दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के बाद AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा की एक टी-शर्ट चर्चा में आ गई है. 10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान नेहा बोरा जिस टी-शर्ट में नजर आईं, उस पर खोपड़ी का निशान बना था और उसके नीचे 'वन पीस' लिखा हुआ था. तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग इस सिंबल के मायने पूछ रहे हैं.
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सवाल यह है कि निशान केवल एक एनीमे सीरीज से जुड़ा है या इसके पीछे कोई व्यापक संदेश भी है? इसकी कहानी समुद्री लुटेरों के झंडों से शुरू होती है और आज के Gen-Z प्रदर्शनों तक पहुंचती है. नेपाल में सत्ता के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान भी इसी सीरीज से जुड़ा झंडा दिखाई दिया था. वहीं, इंडोनेशिया में भी इसका इस्तेमाल सरकार की नीतियों के प्रति असहमति जताने के लिए किया गया. आइए विस्तार से समझते हैं पूरी कहानी.
पहले समझिए, खोपड़ी वाले झंडे का इतिहास क्या है?
खोपड़ी और हड्डियों वाला झंडा लंबे समय से समुद्री लुटेरों की पहचान से जुड़ा रहा है. इसके शुरुआती रिकॉर्ड 17वीं सदी के आखिर तक मिलते हैं. करीब 1700 के आसपास समुद्री डाकू इमैनुएल विन के झंडे पर खोपड़ी, हड्डियों और घंटे वाला डिजाइन दर्ज किया गया था. 17वीं और 18वीं सदी में समुद्री लुटेरे अलग-अलग तरह के झंडों का इस्तेमाल करते थे. काले झंडे का इस्तेमाल कई बार सामने वाले जहाज को डराकर आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने के संकेत के रूप में किया जाता था. वहीं, लाल झंडा ज्यादा घातक इरादे का संकेत माना जाता था.
इन झंडों पर खोपड़ी, हड्डियों, कंकाल, तलवार और घंटे जैसे निशान बनाए जाते थे. इनका मकसद सिर्फ अपनी पहचान बताना नहीं था, बल्कि सामने वाले को खतरे का संदेश देना भी था. समुद्र में दूर से दिखाई देने वाले ये निशान विरोधी जहाज के सामने एक तरह की मनोवैज्ञानिक चुनौती पेश करते थे, यानी वह मुकाबला करें या आत्मसमर्पण कर दें.
'वन पीस' ने खोपड़ी वाले झंडे को कैसे दी नई पहचान?
साल 1997 में जापानी मंगा आर्टिस्ट इचिरो ओडा ने 'वन पीस' नाम की मंगा सीरीज शुरू की. इसकी कहानी समुद्री लुटेरों की दुनिया के इर्द-गिर्द घूमती है. इसका मुख्य किरदार मंकी डी. लूफी है, जिसका सपना दुनिया का सबसे बड़ा पाइरेट किंग बनना है. लूफी अपने साथियों के साथ समुद्र का सफर करता है और 'वन पीस' नाम के रहस्यमयी खजाने की तलाश में निकलता है. उसके समूह को स्ट्रॉ हैट पाइरेट्स कहा जाता है. इनके झंडे पर खोपड़ी बनी होती है, जिसके ऊपर स्ट्रॉ हैट दिखाई देता है.
सीरीज में लूफी और उसके साथी ताकतवर और दमनकारी शासकों के खिलाफ खड़े होते हैं. वे लोगों की मदद करते हैं और व्यवस्था को चुनौती देते हैं. इसी वजह से 'वन पीस' का यह सिंबल आजादी, विद्रोह और दमन के खिलाफ खड़े होने की पॉप-कल्चर भाषा के तौर पर देखा जाने लगा.
नेपाल के Gen-Z प्रदर्शनों में भी दिखा था 'वन पीस' का झंडा
नेपाल में Gen-Z के प्रदर्शनों के दौरान भी 'वन पीस' के स्ट्रॉ हैट पाइरेट्स वाला झंडा नजर आया था. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सरकार के बैन के विरोध से शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे बड़ा होता गया. इस दौरान युवाओं ने इस झंडे का इस्तेमाल सत्ता के खिलाफ विरोध और बदलाव की मांग के प्रतीक के तौर पर किया. प्रदर्शन के दौरान हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस के साथ झड़पों में कई लोगों की मौत हो गई. आखिरकार नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा. इस तरह 'वन पीस' से जुड़ा झंडा एनीमे की दुनिया से निकलकर युवाओं के विरोध प्रदर्शनों में भी दिखाई देने लगा.
इंडोनेशिया में भी सरकार के खिलाफ असहमति का प्रतीक बना
इंडोनेशिया में साल 2025 के दौरान 'वन पीस' का झंडा घरों, गाड़ियों, मोटरसाइकिलों और ट्रकों तक पर दिखाई देने लगा. शुरुआत में ट्रक ड्राइवरों ने सरकार की नीतियों और ओवरलोडिंग से जुड़े नियमों के खिलाफ अपनी नाराजगी जताने के लिए इसका इस्तेमाल किया. धीरे-धीरे यह झंडा युवाओं के प्रदर्शनों में भी दिखाई देने लगा. इस तरह 'वन पीस' का सिंबल मनोरंजन की दुनिया से आगे बढ़कर असहमति जताने और बदलाव की मांग करने वाले लोगों के बीच भी जगह बनाने लगा.
नेहा बोरा की टी-शर्ट क्यों खींच रही है ध्यान?
दिल्ली में 10 और 11 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के दौरान नेहा बोरा की टी-शर्ट पर बना 'वन पीस' का सिंबल चर्चा में आया. खोपड़ी और उसके नीचे लिखे ‘वन पीस’ को देखकर सोशल मीडिया पर लोग इसके अर्थ को लेकर सवाल कर रहे हैं. इस सिंबल की खास बात यह है कि इसकी ऐतिहासिक जड़ें समुद्री लुटेरों के झंडों तक जाती हैं, जबकि आधुनिक दौर में 'वन पीस' की कहानी ने इसे आजादी और दमनकारी ताकतों को चुनौती देने वाले प्रतीक के रूप में नई पहचान दी है. नेपाल और इंडोनेशिया के प्रदर्शनों में भी इसका इस्तेमाल देखा गया है.
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