कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों और इरादे फौलादी तो पहाड़ भी अपना रास्ता बदल लेते हैं. मध्य प्रदेश के कटनी जिले में इसी कहावत का उदाहरण पेश करते हुए हमारे देश के इंजीनियरों और मजदूरों ने विंध्याचल की दुर्गम पहाड़ियों का सीना चीर कर सबसे लंबी और तकनीकी रूप से सबसे पेचीदा अंडरग्राउंड वाटर टनल 'स्लीमनाबाद वाटर टनल' का काम आखिरी मुकाम पर पहुंचा दिया है.
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लगभग 17 साल के लंबे इंतजार, करोड़ों रुपये के खर्च और भारी-भरकम अमेरिकी और जर्मन मशीनों के दम तोड़ने के बाद आखिरकार 14 जुलाई 2026 को इस सुरंग का अंतिम ब्रेक-थ्रू सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया. अब आज 17 जुलाई को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद इस ऐतिहासिक इंजीनियरिंग चमत्कार का निरीक्षण करने कटनी पहुंचे हैं.
ऐसे में इस रिपोर्ट में विस्तार से जानते हैं कि इस टनल को बनाने में क्या-क्या मुश्किलें आईं, कैसे दुनिया की सबसे आधुनिक मशीनें इस पहाड़ के आगे बेबस हो गईं और कैसे ये टनल आने वाले समय में मध्य प्रदेश के विंध्य और महाकौशल क्षेत्र की तकदीर बदलने वाली है.
स्लीमनाबाद वाटर टनल की इंजीनियरिंग को समझने से पहले इसके पीछे की एक बेहद दिलचस्प पौराणिक और लोक कथा को जानना जरूरी है. स्थानीय मान्यताओं और लोक कथाओं के अनुसार नर्मदा और सोनभद्रा यानी सोन नदी दोनों का उद्गम अमरकंटक की मैकल पहाड़ियों से ही होता है. पौराणिक कहानियों में इन्हें दो रूठे हुए प्रेमियों के रूप में देखा गया है, जिन्हें नियति ने हमेशा के लिए एक-दूसरे से अलग कर दिया था.
इसी वजह से नर्मदा नदी पश्चिम की तरफ बहती हुई अरब सागर में जा मिलती है, जबकि सोनभद्रा पूर्व की ओर बहते हुए गंगा नदी में समाहित हो जाते हैं. सदियों से यह माना जाता था कि इन दोनों नदियों का पानी कभी आपस में नहीं मिल सकता. सरकार ने इसी प्राचीन विरह को मिटाने और विंध्य की सदियों से प्यासी धरती को सींचने के लिए इस परियोजना को अपना 'ड्रीम प्रोजेक्ट' बनाया और करीब 11.952 किलोमीटर लंबी स्लीमनाबाद टनल बनाया जिसके जरिए अब नर्मदा नदी का पानी विंध्याचल के पहाड़ों को पार करके सीधे सोन नदी के कछार में पहुंचेगा.
बिना बिजली या भारी पंप के बहेगा पानी
स्लीमनाबाद टनल की सबसे बड़ी खासियत इसका डिजाइन है. ये भारत की सबसे लंबी ऐसी वाटर टनल है जो पूरी तरह से गुरुत्वाकर्षण पर काम करेगीय. इसका मतलब है कि नर्मदा नदी के पानी को पहाड़ों के पार पहुंचाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार को न तो किसी भारी-भरकम मोटर-पंप की जरूरत होगी और न ही करोड़ों रुपये की बिजली फूंकनी पड़ेगी.
इस टनल का डायमीटर लगभग 10.14 मीटर है. इतनी चौड़ी सुरंग के अंदर से जब बरगी दायीं तट मुख्य नहर का पानी बहेगा तो वह ढलान के सहारे अपने आप सोन नदी के बेसिन तक पहुंच जाएगाी. यह पर्यावरण के अनुकूल और ऊर्जा की बचत करने वाला एक ऐसा अनूठा मॉडल है.
क्यों लग गए 17 साल
स्लीमनाबाद टनल बनाने की शुरुआत साल 2008 में हुई थी. शुरुआत में अधिकारियों और ठेकेदारों को लगा था कि यह काम तीन-चार साल में आसानी से पूरा हो जाएगा. लेकिन जैसे ही काम शुरू हुआ विंध्याचल की पहाड़ियों ने अपनी असली चुनौती दिखाना शुरू कर दिया. यहां की जियोलॉजिकल स्थितियां इतनी जटिल थीं कि देश के सबसे अनुभवी भू-वैज्ञानिक भी हैरान रह गए. साल 2011 में टनल की खुदाई के लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन अमेरिकी रॉबिन्स टनल बोरिंग मशीन को मैदान में उतारा गया था. लेकिन इस मशीन के लिए विंध्य का पहाड़ काल साबित हुआ.
पहाड़ के अंदर कहीं बेहद सख्त संगमरमर की चट्टानें थीं तो कहीं खोखली डोलोमाइट और चूना पत्थर की खदानें. जैसे ही ड्रिलिंग मशीन आगे बढ़ती, बेहद सख्त चट्टानों से टकराकर उसके कटर हेड टूट जाते थे. हालत ऐसे हो गए थे कि साल 2011 से 2015 के बीच यानी पूरे 4 सालों में ये अमेरिकी मशीन सिर्फ 1.4 किलोमीटर की ही खुदाई कर पाई.
मुश्किलें सिर्फ सख्त चट्टानों तक सीमित नहीं थीं. खुदाई के दौरान सुरंग के भीतर अचानक बड़े-बड़े पानी के सोर्स फूट पड़ते थे. कई बार पानी का दबाव इतना ज्यादा होता था कि प्रति मिनट 25,000 लीटर से ज्यादा पानी टनल के भीतर भरने लगता था. इसके साथ ही ड्रिलिंग के दौरान पहाड़ों के अंदर जमा कार्बन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों का रिसाव होने लगा, जिससे काम कर रहे मजदूरों और इंजीनियरों का दम घुटने का खतरा पैदा हो गया था. कई बार तो काम को महीनों के लिए पूरी तरह से रोकना पड़ता था. भूमिगत ऑपरेशनों के दौरान किसी भी अनहोनी से निपटने के लिए टनल साइट पर डॉक्टरों की एक विशेष टीम को चौबीसों घंटे तैनात रहती थी.
अमेरिका का मशीन नहीं चला तो जर्मनी की टेक्नोलॉजी का लिया गया सहारा
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार जब अमेरिकी मशीन से काफी धीमा हो रहा था तो सरकार और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA) ने एक नई रणनीति बनाई. साल 2016 में टनल के दूसरे छोर से खुदाई करने के लिए जर्मनी की मशहूर हेरेनक्नेक्ट (HK) कंपनी की एक और अत्याधुनिक टीबीएम मशीन मंगवाई गई. इसके बाद टनल के दोनों तरफ से एक साथ खुदाई का काम शुरू हुआ. तब जाकर काम में तेजी आई और धीरे-धीरे दोनों साइड की सुरंगें आपस में मिलती चली गईं.
क्यों और कैसे बढ़ा प्रोजेक्ट का बजट
सुरंग खोदने में जितना सोचा गया था उससे कहीं ज्यादा लग गया. इस बीच कई मशीनों के टूटी, कई तकनीकी दिक्कतें आई जिसकी वजह से प्रोजेक्ट की लागत में भारी इजाफा हुआ. साल 2008 में जब इस टनल के निर्माण की शुरुआत हुई थी उस वक्त इसकी उप्रूव्ड कॉस्ट लगभग 799 करोड़ रुपये थी. लेकिन 17 साल के इस सफर में ये लागत दोगुनी से भी ज्यादा बढ़कर 1610.47 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है.
इन 5 जिलों के 1450 गांवों की बदलेगी तकदीर
स्लीमनाबाद टनल के पूरी तरह चालू होने के बाद मध्य प्रदेश के विंध्य और महाकौशल क्षेत्रों में कृषि क्रांति आने का दावा किया जा रहा है. इस टनल के जरिए नर्मदा का पानी जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिलों की सूखी और प्यासी धरती तक पहुंचाया जाएगा. कुल मिलाकर 1,450 गांवों की करीब 2.45 लाख हेक्टेयर (लगभग 6 लाख एकड़) कृषि भूमि को इस टनल के जरिए हमेशा के लिए सिंचाई की सुविधा मिल सकेगी. इससे किसानों की मानसून पर निर्भरता खत्म होगी और वे साल में तीन फसलें उगा सकेंगे.
किस जिले में कितना पानी मिलेगा
दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार सुरंग चालू होने के बाद सतना जिले को सबसे ज्यादा फायदा होने जा रहा है. यहां 1,04,970 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी. वहीं मैहर जिले की 54,227 हेक्टेयर कृषि भूमि को पानी मिलेगा. टनल के गृह जिले कटनी की 21,823 हेक्टेयर जमीन हरी-भरी होगी. रीवा जिले के 3,084 हेक्टेयर खेतों को सिंचाई का सीधा लाभ मिलेगा और पन्ना के सूखे इलाकों की 448 हेक्टेयर भूमि तक नर्मदा का पानी पहुंचेगा.
सरकार का रोडमैप
इंजीनियरों के अनुसार, 14 जुलाई को टनल के आर-पार खुदाई का काम तो पूरा हो गया है लेकिन पानी का बहाव तुरंत शुरू नहीं किया जाएगा. अभी टनल के अंदर फंसी विशालकाय टीबीएम मशीनों को धीरे-धीरे खोलकर बाहर निकाला जाएगा. इसके बाद टनल की अंतिम फिनिशिंग की जाएगी. सरकार ने सिंचाई का लाभ किसानों तक पहुंचाने के लिए एक बहुत ही स्पष्ट और चरणबद्ध समय-सीमा तैयार की है.
- पहला चरण (मार्च 2026): टनल के माध्यम से करीब 44,160 हेक्टेयर सिंचाई क्षमता का लाभ मिलना पहले ही शुरू हो चुका है.
- दूसरा चरण (दिसंबर 2026): सिंचाई के रकबे को बढ़ाकर 87,433 हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया है.
- तीसरा और अंतिम चरण (दिसंबर 2027): इस समय तक कुल 1,54,693 हेक्टेयर से लेकर पूर्ण 2.45 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पानी पहुंचाने की पूरी व्यवस्था दुरुस्त कर दी जाएगी.
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