11 महीने की फीस एडवांस ली, पर ढंग का खाना तक न दिया... दिल्ली हादसे में जान गंवाने वाले अभिषेक के पिता का छलका दर्द!

न्यूज तक डेस्क

• 11:11 AM • 08 Sep 2026

दिल्ली के सत्या निकेतन में जर्जर इमारत ढहने से बीकॉम के होनहार छात्र अभिषेक की दर्दनाक मौत हो गई, जिसके बाद मणिकर्णिका घाट पर पार्थिव शरीर पहुंचते ही परिजनों में कोहराम मच गया.

सत्य निकेतन हादसा
सत्य निकेतन हादसा
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"बच्चों को बचपन से पाल-पोसकर बड़ा करने वाला बाप ही जानता है कि औलाद को खोने का दर्द क्या होता है...." ये भारी शब्द उस बेबस पिता के हैं, जिसने दिल्ली के सत्या निकेतन में हुए दर्दनाक हादसे में अपने 20 साल के होनहार बेटे को खो दिया. चंदौली के झांसी गांव का रहने वाला अभिषेक कुमार बीकॉम सेकेंड ईयर का छात्र था और अपने उज्ज्वल भविष्य के सपने बुन रहा था. लेकिन एक जर्जर इमारत के जमींदोज होने से उसके सारे सपने हमेशा के लिए मलबे में दफन हो गए.

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मंगलवार को जब अभिषेक का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पहुंचा, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं. गमगीन माहौल के बीच अभिषेक के पिता, पेशे से इंजीनियर संतोष खरवार ने रोते-बिलखते हुए दिल्ली के हॉस्टल और पीजी सिस्टम की काली सच्चाई उजागर की.

पीजी और हॉस्टल के काले खेल की खोली पोल

दिवंगत छात्र के पिता ने रुंधे गले से बताया कि दिल्ली के सत्या निकेतन जैसे इलाकों में छात्रों का किस कदर शोषण होता है. उन्होंने बताया कि पीजी संचालक 11 महीने का किराया एक साथ एडवांस जमा करा लेते हैं. अभिषेक का प्रति माह किराया 13,000 रुपये था.

उन्होंने बताया कि पैसा फंस जाने के डर से छात्र घटिया व्यवस्थाओं के बावजूद वहां रहने को मजबूर हो जाते हैं. अगर कोई बच्चा पीजी छोड़ना चाहे, तो जमा राशि डूब जाती है. संतोष खरवार ने बताया कि अभिषेक अक्सर पीजी के घटिया खाने की शिकायत करता था. वे खुद बेटे को बाहर से खाना खाने की सलाह देते थे. इतना पैसा वसूलने के बाद भी बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं होतीं.

मकान मालिक की लापरवाही ने ली मासूम की जान

अभिषेक मोतीलाल नेहरू कॉलेज में पढ़ाई के साथ-साथ एमबीए (MBA) प्रवेश परीक्षा की तैयारी भी कर रहा था. हादसे से ठीक एक दिन पहले, 5 सितंबर को पिता से उसकी आखिरी बार बात हुई थी, जब उन्होंने हॉस्टल की फीस ट्रांसफर की थी.

पिता का साफ कहना है कि इस पूरे हादसे का जिम्मेदार इमारत का मालिक है. अगर बिल्डिंग में मरम्मत या निर्माण का काम चल रहा था, तो सुरक्षा के लिहाज से सबसे पहले वहां रह रहे छात्रों को बाहर निकाला जाना चाहिए था. उन्होंने दिल्ली सरकार और प्रशासन से गुहार लगाई है कि व्यवस्था को जल्द से जल्द दुरुस्त किया जाए, ताकि भविष्य में किसी और मां-बाप की गोद सूनी न हो.

मां का रो-रोकर बुरा हाल

घाट पर मौजूद अभिषेक की मां की हालत देख हर किसी का कलेजा कांप उठा. अपने कलेजे के टुकड़े को खो चुकी मां कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थीं. पत्रकार जब भी उनसे कुछ पूछने की कोशिश करते, वे बस फफक-फफक कर रो पड़तीं.

सत्या निकेतन में हुए इस भयावह हादसे में कुल 7 लोगों की जान गई है, जिनमें से 5 मासूम छात्र थे. अभिषेक के जाने से उसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है, वहीं इस घटना ने एक बार फिर महानगरों में चल रहे अवैध और असुरक्षित पीजी-हॉस्टल्स पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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