देश में चुनावी सुधारों, वोटर लिस्ट के मुद्दों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर छात्र संगठनों और युवाओं ने एक बार फिर मोर्चा खोल दिया है. इसी कड़ी में सौरव दास और नेहा बोरा समेत कई प्रमुख युवा चेहरे एक मंच पर आए हैं और आगामी 10 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन की घोषणा की है. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा कि, यह कॉल हिंदुस्तान के इतिहास में दर्ज की जाएगी, जहां तमाम वैचारिक मतभेदों और राजनीतिक बैनरों से ऊपर उठकर देश के आम नागरिक और युवा एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करेंगे.
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युवाओं को वोटर लिस्ट से बाहर रखने का गंभीर आरोप
प्रेस वार्ता के दौरान दोनों ही नेताओं ने सरकार और चुनाव आयोग पर तीखे हमले किए और आरोप लगाया कि सोची-समझी रणनीति के तहत देश के युवाओं (Gen-Z) को वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किया जा रहा है. उनका तर्क है कि सत्ता में बैठे लोग युवाओं के बढ़ते रुझान और बदलाव की हवा से घबराए हुए हैं, इसलिए वे नहीं चाहते कि देश का युवा वोटर बने और अपने मताधिकार का इस्तेमाल करे. नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि देश के नागरिकों से उनके वोट देने का अधिकार छीन लिया जाए, तो लोकतंत्र का कोई अस्तित्व नहीं बचेगा.
लंबे संघर्ष और सिस्टम में बदलाव की चेतावनी
आंदोलन के स्वरूप पर चर्चा करते हुए नेहा बोरा और सौरव दास ने साफ किया कि यह लड़ाई सिर्फ एक दिन की नहीं होगी, बल्कि यह एक लंबा संघर्ष हो सकता है. देश भर के विभिन्न राज्यों से युवाओं और छात्रों को दिल्ली पहुंचने का आह्वान किया गया है और लोगों से अपील की गई है कि वे अपने टिकट बुक कर लें क्योंकि जंतर-मंतर पर लंबे वक्त तक डटे रहने की तैयारी है. उन्होंने पिछले आंदोलनों का हवाला देते हुए अंदेशा जताया कि प्रशासन की तरफ से सख्ती या बाधाएं आ सकती हैं, लेकिन युवा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पीछे हटने वाले नहीं हैं.
चुनावी प्रक्रिया में बड़े सुधार और इस्तीफे की मांग
इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य सिर्फ तात्कालिक विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे इलेक्टोरल सिस्टम में सुधार लाना है. नेताओं ने मांग की है कि चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को पूरी तरह जवाबदेह बनाया जाए. उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल इस्तीफे से काम नहीं चलेगा, बल्कि चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और भविष्य में इस तरह की गड़बड़ियों को रोकने के लिए पुख्ता सिस्टमिक रिफॉर्म्स (व्यवस्थागत सुधार) लागू किए जाने चाहिए, ताकि देश के लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की जा सके.
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