डूसू चुनाव के इस बार के नतीजों ने एक बात बिल्कुल साफ कर दी है कि जीत उसी को मिलेगी जो जमीन पर मेहनत करेगा और छात्रों के साथ सड़कों पर संघर्ष करेगा. इसका एक बड़ा उदाहरण NSUI से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले दीपांशु शौकीन रहे, जिन्हें डीयू के इतिहास का अब तक का सबसे ज्यादा वोट मिला. उन्होंने एकतरफा मुकाबले में एबीवीपी को वाइस प्रेसिडेंट (VP) की पोस्ट पर हरा दिया, जबकि एबीवीपी ने बाकी तीनों पोस्टों पर एनएसयूआई का सूपड़ा साफ कर दिया था. इसके अलावा, छात्र सभा से टिकट पाने वाले विशेष यादव को भी एनएसयूआई का संभावित उम्मीदवार माना जा रहा था, लेकिन टिकट न मिलने पर उन्होंने छात्र सभा के टिकट पर चुनाव लड़ा और अंत तक कड़ी टक्कर दी.
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नेहा बोरा की AISA और लेफ्ट का प्रदर्शन
इस बार के डूसू चुनाव में नेहा बोरा की आईसा (AISA) ने एसएफआई (SFI) के साथ मिलकर लेफ्ट संगठन को एकजुट कर चुनाव लड़ा था. आपको बता दें कि नेहा बोरा ने Gen Z(जेन जी) के प्रोटेस्ट में जंतर-मंतर पर 23 दिनों तक हंगर स्ट्राइक की थी, जिसके बाद उनका नाम देश भर में चर्चा में आया और वह देश भर में जेन जी आउटरेच प्रोग्राम भी कर रही हैं. चुनाव में प्रेसिडेंट पद पर आईसा-एसएफआई की उम्मीदवार अनन्या रतूड़ी को 5377 वोट मिले, जबकि वाइस प्रेसिडेंट पद पर अक्षत सरकार को 2383 वोट हासिल हुए. वहीं सेक्रेटरी पद पर चुनाव लड़ रहे स्टेंजिन डेस्क को 8734 वोट मिले और ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर बी. परिजात को 5837 वोट प्राप्त हुए..
क्या लेफ्ट के अलग लड़ने से हुई एनएसयूआई की हार?
चुनाव परिणामों के बाद यह बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या लेफ्ट संगठन और आईसा के अलग चुनाव लड़ने की वजह से एनएसयूआई को हार का सामना करना पड़ा? आंकड़ों के मुताबिक, प्रेसिडेंट पद पर एनएसयूआई के उम्मीदवार विजय शंकर मीणा की हार का अंतर महज 2000 वोटों के आसपास था, जबकि आईसा उम्मीदवार को 5000 से ज्यादा वोट मिले थे. अगर लेफ्ट और एनएसयूआई मिलकर चुनाव लड़ते, तो प्रेसिडेंट, सेक्रेटरी और ज्वाइंट सेक्रेटरी इन तीनों सीटों पर विपक्षी गठबंधन की जीत हो सकती थी. ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर एबीवीपी ने महज 337 वोटों से जीत दर्ज की, जहां एनएसयूआई और लेफ्ट के कुल वोट मिलकर जीत का अंतर आसानी से तय कर सकते थे.
विपक्षी एकता और भविष्य के लिए सबक
डूसू चुनाव के इन नतीजों ने विपक्षी पार्टियों के लिए एक बड़ा सबक छोड़ा है कि अगर वे एकजुट होकर नहीं लड़ेंगे, तो इसी तरह हार का सामना करना पड़ेगा. जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद देश भर में जो एक मोमेंटम बनकर उभरा था, उसने डूसू चुनाव के नतीजों के बाद कहीं न कहीं उस गति को प्रभावित किया है. जहां विपक्षी दल अन्य राज्यों और चुनावों में साथ मिलकर गठबंधन के तहत चुनाव लड़ते हैं, वहीं डूसू जैसे महत्वपूर्ण और नैरेटिव सेट करने वाले चुनाव में आपसी एकता का अभाव देखने को मिला. सोशल मीडिया पर भी यह सवाल उठ रहे हैं कि यदि डूसू चुनाव में भी गठबंधन होता, तो चुनावी तस्वीर कुछ और ही होती.
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