देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियम इन दिनों भारी बहस का विषय बने हुए हैं. मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में सामान्य वर्ग के छात्र और सामाजिक संगठन सड़कों पर उतर आए हैं. विरोध का कारण वो बदलाव है जो UGC ने अपने ड्राफ्ट नियमों में हाल ही में किए हैं. इन बदलावों की बुनियाद एक संसदीय समिति की रिपोर्ट है, जिसने उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव से जुड़े मामलों पर कड़े सुझाव दिए थे.
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कहां से शुरू हुआ विवाद?
यह मामला उस समय गरमाया जब 8 दिसंबर 2025 को शिक्षा से जुड़ी संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस समिति की अध्यक्षता कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह कर रहे थे. समिति ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकने के लिए नियमों को और सख्त बनाने की सिफारिश की थी जिन पर अब सवाल उठ रहे हैं.
किन बदलावों ने खड़ा किया बवाल?
समिति की रिपोर्ट के आधार पर UGC के नियमों में कुछ अहम संशोधन किए गए
1. OBC को भी शामिल करने की सिफारिश
शुरुआती ड्राफ्ट में ओबीसी वर्ग का जिक्र साफ तौर पर नहीं था. समिति ने कहा कि पिछड़े वर्ग के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को भी उतनी ही गंभीरता से देखा जाए जितना एससी और एसटी के मामलों में किया जाता है.
2. इक्विटी कमेटी की नई संरचना
समिति ने सुझाव दिया कि हर संस्थान में बनने वाली ‘इक्विटी कमेटी’ में 50 प्रतिशत से ज्यादा सदस्य एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग से हों. तर्क यह दिया गया कि इससे शिकायतों की सुनवाई निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से हो सकेगी.
3.झूठी शिकायत पर जुर्माने का नियम हटाया गया
पहले नियमों में यह प्रावधान था कि गलत या झूठी शिकायत करने पर जुर्माना लगाया जा सकता है. समिति ने इसे हटाने की सिफारिश की. उनका मानना था कि जुर्माने के डर से कई पीड़ित छात्र शिकायत ही नहीं कर पाते.
सामान्य वर्ग क्यों नाराज?
इन नियमों के खिलाफ सबसे ज्यादा विरोध सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों की ओर से हो रहा है. उनका कहना है कि इक्विटी कमेटी में जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व न के बराबर होगा. इससे बिना ठोस सबूत के भी छात्रों और शिक्षकों को दोषी ठहराया जा सकता है. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि नियम एकतरफा हैं और संतुलन की कमी है, इसलिए इन्हें वापस लिया जाना चाहिए.
समिति में कौन-कौन थे शामिल?
यह सिर्फ एक व्यक्ति की समिति नहीं थी. दिग्विजय सिंह के अलावा इसमें बीजेपी और कांग्रेस समेत कई दलों के सांसद शामिल थे. प्रमुख नामों में रविशंकर प्रसाद, संबित पात्रा, बांसुरी स्वराज, बृजमोहन अग्रवाल और वर्षा गायकवाड़ शामिल हैं. कुल मिलाकर लोकसभा और राज्यसभा के 31 सांसद इस बहुदलीय समिति का हिस्सा थे.
UGC के नए नियमों को लेकर फिलहाल असमंजस की स्थिति बनी हुई है. एक तरफ भेदभाव रोकने की मंशा है, तो दूसरी तरफ नियमों की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं. अब देखना ये होगा कि सरकार और UGC इन विरोधों पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या नियमों में फिर से कोई बदलाव किया जाता है या नहीं.
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