मध्य प्रदेश में बीजेपी ने ऐन वक्त पर एक ऐसा सियासी दांव खेला हैजिसकी उम्मीद खुद पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को भी नहीं रही होगी. पार्टी ने सबको हैरान करते हुए कल यानी 10 जुलाई को दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया और उनकी जगह पूर्व संभागीय संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी को चुनावी मैदान में उतार दिया है.
ADVERTISEMENT
ये फैसला इसलिए भी किसी बड़े झटके से कम नहीं है क्योंकि राजेंद्र भारती की विधायकी जाने के बाद से ही नरोत्तम मिश्रा दतिया में लगातार एक्टिव थे. वे अपनी उम्मीदवारी को लेकर इतने पक्के थे कि उन्होंने नामांकन फॉर्म तक खरीद लिया था लेकिन आखिरी वक्त पर दिल्ली से आए एक फैसले ने पूरी बाजी पलट दी.
आखिर क्यों कटा मध्य प्रदेश के इतने बड़े चेहरे का टिकट? आइए समझते हैं इसके पीछे के 3 बड़े कारण
1. दिल्ली का सीक्रेट सर्वे और जमीनी फीडबैक
सूत्रों की मानें तो नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने की सबसे बड़ी वजह दिल्ली स्तर से कराया गया एक गुप्त सर्वे है. इस सर्वे में नरोत्तम मिश्रा की जमीनी पकड़ उतनी मजबूत नहीं पाई गई जितनी पार्टी को उम्मीद थी. केंद्रीय नेतृत्व ने सिर्फ लोकप्रियता ही नहीं बल्कि स्थानीय संगठन के भीतर उनकी स्वीकार्यता और भविष्य के समीकरणों को भी परखा. इस कसौटी पर संगठन का लंबा अनुभव रखने वाले आशुतोष तिवारी बाजी मार गए.
बता दें कि साल 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने करीब 7000 वोटों से शिकस्त देकर बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले दतिया को हिलाकर रख दिया था. दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा की इस हार ने दिल्ली से लेकर भोपाल तक हलचल मचा दी थी. अब खबर है कि इसी ऐतिहासिक हार के जमीनी फीडबैक और अंदरूनी सर्वे की कड़वी सच्चाई को देखते हुए बीजेपी हाईकमान ने इस बार एक बेहद कड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है.
2. नए पावर सेंटर को पनपने से रोकना
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस फैसले के पीछे सिर्फ हार-जीत का गणित नहीं बल्कि बीजेपी का अंदरूनी सत्ता संतुलन भी है. दरअसल, अगर नरोत्तम मिश्रा यह चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचते तो उनका दोबारा मंत्री बनना और कद्दावर विभाग संभालना लगभग तय था. मध्य प्रदेश भाजपा में पहले से ही मुख्यमंत्री मोहन यादव के अलावा शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और नरेंद्र सिंह तोमर जैसे कई बड़े पावर सेंटर मौजूद हैं. आलाकमान सरकार और संगठन में किसी नए शक्ति केंद्र को खड़ा करने के मूड में नहीं था. इसी रणनीतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए एक लो-प्रोफाइल और संगठन के प्रति वफादार चेहरे आशुतोष तिवारी को तरजीह दी गई.
3. जातिगत समीकरण
बीजेपी ने चेहरा जरूर बदला है लेकिन सोशल इंजीनियरिंग का पूरा ध्यान रखा है. नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को लाकर पार्टी ने ब्राह्मण कार्ड को बरकरार रखा है, जिससे दतिया का सामाजिक और जातीय समीकरण न बिगड़े.
टिकट तो बदल गया लेकिन अब बीजेपी के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है. इस फैसले के बाद दतिया से लेकर ग्वालियर-डबरा तक विरोध के सुर तेज हो गए हैं. दतिया के बीजेपी जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाह समेत कई बड़े पदाधिकारियों ने इस पर खुलकर नाराजगी जताई है.
सबसे बड़ी चुनौती
दतिया जिले में बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक नरोत्तम मिश्रा का अपना एक मजबूत और वफादार नेटवर्क है. इस बगावत और असंतोष को थामकर नरोत्तम समर्थकों को नए उम्मीदवार के समर्थन में जमीन पर उतारना संगठन के लिए टेढ़ी खीर साबित होने वाला है.
CM मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष की साख दांव पर
अगर मैदान में नरोत्तम मिश्रा होते तो चुनाव प्रबंधन और फंडिंग की पूरी जिम्मेदारी वो खुद संभाल लेते, लेकिन अब पासा पलट चुका है, इसलिए पूरी रणनीति नए सिरे से बनानी होगी. यह चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के कार्यकाल का यह पहला उपचुनाव है. वहीं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के लिए भी यह उनकी प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है. अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या संगठन के रणनीतिकार आशुतोष तिवारी को जिताकर इस बड़े सियासी जुए को मास्टरस्ट्रोक में बदल पाते हैं या नहीं.
क्यों आई उपचुनाव की नौबत
बुंदेलखंड की सबसे हॉट सीटों में शुमार दतिया में उपचुनाव की नौबत क्यों आई इसकी कहानी भी किसी सियासी थ्रिलर से कम नहीं है. दरअसल, साल 2023 के नियमित चुनाव में बीजेपी के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा को पटखनी देकर सुर्खियां बटोरने वाले कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को एक पुराने मामले में बड़ा झटका लगा. कोऑपरेटिव बैंक धोखाधड़ी से जुड़े एक काफी पुराने क्रिमिनल केस में सुनवाई करते हुए दिल्ली की कोर्ट ने राजेंद्र भारती को 3 साल जेल की सजा सुना दी. सुप्रीम कोर्ट के सख्त नियमों के तहत जैसे ही सजा का ऐलान हुआ विधानसभा सचिवालय ने तुरंत एक्शन लेते हुए राजेंद्र भारती की विधायकी रद्द कर दी. इसी फैसले ने दतिया की सियासी तकदीर बदल दी और यहां उपचुनाव का बिगुल बज गया.
बता दें कि दतिया की जमीन पर पिछले 15 सालों से डॉ. नरोत्तम मिश्रा का सिक्का चलता रहा है. उन्होंने लगातार तीन बार यहां बीजेपी का परचम लहराकर इस क्षेत्र को बीजेपी का अभेद किला बना दिया था. ऐसे में ये उपचुनाव दोनों ही दलों के लिए आर-पार की लड़ाई बन चुका है. बीजेपी के लिए ये चुनाव सिर्फ एक सीट जीतने का मामला नहीं है, बल्कि अपने उस खोए हुए साम्राज्य को वापस पाने और अपनी पुरानी बादशाहत को साबित करने की जंग है. वहीं कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी परीक्षा ये होगी कि क्या वो राजेंद्र भारती की अनुपस्थिति में एक बिल्कुल नए चेहरे के सहारे बीजेपी के इस चक्रव्यूह को दोबारा भेद पाएगी और अपनी पिछली जीत को बरकरार रख पाएगी.
ADVERTISEMENT


