उत्तराखंड के बाद अब मध्य प्रदेश में भी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लागू करने की तैयारी पूरी कर ली गई है. मानसून सत्र के दौरान सीएम मोहन यादव की सरकार ने मध्य प्रदेश विधानसभा में यूसीसी का बिल पेश कर दिया है. सरकार द्वारा गठित हाई लेवल कमेटी ने उत्तराखंड, गुजरात और असम के यूसीसी मॉडल का गहन अध्ययन कर इसका मसौदा तैयार किया है. आइए जानते हैं कि मध्य प्रदेश में यूसीसी लागू होने के बाद आम नागरिक के जीवन और कानूनों पर क्या-क्या असर पड़ेगा:
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यूसीसी के मसौदे के मुताबिक, मध्य प्रदेश में रहने वाले सभी समुदायों के लिए एक समय में केवल एक ही शादी को कानूनी मान्यता मिलेगी. मुख्यमंत्री मोहन यादव के शब्दों में, कानून के दायरे में रहने वाले हर नागरिक पर एक ही नियम लागू होगा. विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है. नया कानून लागू होने के बाद विवाह और तलाक दोनों का पंजीकरण (Registration) कराना मैनडेट्री होगा. शहरों में ये प्रक्रिया 'MP e-Nagarpalika' पोर्टल के जरिए और ग्रामीण इलाकों में पंचायत या एसडीएम दफ्तर से होगी.
इसके साथ ही निकाह हलाला जैसी प्रथाओं को बढ़ावा देना या शर्त रखना दंडनीय अपराध घोषित किया गया है. मौखिक तलाक या किसी गैर-कानूनी पंचायत के फैसलों की कोई कानूनी मान्यता नहीं होगी.
लिव-इन रिलेशनशिप के लिए कड़े नियम और जुर्माना
मध्य प्रदेश के यूसीसी ड्राफ्ट में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बेहद सख्त प्रावधान बनाए गए हैं:
- घोषणा अनिवार्य: लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को साथ रहने के 1 महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास डिक्लेरेशन देना होगा.
- उम्र और माता-पिता को सूचना: पार्टनर की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष होनी चाहिए. यदि किसी भी पार्टनर की उम्र 21 साल से कम है तो इसकी जानकारी उसके माता-पिता या अभिभावकों को दी जाएगी.
- सजा और जुर्माना: यदि कोई जोड़ा 1 महीने से अधिक समय तक बिना रजिस्ट्रेशन के लिव-इन में रहता है तो 3 महीने तक की जेल या 10,000 तक का जुर्माना हो सकता है. गलत जानकारी देने पर ₹25,000 का जुर्माना और 3 महीने की सजा का प्रावधान है.
बेटियों को संपत्ति में बराबर का हक और बच्चों के समान अधिकार
यूसीसी लागू होने के बाद बेटा-बेटी दोनों को माता-पिता की संपत्ति में समान उत्तराधिकार मिलेगा चाहे उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो. इसके अलावा, लिव-इन, गोद लेने या सरोगेसी (ART) से जन्मे बच्चों के बीच का भेदभाव खत्म कर दिया गया है. सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा और अधिकार मिलेंगे.
जनजातियों को यूसीसी से बाहर रखा गया
विपक्ष के विरोध के बीच सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 342 और 366(25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों (ST), संरक्षित पारंपरिक समुदायों और घुमंतु जनजातियों को इस कानून से बाहर रखा गया है. इसके साथ ही किसी भी धर्म के धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा पद्धतियों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा.
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