भोजशाला के बंद दरवाजों के पीछे क्या मिला? ASI की जांच और हाई कोर्ट के फैसले के बाद पहुंची हमारी टीम ने क्या देखा

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई की 98 दिनों की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर धार की ऐतिहासिक भोजशाला को एक हिंदू मंदिर माना है. फैसले के अगले दिन परिसर के भीतर प्राचीन मूर्तियों, 'ओम नमः शिवाय' लिखे शिलालेखों और सनातन प्रतीकों की मौजूदगी देखी गई.

भोजशाला
भोजशाला

रवीशपाल सिंह

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मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने भोजशाला परिसर को एक हिंदू मंदिर माना है. कोर्ट का यह बड़ा फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की उस बेहद अहम सर्वे रिपोर्ट के आधार पर आया है, जिसे 98 दिनों की कड़ी जांच और वैज्ञानिक पद्धतियों के बाद तैयार किया गया था. एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में इस परिसर के भीतर मिले तमाम शिलालेखों और प्राचीन आकृतियों को सनातन धर्म से जुड़ा हुआ माना था, जिस पर अब माननीय अदालत ने भी अपनी कानूनी मुहर लगा दी है.

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फैसले के ठीक अगले ही दिन MP Tak की टीम ने भोजशाला परिसर के भीतर पहुंचकर एक एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की, जिसमें वो तमाम अचूक साक्ष्य और हिंदू प्रतीक कैमरे में कैद हुए हैं जो एएसआई के सर्वे का मुख्य आधार बने.

गर्भगृह के मुख्य द्वार पर विराजे हैं गजानन और रिद्धि-सिद्धि

भोजशाला परिसर के भीतर प्रवेश करते ही एक प्राचीन बंद दरवाजे के चौखट पर भगवान गणेश की आकृति साफ दिखाई देती है. पुरातत्व विभाग ने अपनी रिपोर्ट में इसे भगवान गणेश की प्रतिमा के रूप में ही चिन्हित किया है. इसके साथ ही दरवाजे के दोनों ओर रिद्धि और सिद्धि की दो प्रतिमाएं भी उकेरी गई हैं. हालांकि, इन आकृतियों के चेहरों और स्वरूप को बुरी तरह से घिसकर खंडित करने का प्रयास किया गया था. जानकारों के मुताबिक, किसी भी पारंपरिक मंदिर के प्रवेश द्वार या चौखट पर गणेश जी की स्थापना होना सनातन परंपरा का हिस्सा है, जो कि किसी मस्जिद में कभी नहीं पाया जाता.

प्राचीन शिलालेखों पर उकेरा है 'ओम नमः शिवाय'

ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान भोजशाला के उस हिस्से को भी दिखाया गया जहां पत्थरों पर बकायदा प्राचीन प्राकृत लिपि में शिलालेख लिखे हुए हैं. इन शिलालेखों पर स्पष्ट रूप से 'ओम सरस्वती नमः' और 'ओम नमः शिवाय' लिखा हुआ पढ़ा जा सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्राकृत लिपि और भाषा राजा भोज के काल की है, जो प्रमाणित करती है कि यह राजा भोज द्वारा निर्मित एक प्राचीन संस्कृत पाठशाला और वाग्देवी (मां सरस्वती) का पावन मंदिर था.

104 खंभों पर घंटियां, धनुष और कालसर्प यंत्र के साक्ष्य

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में परिसर के भीतर स्थित उन 104 खंभों का विशेष रूप से जिक्र किया है. इन खंभों पर की गई नक्काशी पूरी तरह सनातन धर्म की कलाकृतियों से मेल खाती है.

  • घंटियों के निशान: अधिकांश खंभों पर प्राचीन काल में उकेरी गई घंटियों के चिन्ह मौजूद हैं. हालांकि, कई खंभों से इन घंटियों को जानबूझकर घिसकर हटाने की कोशिश साफ नजर आती है.
  • धनुष की आकृति: एएसआई को सर्वे के दौरान खंभों पर प्राचीन धनुष की आकृतियां भी मिली हैं.
  • कालसर्प यंत्र: मंदिर के एक खंभे पर प्राचीन तांत्रिक और ज्योतिषीय महत्व का 'कालसर्प यंत्र' बना हुआ है, जिसे फिलहाल सुरक्षा के लिहाज से कवर करके रखा गया है.
  • कमल के आकार की छत: परिसर की छत पर नक्काशीदार कमल के फूल की आकृति बनी हुई है, जो विशुद्ध रूप से हिंदू स्थापत्य शैली का प्रमाण है.

केमिकल वॉश से सामने आया असली स्वरूप

स्थानीय जानकारों के मुताबिक, इन सभी प्राचीन साक्ष्यों, मूर्तियों और शिलालेखों को लंबे समय तक चूने की मोटी परतों से ढककर छुपाने की कोशिश की गई थी. लेकिन जब पुरातत्व विभाग द्वारा वैज्ञानिक पद्धति और विशेष केमिकल्स से इस पूरे परिसर की सफाई कराई गई, तब चूने के भीतर छुपे ये ऐतिहासिक और अकाट्य सनातन प्रतीक अपने असली स्वरूप में बाहर आ गए. परिसर के भीतर स्थित एक प्राचीन हवन कुंड भी मिट्टी से भरा हुआ था, जिसकी सफाई के बाद कई खंडित मूर्तियां और अवशेष प्राप्त हुए थे .

फैसले के बाद उमड़ा जनसैलाब, भावुक हुए श्रद्धालु

हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आने के अगले ही दिन भोजशाला परिसर में हिंदू पक्ष के श्रद्धालुओं का तांता लग गया. सालों से केवल मंगलवार और शुक्रवार को ही सीमित प्रवेश पाने वाले श्रद्धालु अब सीधे उस स्थान पर पहुंचे, जहां कभी मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा स्थापित थी. श्रद्धालुओं ने वहां अगरबत्तियां जलाईं, फूल-मालाएं अर्पित कीं और साष्टांग दंडवत प्रणाम किया. इस ऐतिहासिक क्षण पर कई महिला श्रद्धालु इतनी भावुक हो गईं कि उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह धार के प्रत्येक सनातनी की और एक लंबे समय से चले आ रहे न्यायसंगत संघर्ष की बड़ी जीत है.

भोजनशाला का लेकर आए फैसले के बारे में जानें 

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला एक ऐतिहासिक और धार्मिक परिसर है. इसे लेकर दो धर्मों यानी हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच काफी लंबे वक्त से विवाद चल रहा है. इतिहासकारों की मानें तो भोजशाला का संबंध परमार वंश के राजा भोज से माना जाता है. इस राजा ने 11वीं सदी में धार को शिक्षा और संस्कृति का बड़ा केंद्र बनाया था. हिंदुओं का दावा है कि यहां मां सरस्वती की पूजा होती थी. वहीं मुस्लिम शासकों के काल में मुस्लिमों के जरिए इसमें तोड़ फोड़ और इसके मूल स्वरुप के साथ बदलाव की भी बातें सामने आती हैं. 

अब इसी पूरे मसले और विवाद पर MP हाईकोर्ट के इंदौर बेंच ने ASI से परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराने को कहा था. जिसमें जो फैक्ट्स कोर्ट के सामने रखे गए उससे मुस्लिम पक्ष का दावा कमजोर पड़ गया और अंत में बीते शुक्रवार यानी 16 मई को मध्यप्रदेश की इंदौर बेंच ने अपने फैसले में भोजशाला को देवी वाग्देवी का मंदिर माना और मुस्लिम पक्ष के दावे को रद्द कर दिया.


 

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