दिया जाएगा, क्योंकि प्रशासन ने सीएनजी, इलेक्ट्रिक और जरूरी सेवाओं वाले वाहनों को स्पष्ट छूट दी है. 

किन गाड़ियों को मिलेगी एंट्री और किसे लौटना होगा वापस?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि बॉर्डर पर किस-किस को एंट्री मिलेगी और किसे वापस लौटना पड़ेगा. तो जान लीजिए कि अगर आपकी गाड़ी CNG या पूरी तरह इलेक्ट्रिक है  तो चिंता की कोई बात नहीं है, चाहे उसका मॉडल पुराना हो, सीएनजी और ईवी वाहनों को इस एंट्री बैन से पूरी तरह छूट दी गई है.  इसके अलावा एम्बुलेंस या फायर ब्रिगेड जैसी इमरजेंसी गाड़ियों पर ये नियम लागू नहीं होगी.

इसके अलावा अगर आपकी गाड़ी दिल्ली नंबर (DL) की है तो आप पर ये विशेष बॉर्डर बैन लागू नहीं होता. हां, इसका मतलब ये नहीं है कि दिल्ली वालों के लिए कोई नियम नहीं हैं. दिल्ली के अपने वाहनों पर प्रदूषण, उम्र सीमा और दूसरे ट्रैफिक नियम पहले की तरह सख्ती से लागू रहेंगे.

इस नए नियम का सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा?

यह नया नियम सबसे ज्यादा चुभेगा उन आम नौकरीपेशा लोगों, रोज आने-जाने वालों और छोटे दुकानदारों या कारोबारियों को जो हर रोज नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद या फरीदाबाद से बॉर्डर पार करके दिल्ली नौकरी या व्यापार के सिलसिले में आते हैं. अगर उनके पास डीजल या पेट्रोल की पुरानी BS-4 गाड़ी है तो अब उन्हें सफर के दूसरे विकल्पों के बारे में सोचना होगा. 

अब समझिए BS-4 और BS-6 क्या होता है 

सीधे शब्दों में कहें तो यह सरकार द्वारा तय किया गया एक ऐसा पैमाना है जो यह कंट्रोल करता है कि हमारी गाड़ियां सड़कों पर चलते वक्त हवा में कितना धुआं और प्रदूषण छोड़ेंगी. इस व्यवस्था की शुरुआत सरकार ने साल 2000 में की थी. भारत में BS-4 मानक देशभर में 2017 से लागू हुआ था. इसके बाद तकनीक और प्रदूषण पर लगाम कसने की जरूरत को देखते हुए भारत ने बीच के यानी 'BS-5' चरण को पूरी तरह बाय-बाय कह दिया और सीधे 1 अप्रैल 2020 से देश में 'BS-6' के कड़े नियम लागू कर दिए. पुरानी 'बीएस-4' गाड़ियों के मुकाबले नई 'बीएस-6' तकनीक वाली गाड़ियां बहुत कम प्रदूषण फैलाती हैं और पर्यावरण के लिहाज से काफी साफ-सुथरी मानी जाती हैं. 

आखिर BS-4 और BS-6 गाड़ियों में असल फर्क क्या है?

अगर सीधे और आसान शब्दों में समझें तो दोनों के बीच का सबसे बड़ा अंतर खतरनाक गैसों और धुएं के कणों को छोड़ने की तय सीमा का है. इसे ऐसे समझिए कि पुरानी BS-4 गाड़ी जहां हर किलोमीटर पर करीब 250 मिलीग्राम नाइट्रोजन ऑक्साइड हवा में छोड़ती है, वहीं नई 'BS-6' तकनीक इसे घटाकर महज 80 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर पर ले आती है. इसके अलावा BS-4 इंजन जहां प्रति किलोमीटर 25 मिलीग्राम पार्टिकुलेट मैटर यानी कालिख और सूक्ष्म कण रिलीज करता है वहीं 'BS-6' गाड़ियों में ये गिरकर सिर्फ 4.5 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर रह जाता है, जिससे साफ होता है कि नई तकनीक प्रदूषण को काफी हद तक काबू में रखती है. 

क्या BS-4 की गाड़ी को BS-6 में करा सकते हैं मोडिफाई

मौजूदा भारतीय कानूनों और मोटर व्हीकल नियमों के हिसाब से किसी भी पुरानी गाड़ी को BS-4 से BS-6 में बदलना कानूनी तौर पर बिल्कुल मुमकिन नहीं है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि किसी भी वाहन का 'भारत स्टेज' एमिशन स्टैंडर्ड सीधे तौर पर उसके इंजन की बनावट और उसके मैन्युफैक्चरिंग सर्टिफिकेशन से पक्के तौर पर जुड़ा होता है. एक बार जब कोई गाड़ी रजिस्टर्ड हो जाती है, तो उसकी आरसी यानी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट पर दर्ज इस एमिशन लेवल को बाद में बदला नहीं जा सकता. 

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के नियमों के मुताबिक, देश में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है जिसके तहत किसी चलती-फिराती गाड़ी की एमिशन कैटेगरी को अपग्रेड किया जा सके. यानी आरसी पर जो भारत स्टेज लेवल लिख गया, वही अंतिम और पक्का माना जाता है. ऐसे में, अगर आप गाड़ी के इंजन में बाहर से कोई बड़े बदलाव या मोडिफिकेशन करवा भी लें, तब भी कागजों और कानून की नजरों में आपकी वह गाड़ी हमेशा 'बीएस-4' ही बनी रहेगी, उसे किसी भी सूरत में कानूनी तौर पर 'बीएस-6' वाहन नहीं माना जाएगा. 

नए नियम के तहत बॉर्डर पर कैसी होगी चेकिंग?

इस बार प्रशासन किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है और चेकिंग का पूरा तरीका एकदम हाई-टेक कर दिया गया है. दिल्ली की सीमाओं पर आने-जाने वाले रास्तों और चुनिंदा लेनों पर ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन यानी ANPR कैमरे फिट कर दिए गए हैं, जो तेजी से निकलती गाड़ियों की नंबर प्लेट को तुरंत स्कैन करके यह बता देते हैं कि गाड़ी तय नियमों के हिसाब से सही है या नहीं. 

इसके अलावा, नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद और फरीदाबाद से दिल्ली में एंट्री करने वाले सभी अहम पॉइंट्स पर ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग की टीमें पूरी मुस्तैदी के साथ तैनात हैं. साथ ही यह बात भी अच्छी तरह गांठ बांध लें कि अगर आपकी गाड़ी बीएस-6  मानक वाली भी है, तब भी आपके पास गाड़ी का वैध प्रदूषण यानी PUC सर्टिफिकेट होना बेहद जरूरी है, क्योंकि इसके बिना आपको दिल्ली में घुसने नहीं दिया जाएगा।

गाड़ियों के धुंए प्रदूषण के लिए कितने जिम्मेदार

हम अक्सर यही सोचते हैं कि गाड़ियों से निकलने वाला धुआं सिर्फ आसमान को धुंधला करता है लेकिन इसका सीधा और घातक असर हमारे फेफड़ों और सेहत पर पड़ता है, क्योंकि 2018 की एक स्टडी बताती है कि अकेले दिल्ली में पैदा होने वाले कुल नाइट्रोजन ऑक्साइड का 81% हिस्सा सिर्फ गाड़ियों के धुएं से आता है जो हवा में मिलकर फेफड़ों में जलन पैदा करने वाली ओजोन और जहरीले कण बनाता है. वहीं आईआईटी कानपुर की विंटर स्टडी के मुताबिक सर्दियों में हवा में तैरने वाले खतरनाक पीएम 2.5 (PM2.5) कणों का 17% हिस्सा सीधे गाड़ियों के धुएं से और 32% हिस्सा हवा में गैसों की रासायनिक प्रतिक्रिया से बनने वाले सेकंडरी पार्टिकल्स से आता है, यानी कुल मिलाकर आधे के करीब प्रदूषण के लिए परिवहन सीधे या परोक्ष रूप से जिम्मेदार होता है. 

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