Supreme Court On Cjp Protest: सुप्रीम कोर्ट में शनिवार को हुए CJP प्रदर्शन से जुड़े मामले में आज यानी रविवार को सुनवाई हुई. अदालत ने पूर्व में दिए गए आदेशों का पालन न होने और याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर संज्ञान लिया. कोर्ट ने अवमानना याचिकाओं और बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिए संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है.
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सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि वह अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर रही है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए. इस पर सॉलिसिटर जनरल ने आपत्ति जताई. इसपर जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि 'कारण बताओ नोटिस' और 'अवमानना नोटिस' में अंतर होता है.
9 अक्टूबर के पुराने आदेशों का दिया हवाला
अदालत ने अपने आदेश में पूर्व में (9/10/26 को) दिए गए निर्देशों को दोहराया. कोर्ट ने कहा था कि अधिकारी 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के फैसले पर पुनर्विचार करें. अदालत का मानना था कि मेट्रो और अन्य रेल सेवाओं का संचालन विनियमित किया जा सकता है, लेकिन उन्हें पूरी तरह से बंद नहीं किया जा सकता. इसके अलावा, यात्रियों की सुविधा के लिए नई ट्रैवल एडवाइजरी और पुनर्विचार के फैसलों को सार्वजनिक मंचों पर व्यापक रूप से प्रसारित करने का निर्देश दिया गया था.
मंगलवार तक जवाब दाखिल करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को एक संक्षिप्त हलफनामा जमा करने का निर्देश दिया है. इस हलफनामे के जरिए अधिकारियों को यह स्पष्ट करना होगा कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों शुरू न की जाए. अधिकारियों को अपने अनुपालन रिपोर्ट के साथ मंगलवार तक अब कोर्ट में जवाब देना है.
स्वतंत्रता और आवाजाही को लेकर वकीलों की गुहार
सुनवाई के दौरान वकीलों ने मेट्रो, ट्रेनों, इंटरनेट सेवा और लोगों की आवाजाही को सुचारू बनाने के लिए अंतरिम राहत की मांग की. वकीलों ने विशेष रूप से वकीलों, पत्रकारों और पेशेवरों की आवाजाही का मुद्दा उठाया. जब कुछ वकीलों ने टोकते हुए सभी नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही की मांग की, तो पीठ ने स्पष्ट किया कि आदेश में सभी व्यक्तियों की मुक्त आवाजाही की बात शामिल है.
सरकार का जवाब: 'सेवाएं पूरी तरह बहाल'
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को जानकारी दी कि क्षेत्र में इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गई हैं. उन्होंने बताया कि सभी मेट्रो स्टेशन और ट्रेनें अब पूरी तरह से चालू हैं. उन्होंने कोर्ट को आश्वासन दिया कि वकील, पत्रकार या अन्य पेशेवर अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों को निभाने में किसी भी तरह से बाधित नहीं होंगे.
मौखिक उल्लेख और याचिकाओं में लगाए गए आरोप
कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि कई मौखिक उल्लेखों के जरिए भी इसी तरह की प्रार्थनाएं की गई थीं. डॉ. गुरुस्वामी ने सूचीबद्ध मामलों में दलील देते हुए कहा कि मेट्रो स्टेशनों को जनता के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया था, जो कोर्ट के आदेश का जानबूझकर और इरादतन उल्लंघन है. इसके अलावा, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में उन्होंने कहा कि अवैध हिरासत का मामला केवल कुछ प्रमुख हस्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर में लगभग 7,000 लोगों की हिरासत से जुड़ा है.
केंद्र की ओर से आरोपों का खंडन
अन्य वकीलों ने भी मामले में हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल उचित सीमाओं के भीतर होना चाहिए. इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि जिन याचिकाओं का केवल मौखिक उल्लेख किया गया था, उनकी प्रतियां राज्य को नहीं सौंपी गई हैं, इसलिए वे तत्काल सहायता करने में असमर्थ हैं. उन्होंने दावों को खारिज करते हुए कहा कि दिल्ली मेट्रो सामान्य रूप से चल रही थी, केवल 303 में से 45 एंट्री पॉइंट्स को ही बंद किया गया था. उन्होंने बताया कि कल रात 10 बजे से सभी स्टेशन खोल दिए गए हैं.
सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर बीएनएसएस की धारा 163 का मुद्दा
सुनवाई में वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर बीएनएसएस (BNSS) की धारा 153/163 लागू किए जाने का मुद्दा भी उठाया. वकील गोपाल शंकरनारायणन ने इसे तुरंत हटाने की मांग की. उन्होंने बताया कि बाहर बोर्ड लगा है और वकीलों को प्रवेश करने से रोका जा रहा है. एक अन्य अधिवक्ता ने भी शिकायत की कि विरोध प्रदर्शन में शामिल न होने के बावजूद उन्हें रोका गया. इस पर सॉलिसिटर जनरल ने निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा और बताया कि सुप्रीम कोर्ट धारा 163 के तहत घोषित क्षेत्र के भीतर आता है. वहीं, जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि संवेदनशील सरकारी प्रतिष्ठानों में 163 लागू रहता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसे लागू नहीं किया जाता.
इनपुट:अनीशा माथुर
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