यमुना किनारे बसे 310 परिवारों को खाली करना होगा घर, क्या उजड़ जाएगी निगम बोध घाट की यह पुरानी बस्ती, जानें पूरा मामला

दिल्ली के यमुना बाजार में 310 परिवारों को 15 दिनों में घर खाली करने का नोटिस मिलने से बेघर होने का डर और भारी आक्रोश है. स्थानीय निवासी इस कार्रवाई को पक्षपातपूर्ण बता रहे हैं और कोर्ट के स्टे ऑर्डर व पुनर्वास के वादे का हवाला देकर न्याय की गुहार लगा रहे हैं.

यमुना किनारे बसे लोग
यमुना किनारे बसे लोग

सुशांत मेहरा

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दिल्ली की लाइफलाइन कही जाने वाली यमुना के किनारे सालों से सैकड़ों परिवार बसे हुए हैं लेकिन आज उनकी आंखें नम हैं. दरअसल निगम बोध घाट के ठीक पास स्थित यमुना बाजार कॉलोनी के करीब 310 परिवारों को प्रशासन एक ऐसा नोटिस दे दिया है, जिसने सालों से यहां रह रहे लोगों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है. 

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क्या है पूरा मामला?

दिल्ली सरकार की ओर से जारी इस नोटिस में यमुना बाजार कॉलोनी को O-Zone यानी यमुना फ्लडप्लेन का हिस्सा बताया गया है. प्रशासन का कहना है कि यह इलाका डूब क्षेत्र में आता है और यहां किसी भी तरह का पक्का निर्माण गैर-कानूनी है. मानसून के दौरान हर साल यहां बाढ़ का खतरा बना रहता है जिससे जान-माल का नुकसान होने की आशंका रहती है. इसी को आधार बनाकर लोगों को अगले 15 दिनों के भीतर अपने घर खाली करने का अल्टीमेटम दिया गया है.

अपनों की चिंता और प्रशासन पर सवाल

कॉलोनी के निवासियों में इस वक्त डर और गुस्से का मिला-जुला माहौल है. स्थानीय निवासी सुनील शर्मा प्रशासन की मंशा पर सीधे सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है, 

"अगर यह 'ओ-जोन' है और यहां खतरा है तो प्रशासन ओखला तिब्बत मार्केट जैसे अन्य इलाकों को क्यों नहीं हटा रहा? पास में ही एक निजी अस्पताल भी इसी जोन में खड़ा है जो हर साल पानी में डूबता है, उस पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? सिर्फ गरीबों के आशियानों पर ही बुलडोजर का डर क्यों?"

कानूनी दांव-पेंच में फंसी जिंदगियां

कॉलोनी के लोगों का दावा है कि जिस जमीन से उन्हें हटाने की बात हो रही है, वह DDA (दिल्ली विकास प्राधिकरण) की है. निवासियों का कहना है कि उनके पास हाई कोर्ट का स्टे ऑर्डर है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब मामला कोर्ट में पेंडिंग है तो प्रशासन ने बेदखली का नोटिस किस आधार पर जारी कर दिया?

दशकों की यादें और अनिश्चित भविष्य

यमुना बाजार सिर्फ एक कॉलोनी नहीं, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों की पहचान है जो पिछले कई दशकों से यहां रह रहे हैं. किसी का रोजगार यहां से जुड़ा है, तो किसी के बच्चों का स्कूल. बुजुर्गों और महिलाओं की आंखों में अपने आशियाने को खोने का डर साफ दिखाई दे रहा है.

लोगों की मांगें क्या है

यहां के लोगों का कहानी है कि बिना किसी ठोस पुनर्वास योजना के उन्हें न हटाया जाए, उन्हें पहले 300 मीटर की दूरी पर बसाने का वादा किया गया था जो आज तक अधूरा है. ऐसे में बिना वैकल्पिक व्यवस्था के उन्हें बेघर करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है.

फिलहाल, 310 परिवारों की किस्मत का फैसला अब या तो सरकार के अगले कदम पर टिका है या फिर कोर्ट की चौखट पर. देखना होगा कि क्या प्रशासन इन लोगों को सुरक्षित आशियाना मुहैया कराता है या ये परिवार दिल्ली की सड़कों पर रातें गुजारने को मजबूर होंगे. यमुना के किनारे इस वक्त बाढ़ का पानी तो नहीं, लेकिन बेघर होने का खौफ जरूर उफान पर है.

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