पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने दिल्ली से लेकर मध्य प्रदेश तक की राजनीति में हलचल मचा दी है. जहां एक तरफ पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में भाजपा की जीत की गूंज सुनाई दे रही है, वहीं मध्य प्रदेश के कोटे से राज्यसभा सांसद और केंद्र सरकार के दो कद्दावर मंत्रियों- एल. मुरुगन और जॉर्ज कुरियन की दक्षिण भारत में हुई करारी हार ने पार्टी के रणनीतिकारों के लिए मंथन का विषय बना दिया है.
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राज्यसभा की कुर्सी बनाम जनता का फैसला
केंद्र में मंत्री पद का रुतबा और मध्य प्रदेश से राज्यसभा की सुरक्षित सदस्यता होने के बावजूद, जब ये नेता दक्षिण की जमीन पर उतरकर वोट मांगने पहुंचे, तो वहां की जनता ने इन्हें पूरी तरह नकार दिया. यह हार न केवल इन दिग्गजों के लिए व्यक्तिगत झटके के रूप में देखी जा रही है, बल्कि यह उन नेताओं के लिए भी एक बड़ा सबक है जो 'पैराशूट लैंडिंग' के जरिए राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते हैं.
जॉर्ज कुरियन: ईसाई बहुल सीट पर फेल हुई रणनीति
केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन को भाजपा ने केरल में पार्टी और ईसाई समुदाय के बीच एक 'सेतु' के रूप में देखा था. उन्हें उम्मीद थी कि कांजीरापल्ली जैसी ईसाई बहुल सीट पर उनका कद काम आएगा. लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली. चुनाव परिणामों में कुरियन तीसरे स्थान पर खिसक गए और कांग्रेस उम्मीदवार के हाथों उन्हें 29,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से हार का सामना करना पड़ा.
एल. मुरुगन: 'विजय' लहर में धराशाई हुए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष
तमिलनाडु में केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन की हार एक और बड़ा संकेत है. अविनाशी सीट पर अपनी साख बचाने उतरे मुरुगन, जो तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं, सुपरस्टार विजय की पार्टी 'टीवीके' (TVK) के चक्रव्यूह को नहीं तोड़ सके. 'वेल यात्रा' के जरिए हिंदुत्व की लहर पैदा करने का दावा करने वाले मुरुगन को विजय की पार्टी के उम्मीदवार ने 15,373 वोटों से शिकस्त दी. हालांकि उन्होंने डीएमके को तीसरे स्थान पर धकेलने में सफलता पाई, लेकिन विजय की पार्टी की नई लहर के आगे उनका 'हिंदू कार्ड' पूरी तरह निष्प्रभावी साबित रहा.
क्या है बड़ा संदेश?
यह दोनों ही नेता मध्य प्रदेश के कोटे से राज्यसभा सांसद हैं. जॉर्ज कुरियन को ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट से निर्विरोध चुना गया था, जबकि मुरुगन 2021 से मध्य प्रदेश कोटे का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिण में क्षेत्रीय अस्मिता और नई राजनीतिक ताकतों के उदय ने भाजपा की राह मुश्किल कर दी है. यह हार साबित करती है कि दिल्ली के ऊंचे पदों पर बैठकर या राज्यसभा के जरिए बड़े नेता बनने और दक्षिण की जमीन पर अपनी पकड़ बनाने में जमीन-आसमान का फर्क है. बीजेपी के लिए यह महज दो सीटों का नुकसान नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति की नब्ज को समझने का एक कड़ा सबक है.
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