भोपाल: मध्य प्रदेश बीजेपी में सबकुछ ठीक चल रहा है या फिर पार्टी के भीतर कोई सियासी खिचड़ी पक रही है ? पिछले कुछ दिनों में सामने आई तीन घटनाओं ने इस सवाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. रीवा में शिलापट्टिका पर नाम को लेकर बीजेपी के दो नेताओं के बीच विवाद, सीहोर में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ धरना और इंदौर में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की अहम बैठक से पांच विधायकों की गैरमौजूदगी ने सियासी हलचल बढ़ा दी है. हालांकि, इन घटनाओं को सीधे पार्टी के भीतर गुटबाजी या सत्ता संघर्ष का संकेत मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इनके बीच एक सवाल जरूर उभर रहा है कि क्या बीजेपी के नेताओं के बीच तालमेल की कमी है या फिर संगठन और सरकार के स्तर पर समन्वय को लेकर चुनौतियां सामने आ रही हैं ?
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रीवा में शिलापट्टिका पर नाम को लेकर विवाद
सबसे पहले बात रीवा जिले की, जहां त्योंथर तहसील कार्यालय के भूमि पूजन कार्यक्रम में बीजेपी के पूर्व विधायक श्यामलाल द्विवेदी और मौजूदा विधायक सिद्धार्थ तिवारी के बीच विवाद सामने आया. विवाद की वजह शिलापट्टिका पर नाम को लेकर बताई जा रही है.
श्यामलाल द्विवेदी का आरोप है कि उनके नाम वाली शिलापट्टिका तैयार होने के बाद उनका नाम हटवा दिया गया. उन्होंने इसे अपना अपमान बताया. मामला इतना बढ़ा कि दोनों नेताओं की ओर से प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल तक शिकायत पहुंचने की बात सामने आई. इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर आपसी तालमेल और स्थानीय नेतृत्व के बीच संबंधों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. हालांकि, शिलापट्टिका पर पूर्व विधायक का नाम होना जरूरी था या नहीं, यह संबंधित प्रोटोकॉल और कार्यक्रम के नियमों पर निर्भर करता है. ऐसे में विवाद को केवल नाम हटाए जाने तक सीमित रखने के बजाय उसके राजनीतिक असर को भी समझना जरूरी है.
सीहोर में शिवराज का धरना, प्रशासन पर उठे सवाल
दूसरी घटना सीहोर जिले के कोसमी गांव से जुड़ी है. यहां 12 आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने की कार्रवाई से नाराज केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 11 अक्टूबर को प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ धरना दिया. शिवराज ने प्रभावित परिवारों के साथ अन्याय न होने देने की बात कही और उनके लिए नए मकान तथा अंतरिम राहत की मांग उठाई. इस घटनाक्रम ने प्रदेश की राजनीति में खासा ध्यान खींचा, क्योंकि शिवराज सिंह चौहान न केवल बीजेपी के वरिष्ठ नेता हैं, बल्कि केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं. ऐसे में प्रदेश में बीजेपी की ही सरकार होने के बावजूद उनका प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ धरने पर बैठना कई सवाल खड़े करता है. क्या प्रशासनिक कार्रवाई और जनप्रतिनिधियों की अपेक्षाओं के बीच समन्वय की कमी थी ? क्या स्थानीय स्तर पर प्रभावित परिवारों की समस्याओं को समय रहते नहीं सुना गया ? हालांकि, इस घटना को सीधे बीजेपी के भीतर सत्ता संघर्ष से जोड़ना सही नहीं होगा. लेकिन इतना जरूर है कि इसने प्रशासनिक जवाबदेही और सरकार के कामकाज के तरीके पर बहस को तेज किया है.
इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय की बैठक से पांच विधायक दूर
तीसरी घटना इंदौर की है, जहां नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने आगामी दिनों में संभावित जल संकट से निपटने की तैयारियों को लेकर बैठक बुलाई. बैठक में अधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी भी अहम थी, लेकिन इंदौर के नौ विधायकों में से पांच विधायक बैठक में नहीं पहुंचे. इसके अलावा जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट की गैरमौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी. जब कैलाश विजयवर्गीय से विधायकों के नहीं पहुंचने को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने पहले त्योहारों का हवाला दिया और फिर कहा कि जो नहीं आए हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए. विजयवर्गीय के इस बयान के बाद राजनीतिक चर्चाओं को और हवा मिली. हालांकि, विधायकों की गैरमौजूदगी के पीछे वास्तविक वजह क्या थी, यह स्पष्ट होना बाकी है। फिर भी, पानी जैसे अहम जनहित के मुद्दे पर बुलाई गई बैठक में जनप्रतिनिधियों की कम उपस्थिति ने समन्वय को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं.
क्या बीजेपी में बढ़ रही है अंदरूनी खींचतान?
रीवा, सीहोर और इंदौर की इन तीन घटनाओं में परिस्थितियां अलग-अलग हैं. रीवा में स्थानीय नेताओं के बीच विवाद सामने आया, सीहोर में आदिवासी परिवारों के मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोला, जबकि इंदौर में अहम बैठक में कई विधायकों की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बनी. इन घटनाओं के आधार पर पार्टी में किसी बड़े राजनीतिक टकराव का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी. लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि इन घटनाओं ने बीजेपी के भीतर नेतृत्व, प्रशासनिक समन्वय और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं. अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि प्रदेश संगठन इन घटनाओं को किस तरह देखता है और आने वाले दिनों में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल को लेकर क्या तस्वीर सामने आती है. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये महज अलग-अलग घटनाएं हैं या मध्य प्रदेश बीजेपी के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों की आहट ? इसका जवाब आने वाले दिनों में नेताओं के बयानों, संगठन की प्रतिक्रिया और सरकार के फैसलों से मिल सकता है.
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