MP Rajya Sabha Election: राज्यसभा की रेस से कैसे बाहर हुए कमलनाथ? क्या राहुल गांधी का दिग्गज नेता से भंग हुआ मोह?

MP Rajya Sabha Election: मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने कमलनाथ को दरकिनार कर राहुल गांधी की करीबी मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया है. हालिया चुनावी हारों, सरकार गिरने और बीजेपी में जाने की अटकलों के चलते कमलनाथ का आलाकमान से मोहभंग इस फैसले की मुख्य वजह माना जा रहा है.

कमलनाथ सिंह
कमलनाथ सिंह

आकांक्षा ठाकुर

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मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं. भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस दोनों ही दलों ने अपने-अपने प्रत्याशियों के नामों का ऐलान कर दिया है. बीजेपी की तरफ से रजनीश अग्रवाल और तरुण चुघ ने अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है. लेकिन इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा कांग्रेस के टिकट वितरण को लेकर हो रही है. मध्य प्रदेश कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को दरकिनार करते हुए आलाकमान ने पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन के नाम पर मुहर लगाई है.

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मीनाक्षी नटराजन को टिकट मिलने के बाद मध्य प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह तैर रहा है कि आखिर राज्यसभा की रेस में सबसे आगे चल रहे सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता कमलनाथ इस रेस से बाहर कैसे हो गए? क्या राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान का अब कमलनाथ से पूरी तरह मोहभंग हो चुका है?

दिग्विजय सिंह की खाली सीट पर मीनाक्षी नटराजन की एंट्री

मध्य प्रदेश से कांग्रेस की यह राज्यसभा सीट दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह का कार्यकाल पूरा होने के बाद खाली हुई है. इस सीट पर दावेदारी के लिए कई बड़े नाम रेस में थे, जिनमें सबसे ऊपर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम चल रहा था. राजनीतिक गलियारों में तो यहां तक चर्चा थी कि कमलनाथ खुद या अपने बेटे नुलनाथ को राज्यसभा भेजना चाहते थे.

हालांकि, कांग्रेस आलाकमान ने राहुल गांधी की कोर टीम का हिस्सा मानी जाने वालीं और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन पर भरोसा जताया. मीनाक्षी नटराजन का नाम फाइनल होने के बाद उन्होंने दिल्ली में कमलनाथ से मुलाकात भी की, जिसे शिष्टाचार और गुटबाजी को शांत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

इन 4 वजहों से आलाकमान से दूर हुए कमलनाथ

राजनीतिक विश्लेषकों और पिछले कुछ सालों के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो कमलनाथ और गांधी परिवार के बीच दूरियां बढ़ने के पीछे कई मुख्य कारण दिखाई देते हैं:

  • 2020 में सरकार गिरने का ठीकरा: साल 2018 में मध्य प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी थी. लेकिन महज 15 महीने बाद ही ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थक विधायकों के साथ बीजेपी में शामिल हो गए और कांग्रेस की सरकार गिर गई. उस वक्त भी आलाकमान के भीतर यह सवाल उठा था कि कमलनाथ विधायकों को रोकने और डैमेज कंट्रोल करने में पूरी तरह असफल रहे.
  • 2023 विधानसभा चुनाव में करारी हार: 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव पूरी तरह कमलनाथ के चेहरे पर लड़े गए थे. चुनाव से पहले उन्हें 'भावी मुख्यमंत्री' के तौर पर पेश किया जा रहा था. लेकिन नतीजों में कांग्रेस को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी और पार्टी महज 66 सीटों पर सिमट कर रह गई. इस हार का मुख्य कारण कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच टिकट बंटवारे को लेकर खींचतान और अंदरूनी गुटबाजी को माना गया.
  • बीजेपी में जाने की अटकलें और चुप्पी: साल 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले दिल्ली से लेकर भोपाल तक यह चर्चा जोरों पर थी कि कमलनाथ बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. उनके दिल्ली स्थित आवास पर भगवा झंडा भी देखा गया था और उनके समर्थक नेता खुलकर बयानबाजी कर रहे थे. हालांकि कमलनाथ बीजेपी में नहीं गए, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी भी इन खबरों का कड़ा खंडन नहीं किया, जिससे आलाकमान के बीच उनकी वफादारी को लेकर अविश्वास पैदा हुआ.
  • छिंदवाड़ा का मजबूत किला ढहना: कमलनाथ का सबसे बड़ा राजनीतिक रसूख उनका गढ़ 'छिंदवाड़ा' माना जाता था. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में देश भर में कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा, लेकिन मध्य प्रदेश में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया. कमलनाथ अपने बेटे नकुलनाथ की छिंदवाड़ा सीट भी नहीं बचा पाए और बीजेपी के विवेक बंटी साहू ने वहां ऐतिहासिक जीत दर्ज की. गढ़ ढहने के बाद आलाकमान की नजरों में कमलनाथ का राजनीतिक होल्ड कमजोर साबित हुआ.

जमीन से दूरी और बढ़ती गुटबाजी

कमलनाथ पिछले काफी समय से मध्य प्रदेश की सक्रिय और जमीनी राजनीति से दूर नजर आ रहे हैं. भले ही वह सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हों और सरकार को घेरते हों, लेकिन जमीन पर उनकी गैर-मौजूदगी लगातार सवालों के घेरे में रही है. इस बीच जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी के भीतर गुटबाजी और ज्यादा खुलकर सामने आई है.

कांग्रेस के सामने अब 'अंकगणित' की बड़ी चुनौती

मीनाक्षी नटराजन के नाम के ऐलान के बाद अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती मध्य प्रदेश में अपने विधायकों को एकजुट रखने की है. नामांकन की आखिरी तारीख 8 जून है. ऐसे में राज्यसभा चुनाव के इस अंकगणित को साधने के लिए क्या कांग्रेस के 'संकटमोचन' कहे जाने वाले कमलनाथ अपनी पूरी ताकत लगाएंगे? चूंकि कमलनाथ खुद छिंदवाड़ा सीट से विधायक हैं, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अपनी पार्टी के प्रत्याशी को जिताने और विधायकों की क्रॉस वोटिंग रोकने में कितनी सक्रिय भूमिका निभाते हैं.

 

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