हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने भारतीय राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं. हरियाणा, ओडिशा और बिहार में कांग्रेस विधायकों की बगावत के बावजूद, कांग्रेस हरियाणा में अपनी एक सीट बचाने में कामयाब रही. 'हरियाणा तक' के विशेष कार्यक्रम 'साप्ताहिक सभा' में वरिष्ठ पत्रकार मिलिंद खांडेकर और आदेश रावल ने इस पूरे घटनाक्रम और इसके पीछे की कूटनीति का विश्लेषण किया.
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हरियाणा में 'चमत्कार' या मिसमैनेजमेंट?
हरियाणा में कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर बौध की जीत बेहद करीबी अंतर (मात्र 0.3 मार्जिन) से हुई. कांग्रेस के पास 37 विधायकों का आंकड़ा था, लेकिन केवल 28 वोट ही मिले.
- क्रॉस वोटिंग और रिजेक्शन: कांग्रेस के 5 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की और 4 विधायकों के वोट रिजेक्ट हो गए.
- नया पैंतरा: रिजेक्शन के पीछे एक अनोखा तरीका सामने आया. विधायकों ने पोलिंग एजेंट को वोट दिखाने के बाद अपने हाथ पर पेन से डॉट बनाए और उस स्याही को वोटिंग पेपर पर चिपका दिया, जिससे वोट अवैध हो गया.
- बीजेपी की चूक: बीजेपी को उम्मीद थी कि अभय सिंह चौटाला के तटस्थ रहने से उन्हें फायदा होगा, लेकिन बीजेपी का अपना एक वोट खराब होने के कारण कांग्रेस की सीट निकल गई.
राहुल गांधी का 'जाटव' दांव और कांशीराम का जिक्र
कांग्रेस ने इस बार कर्मवीर बौध को उम्मीदवार बनाया, जो जाटव समुदाय से आते हैं. आदेश रावल के अनुसार, यह राहुल गांधी की सोची-समझी 'दलित आउटरीच' रणनीति का हिस्सा है:
- यूपी और पंजाब पर नजर: कांग्रेस अब मायावती के कोर वोट बैंक (जाटव) में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है.
- बार्गेनिंग पावर: राहुल गांधी चाहते हैं कि जब उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के साथ सीटों पर बात हो, तो उनके पास दिखाने के लिए एक मजबूत दलित वोट बैंक हो.
- रणनीति में बदलाव: कांग्रेस अब केवल ओबीसी नहीं, बल्कि 'लैंडलेस ओबीसी' और 'जाटव दलितों' पर ध्यान केंद्रित कर रही है.
कार्रवाई में 'दोहरा मापदंड'?
रिपोर्ट में कांग्रेस के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई पर भी सवाल उठाए गए हैं. ओडिशा में क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों को उसी दिन निलंबित कर दिया गया, जबकि हरियाणा के विधायकों को केवल 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया गया है. इसके पीछे भूपेंद्र सिंह हुड्डा की पकड़ और भविष्य के राज्यसभा चुनावों के समीकरणों को वजह माना जा रहा है.
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