मध्य प्रदेश में नियमितीकरण और भविष्य सुरक्षा की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे अतिथि विद्वानों ने अब एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है. भोपाल में उच्च शिक्षा मंत्री इंद्र सिंह परमार के साथ हुई वार्ता के बेनतीजा रहने के बाद, अब अतिथि विद्वानों ने 'विद्वान जनता पार्टी' के गठन का ऐलान कर दिया है. इस नए राजनीतिक दल के सामने आने से राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है. विस्तार से जानिए पूरा मामला.
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क्या है अतिथि विद्वानों का मुख्य विवाद और मांग?
अतिथि विद्वानों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी एक सूत्रीय मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं. उनका मुख्य विरोध 'फॉलन आउट' प्रक्रिया को लेकर है, जिसके तहत कॉलेज में नियमित प्राध्यापक की नियुक्ति या तबादला होने पर वहां पहले से पढ़ा रहे अतिथि विद्वान की सेवाएं समाप्त कर दी जाती हैं. प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि इस प्रक्रिया के कारण पिछले 25 सालों से सेवा दे रहे शिक्षक रातों-रात बेरोजगार हो रहे हैं. उनकी मांग है कि जब तक सरकार स्थाई नीति या पॉलिसी नहीं बना लेती, तब तक इस फॉलन आउट प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाई जाए.
मंत्री के किस बयान पर भड़के अतिथि विद्वान?
अतिथि विद्वानों का आरोप है कि जब वे अपनी जायज मांगों को लेकर उच्च शिक्षा मंत्री इंद्र सिंह परमार से मिलने गए थे, तो बातचीत के दौरान उन्हें राजनीति में आने और चुनाव लड़ने की बात कही गई थी. विद्वानों ने मंत्री के इस कथित बयान को चुनौती के रूप में स्वीकार किया है. उनका कहना है कि जब सरकार उनकी आवाज नहीं सुन रही है और उनके पास रोजगार का कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है, तो वे मंत्री के गृह जिले या सुजालपुर विधानसभा क्षेत्र समेत अन्य सीटों से चुनाव मैदान में उतरकर अपनी ताकत दिखाएंगे.
पूर्व और वर्तमान सरकारों के आश्वासनों पर उठाये सवाल
अतिथि विद्वानों ने बातचीत के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा दिए गए आश्वासनों का भी हवाला दिया. उनका कहना है कि 11 सितंबर 2023 और 10 जुलाई 2026 को महासम्मेलनों में उन्हें भरोसा दिया गया था कि अतिथि विद्वानों को हटाया नहीं जाएगा और उनके लिए हरियाणा की तर्ज पर बेहतर नीति बनाई जाएगी, लेकिन धरातल पर अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं.
आगे की क्या है रणनीति?
फिलहाल अतिथि विद्वानों ने सांकेतिक तौर पर 'विद्वान जनता पार्टी' (VJP) का नाम सामने रखा है और भोपाल के नीलम पार्क में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हुए हैं. उनका कहना है कि अगर सरकार उनकी मांग मान लेती है तो वे किसी पार्टी या चुनाव के चक्कर में नहीं पड़ेंगे, लेकिन यदि उनकी बात नहीं मानी गई और उन्हें सड़कों पर बैठने के लिए मजबूर किया गया, तो वे आगामी चुनावों में पार्टी के बैनर तले कड़ा मुकाबला करेंगे.
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