बंगाल चुनाव 2026: ममता का किला या बीजेपी की सेंधमारी...कौन मारेगा बाजी? जानिए राजदीप सरदेसाई का एनालिसिस

Rajdeep Sardesai Analysis on West Bengal Election: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में ममता बनर्जी का किला मजबूत रहेगा या बीजेपी दक्षिण बंगाल में बड़ी सेंधमारी करेगी? वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बंगाल चुनाव के नए समीकरणों का गहरा विश्लेषण किया है. जानिए किन 30-40 सीटों पर कांटे की टक्कर है और आखिर सत्ता की चाबी किसके हाथ लग सकती है.

Rajdeep Sardesai Analysis on West Bengal Election 2026
Rajdeep Sardesai Analysis on West Bengal Election 2026

न्यूज तक डेस्क

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के रण में इस बार मुकाबला केवल चेहरों का नहीं, बल्कि नए राजनीतिक समीकरणों का भी है. न्यूज़ तक के खास कार्यक्रम में तक चैनल्स के मैनेजिंग एडिटर मिलिंद खांडेकर और वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बंगाल चुनाव को लेकर चर्चाएं की. इस दौरान राजदीप सरदेसाई ने बंगाल की मौजूदा राजनीतिक स्थिति का बारीकी से एनालिसिस किया है. उनके अनुसार, इस बार का चुनाव स्विगी पॉलिटिक्स और एसआईआर जैसे नए कारकों के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ नजर आ रहा है. विस्तार से जानिए पूरी बात.

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नॉर्थ बंगाल बनाम साउथ बंगाल

बंगाल का चुनावी भूगोल दो हिस्सों में बंटा हुआ है. राजदीप सरदेसाई के मुताबिक, नॉर्थ बंगाल अब पूरी तरह से बीजेपी का गढ़ बन चुका है, जबकि दक्षिण बंगाल (कोलकाता और आसपास के इलाके) ममता बनर्जी का मजबूत किला रहा है. बीजेपी का इस चुनाव में पहला लक्ष्य 100 सीटों का आंकड़ा पार करना है. यदि बीजेपी दक्षिण बंगाल, विशेषकर कोलकाता के इर्द-गिर्द और 24 दक्षिण परगना में ममता के किले में सेंध लगाने में सफल रहती है, तभी वह सत्ता के करीब पहुंच सकती है.

'एसआईआर' फैक्टर- जीत-हार का नया गणित

इस चुनाव में सबसे बड़ी चर्चा एसआईआर प्रक्रिया को लेकर है, जिसके तहत करीब 90 लाख वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं. राजदीप ने इसे बंगाल चुनाव का 'X-फ़ैक्टर' बताया है. 44 ऐसी सीटें हैं जहां डिलीशन का आंकड़ा पिछली बार की जीत के मार्जिन से अधिक है. इनमें से 24 सीटें पिछले चुनाव में टीएमसी ने जीती थीं और 20 बीजेपी ने. यह कहना मुश्किल है कि यह प्रक्रिया किसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी, क्योंकि मतुआ और राजवंशी समाज (बीजेपी समर्थक) और मुस्लिम समुदाय (टीएमसी समर्थक) दोनों के ही वोट काटे गए हैं.

'स्विगी पॉलिटिक्स'- विचारधारा पर भारी है फायदा

राजदीप सरदेसाई ने एक दिलचस्प शब्द 'स्विगी पॉलिटिक्स' का इस्तेमाल किया. उनके अनुसार, अब जनता विचारधारा की लड़ाई के बजाय इस बात पर वोट देती है कि कौन सी सरकार या पार्टी उनकी जिंदगी को बेहतर बना रही है और सीधे उन तक लाभ पहुंचा रही है. ममता बनर्जी की 'कन्याश्री', 'लोखीर भंडार' और 'रूपश्री' जैसी योजनाएं 'ऑन-ग्राउंड डिलीवरी' का उदाहरण हैं. यदि वोटर को लगता है कि इन योजनाओं से उसकी जिंदगी बेहतर हुई है, तो वह ममता के साथ रहेगा. वहीं, अगर बीजेपी के 3000 रुपये के वादे और युवाओं के लिए दी गई गारंटियां वोटरों को लुभा पाती हैं, तो नतीजा बदल सकता है.

कांटे की टक्कर वाली 30-40 सीटें

विश्लेषण के दौरान यह बात सामने आई कि बंगाल की करीब 30-40 सीटें ऐसी हैं जहां पिछली बार जीत का अंतर 5000 से भी कम वोटों का था. इन सीटों पर SIR फैक्टर और डिलीशन निर्णायक साबित होगा. राजदीप का मानना है कि विचारधारा की बातें अब केवल टीवी डिबेट और पत्रकारों तक सीमित रह गई हैं, जमीन पर वोटर केवल अपना फायदा और डिलीवरी देख रहा है.

सत्ता की चाबी किसके पास?

अंत में राजदीप ने स्पष्ट किया कि यद्यपि बीजेपी का ग्राफ बढ़ रहा है, लेकिन दक्षिण बंगाल में ममता बनर्जी का प्रदर्शन अभी भी उनकी जीत की सबसे बड़ी उम्मीद है. चुनाव परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि स्विगी पॉलिटिक्स की इस दौड़ में कौन बाजी मारता है? ममता की मौजूदा डिलीवरी या बीजेपी के भविष्य के वादे. साथ ही, तमिलनाडु में जिस तरह 'विजय' का फैक्टर है, वैसे ही बंगाल में 'SIR' की वजह से कटे हुए वोट चुनावी नतीजों को किसी भी तरफ मोड़ सकते हैं.

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