MP Politics: बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक से नरोत्तम मिश्रा गायब, क्या बुलाया ही नहीं गया ?

आशुतोष शुक्ला

• 07:28 PM • 01 Oct 2026

भोपाल में नए प्रभारियों की मौजूदगी में हुई बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक में पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की गैरमौजूदगी ने प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है. जानिए क्या नरोत्तम को किनारे करने का 'साइलेंट मैसेज' दे चुका है पार्टी आलाकमान ?

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बीजेपी कोर ग्रुप की बैठक में नहीं दिखे नरोत्तम मिश्रा
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भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित बीजेपी प्रदेश कार्यालय में बुधवार को हुई हाई-प्रोफाइल कोर ग्रुप की बैठक ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में नए सियासी समीकरणों को जन्म दे दिया है. नए प्रदेश प्रभारी बिप्लब देब, संगठन मंत्री चंद्रशेखर और सह-प्रभारी रेखा वर्मा की पहली मौजूदगी में हुई इस बैठक में मुख्यमंत्री मोहन यादव और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत पार्टी के तमाम दिग्गज एक टेबल पर मौजूद थे. हालांकि, इस पूरी बैठक का केंद्र बिंदु कोई फैसला नहीं, बल्कि एक चेहरे की अनुपस्थिति रही पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा. बैठक के दौरान प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से लेकर केंद्रीय मंत्री और संगठन के शीर्ष नेता मौजूद रहे. मीडिया से चर्चा के दौरान प्रदेश अध्यक्ष ने यह स्पष्ट किया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को छोड़कर बाकी सभी सदस्य बैठक में शामिल हुए. लेकिन सियासी गलियारों में यह सवाल तेजी से कौंध रहा है कि कोर ग्रुप की आधिकारिक सूची में 11वें नंबर पर दर्ज नरोत्तम मिश्रा का नाम इस दौरान क्यों नहीं लिया गया और वे बैठक से नदारद क्यों रहे? 

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न्योता न मिलना महज इत्तेफाक या रणनीति? 

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नरोत्तम मिश्रा को इस अहम बैठक की कोई पूर्व सूचना या आमंत्रण ही नहीं दिया गया था. कभी पार्टी के हर छोटे-बड़े रणनीतिक फैसले के केंद्र में रहने वाले नरोत्तम मिश्रा का इस तरह दरकिनार किया जाना महज पार्टी की गलती नहीं मानी जा रही है . 

2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया से मिली हार के बाद से ही नरोत्तम मिश्रा की मुख्यधारा की राजनीति में पकड़ कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है. हालांकि, वह दतिया में अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए लगातार सक्रिय हैं, लेकिन भोपाल और दिल्ली से मिल रहे संकेत कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं. 

हाल ही में दतिया में नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति के जरिए संगठन ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि पार्टी अब किसी एक चेहरे के प्रभाव में नहीं चलेगी. इसके बाद दतिया उपचुनाव में भी नरोत्तम मिश्रा को उम्मीदवार न बनाना और अब कोर ग्रुप से दूरी, पार्टी और नरोत्तम मिश्रा के बीच बढ़ती दूरी को साफ बयां करती है.

2020 के 'संकटमोचक' से हासिये तक का सफर 

साल 2020 के उस दौर को याद करें जब मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा तख्तापलट हुआ था. उस समय पर्दे के पीछे से लेकर मुख्य मंच तक जिस नेता की सबसे मुखर भूमिका थी, वे नरोत्तम मिश्रा ही थे. सरकार में गृह मंत्री और प्रवक्ता के रूप में वल्लभ भवन से लेकर बीजेपी दफ्तर तक उनका एकछत्र प्रभाव था. पार्टी जब भी किसी राजनीतिक संकट में फंसती, नरोत्तम मिश्रा ही 'संकटमोचक' बनकर आगे आते थे. 

लेकिन 2023 के चुनाव नतीजों ने समीकरण बदल दिए. दतिया से मिली  हार ने न केवल उनसे विधायक का पद छीना, बल्कि संगठन के भीतर उनके राजनीतिक वजन को भी काफी कम कर दिया. दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देने के बावजूद बीजेपी को वहां करारी शिकस्त झेलनी पड़ी, फिर भी संगठन के शीर्ष स्तर पर उनके रुख में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला. 

बीजेपी का 'साइलेंट मैसेज' 

भोपाल में हुई कोर ग्रुप की इस बैठक ने उस खाई को और गहरा कर दिया है जो पिछले कुछ महीनों से आकार ले रही थी. नए बीजेपी नेतृत्व ने मध्य प्रदेश में अपनी नई बिसात बिछा दी है, जिसमें पुराने छत्रपों को धीरे-धीरे मुख्य पावर सेंटर से दूर किया जा रहा है.

कल तक जो नेता पार्टी की रणनीति तय करते थे, आज उन्हें कोर ग्रुप की बैठक तक का न्योता न मिलना आलाकमान का वो 'साइलेंट मैसेज' है, जो यह दर्शाता है कि बीजेपी अब नए नेतृत्व और नए ढांचे के साथ आगे बढ़ रही है. 

अब सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या नरोत्तम मिश्रा पार्टी के इस नए ढांचे में खुद को ढाल लेंगे, या फिर अपनी सियासी प्रासंगिकता और वजूद को बनाए रखने के लिए दतिया से भोपाल तक कोई नया राजनीतिक दांव चलेंगे

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