Rahul Dipke come together: राहुल-दिपके साथ मिलकर किसे सुनाने लगे, बालाघाट में जो हुआ उसपर राहुल फायर

निधि तनेजा

18 Sep 2026 (अपडेटेड: Sep 18 2026 9:16 AM)

बालाघाट के सुदूर गांवों में 30 से ज्यादा मासूम बच्चों की मौतों के बाद मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. इस प्रशासनिक नाकामी और मौतों को लेकर राहुल गांधी और अभिजीत दीपके ने राज्य सरकार पर जोरदार हमला बोला है.

 Rahul Dipke come together
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मध्य प्रदेश के बालाघाट में स्वास्थ्य तंत्र की विफलता के कारण हुई बच्चों की मौतों ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. अलग-अलग राजनीतिक धारा से ताल्लुक रखने वाले दो चेहरे- कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और डिजिटल एक्टिविज्म से उभरे 'कॉकरोच जनता पार्टी' के चीफ अभिजीत दीपके इस मुद्दे पर एक ही सुर में बोलते नजर आ रहे हैं.

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बालाघाट का लाल-मिट्टी इलाका और स्वास्थ्य आपातकाल

बालाघाट के बेहर और बिरसा ब्लॉक के दूरदराज के गांवों में पिछले 90 दिनों में 30 से अधिक मासूमों की जान चली गई. समय पर टीकाकरण न होना, पीने का साफ पानी न मिलना और अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी इस त्रासदी के मुख्य कारण बताए जा रहे हैं.

बालाघाट में 30 से ज़्यादा आदिवासी बच्चों की बीमारी, कुपोषण और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के बीच मौत हो चुकी है।

संवेदनहीनता का आलम यह है मासूमों की मौतें होती रहीं, लेकिन कार्रवाई सुस्त रही, सरकार सोती रही।

मुख्यमंत्री जी, दीये जलाने और उत्सव मनाने से फुर्सत मिल गई हो…

— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) September 17, 2026

जमीनी पड़ताल और राजनीतिक कटाक्ष

अभिजीत दीपके ने ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट करते हुए दिखाया कि कैसे कई गांवों में पीड़ित परिवारों की सुध लेने न तो कोई प्रशासनिक अधिकारी पहुंचा और न ही डॉक्टर उपलब्ध थे. इसके बाद अपने अनोखा पॉलिटिकल सटायर पेश करते हुए उन्होंने खुद को 'काल्पनिक सीएम' मानकर इस्तीफे का पत्र जारी किया, जिससे राज्य सरकार पर नैतिक दबाव बनाया जा सके.

वही दूसरी तरफ, राहुल गांधी ने भी इंदौर दौरे से पहले दिए बयान और पोस्ट के जरिए राज्य सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में आदिवासी, गरीब और दलित वर्ग लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं.

अलग शैलियां, लेकिन कोर मुद्दों पर सहमति

यद्यपि राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर की मुख्यधारा की राजनीति करते हैं और अभिजीत दीपके सोशल मीडिया-आधारित एक्टिविज्म के जरिए राजनीति में उभरे हैं, फिर भी बेरोजगारी, पेपर लीक, आदिवासियों की दुर्दशा और चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे मुद्दों पर दोनों की आवाज एक समान सुनाई दे रही है.

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