CBSE 12th Result: डिजिटल चेकिंग या छात्रों के भविष्य से खिलवाड़? CBSE के नए 'OSM' सिस्टम पर क्यों भड़के छात्र और शिक्षक?

CBSE 12th Result: सीबीएसई द्वारा पहली बार लागू की गई डिजिटल ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम कॉपियों के धुंधलेपन और तकनीकी खामियों के कारण भारी विवादों में घिर गई है.

CBSE से क्यों नाराज हैं छात्र
CBSE से क्यों नाराज हैं छात्र

अनमोल नाथ

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CBSE Result Controversy: भारत के सबसे बड़े स्कूल बोर्ड यानी सीबीएसई (CBSE) ने इस साल अपनी परीक्षा प्रणाली को हाईटेक बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया था, लेकिन यही कदम अब लाखों छात्रों के भविष्य के लिए गले की फांस बन चुका है. साल 2026 की कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षा में पहली बार लागू की गई 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग' यानी कंप्यूटर पर कॉपियां जांचने की यह डिजिटल व्यवस्था इस वक्त भारी विवादों में घिरी हुई है. रिजल्ट आए कई हफ्ते बीत चुके हैं, लेकिन देश के हजारों होनहार छात्र अपनी कॉपियों की स्कैन कॉपी देखने के लिए आज भी तरस रहे हैं.  

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क्या है यह ऑन-स्क्रीन मार्किंग का पूरा खेल?

कई लोग सोच रहे होंगे कि आखिर ये नया सिस्टम क्या है, जिसने इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया? आसान शब्दों में कहें तो इसमें छात्रों की असली पेपर वाली आंसर शीट को हाई-क्वालिटी स्कैनर्स के जरिए कंप्यूटर पर अपलोड किया जाता है. इसके बाद कॉपियां जांचने वाले टीचर्स (इवैल्यूएटर्स) कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन पर देखकर नंबर देते हैं. 

सीबीएसई का दावा था कि इस डिजिटल जादुई छड़ी से मूल्यांकन बिल्कुल सटीक होगा नंबर जोड़ने में इंसानी गलतियां नहीं होंगी और पूरा प्रोसेस ट्रांसपैरेंट बनेगा. बोर्ड ने दलील दी कि विदेशों की परीक्षाओं और कई राज्य बोर्डों में यह तरीका पहले से ही सुपरहिट रहा है. लेकिन, शिक्षा जगत के दिग्गजों का मानना है कि इतने संवेदनशील और बड़े स्तर पर इसे लागू करने से पहले बोर्ड को जमीनी हकीकत परखनी चाहिए थी और इसकी अच्छी तरह टेस्टिंग करनी चाहिए थी.  

छात्रों का दर्द भी जान लीजिए 

जैसे ही कॉपियों की जांच के बाद रिजल्ट स्क्रीन पर खुला, छात्रों के चेहरों से हवाइयां उड़ गईं. नॉन-मेडिकल के छात्र स्पर्श हों या कॉमर्स के विवेक यादव और हैदर, ये तो बस कुछ चंद नाम हैं, इनके जैसे देश के हजारों स्टूडेंट्स का दावा है कि उन्हें उम्मीद से बेहद कम नंबर मिले हैं. परेशान छात्रों ने मीडिया से बातचीत में साफ कहा कि ये नंबर उनकी साल भर की तपस्या और परफॉर्मेंस के साथ भद्दा मजाक हैं. 

एक छात्र ने भावुक होकर बताया,  "हमने दिन-रात एक करके पढ़ाई की थी. जो नंबर हमें थमा दिए गए हैं, उन्हें देखकर यकीन ही नहीं होता कि यह हमारी ही लिखी हुई कॉपी के नंबर हैं."  गुस्सा सिर्फ घर तक सीमित नहीं रहा, सोशल मीडिया पर भी इसका विस्फोट हुआ. पेरेंट्स और स्टूडेंट्स ने इंटरनेट पर CBSE द्वारा भेजी गई स्कैन कॉपियों के जो स्क्रीनशॉट शेयर किए, उन्हें देखकर कोई भी सिर पकड़ ले. 

कॉपियां इतनी धुंधली, कटी-पटी और आधी-अधूरी स्कैन थीं कि उन्हें पढ़ना नामुमकिन था. अब सवाल ये उठ रहा है कि जब स्क्रीन पर आंसर दिख ही नहीं रहे थे तो टीचर्स ने नंबर किस आधार पर दिए? 

25 साल अनुभवी शिक्षक का खुलासा

इस पूरे मामले में चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब खुद कॉपियां जांचने वाले टीचर्स भी छात्रों के समर्थन में उतर आए. करीब 35 साल का टीचिंग और 25 साल का कॉपी चेकिंग का तजुर्बा रखने वाले फिजिक्स के सीनियर टीचर जी.के. श्रीवास्तव ने इस डिजिटल व्यवस्था की कलई खोलकर रख दी. उन्होंने बताया कि इस ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम को बिना सोचे-समझे बहुत ही जल्दबाजी में थोप दिया गया जबकि इसके लिए कम से कम 6 से 7 महीने की ट्रेनिंग और ट्रायल की जरूरत थी. 

श्रीवास्तव जी ने कड़वी सच्चाई बयां करते हुए कहा, "टीचर्स को इस नए सॉफ्टवेयर को चलाने की कोई खास ट्रेनिंग नहीं मिली थी. सबसे बड़ी आफत तो ये थी कि स्क्रीन पर दिखने वाली कॉपियां बेहद धुंधली थीं. छात्रों द्वारा बनाए गए डायग्राम्स और उनकी लेबलिंग साफ नजर ही नहीं आ रही थी, जिससे स्टेप मार्किंग करना एक तरह से असंभव हो गया."  

उन्होंने यह भी इशारा किया कि इस सिस्टम में सिर्फ उन बच्चों को फायदा मिला जिन्होंने रट्टा मारकर हूबहू एनसीईआरटी (NCERT) की किताबी भाषा लिखी थी, जबकि अपनी भाषा में सटीक जवाब लिखने वाले छात्रों के नंबर काट दिए गए. 

क्रैश हुआ पोर्टल, खाली मिलीं स्कैन कॉपियां

रिजल्ट से असंतुष्ट छात्रों को जब सीबीएसई ने रिवैल्यूएशन और कॉपियों की स्कैन प्रति मंगाने का विकल्प दिया, तो वहां भी तकनीकी अव्यवस्था का एक नया दौर शुरू हो गया. छात्रों का आरोप है कि फॉर्म भरने के दौरान वेबसाइट बार-बार क्रैश हो रही थी, सर्वर ठप पड़ा था और फीस जमा करने वाले पेमेंट गेटवे फेल हो रहे थे. कई छात्रों के साथ तो ऐसा हुआ कि बैंक खाते से पैसे कट गए, लेकिन जब कॉपी डाउनलोड हुई तो वह पूरी तरह से 'कोरा कागज' यानी खाली थी.

इंटरनेट पर छात्रों की शिकायतों की बाढ़ को देखते हुए सीबीएसई ने आवेदन की तारीख बढ़ाकर 25 मई 2026 तो कर दी लेकिन आखिरी दिन तक भी हजारों छात्र पोर्टल की खराबी के कारण अपना फॉर्म सबमिट नहीं कर पाए. 

विवाद की गूंज जब सोशल मीडिया से निकलकर दिल्ली के गलियारों तक पहुंची, तो केंद्र सरकार भी अलर्ट मोड में आ गई. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मामले की गंभीरता को देखते हुए देश के प्रतिष्ठित आईआईटी (IIT) संस्थानों के तकनीकी एक्सपर्ट्स को तलब किया है. इन आईटी विशेषज्ञों को सीबीएसई के इस डिजिटल सिस्टम का पोस्टमार्टम करने की जिम्मेदारी दी गई है ताकि पता लगाया जा सके कि आखिर सॉफ्टवेयर और स्कैनिंग के स्तर पर कहां बड़ी चूक हुई. 

भले ही सीबीएसई ने अभी तक ऑन स्क्रीन मार्किंग में किसी बड़ी गड़बड़ी या विफलता को आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया है, लेकिन आईआईटी के एक्सपर्ट्स को बुलाना और तारीखें आगे बढ़ाना खुद इस बात का कबूलनामा है कि पर्दे के पीछे कहानी बहुत खराब है. 

NEET के बाद अब CBSE: टूट रहा है छात्रों का भरोसा

यह पूरा बवाल ऐसे नाजुक मोड़ पर आया है जब देश का युवा वर्ग पहले से ही राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की साख को लेकर डरा हुआ है. अभी कुछ ही समय पहले हुए नीट (NEET-UG) पेपर लीक मामले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. ऐसे में देश के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले सीबीएसई बोर्ड का यह ढुलमुल रवैया छात्रों के मानसिक तनाव को दोगुना कर रहा है. निराश बैठे एक छात्र ने व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा,"हम सालों-साल कमरे में बंद होकर सिर्फ इसलिए मेहनत करते हैं कि एक दिन हमारा टैलेंट रंग लाएगा. पहले नीट का पेपर लीक हुआ और अब बोर्ड परीक्षा का यह डिजिटल तमाशा. ऐसा लगता है जैसे देश का पूरा सिस्टम ही हम छात्रों के खिलाफ खड़ा हो गया है."  

आज देश का हर अभिभावक और छात्र सिर्फ एक ही बुनियादी सवाल पूछ रहा है कि क्या डिजिटल बनने की इस अंधी दौड़ में बिना पूरी तैयारी के किए गए इस प्रयोग की भारी कीमत इन 17 लाख मासूम बच्चों को अपने करियर को दांव पर लगाकर चुकानी पड़ेगी?  

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