डोकलाम विवाद: जब जनरल रावत के एक आदेश ने बदल दिया भारत-चीन सीमा का इतिहास, तब DGMO रहे अनिल भट्‌ट ने सुनाई अनसुनी कहानी

डोकलाम विवाद के दौरान DGMO रहे लेफ्टिनेंट जनरल अनिल भट्ट बड़ा खुलासा किया है. जानिए कैसे जनरल बिपिन रावत के नेतृत्व में भारतीय सेना ने डोजर के सामने डोजर लगाकर चीन को पीछे हटने पर मजबूर किया और 73 दिनों तक चले इस तनाव का अंत कैसे हुआ.

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डोकलाम विवाद के दौरान DGMO रहे लेफ्टिनेंट जनरल ने बताई 73 दिनों की पूरी कहानी.

ऋषि राज

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भारतीय सेना के पूर्व डीजीएमओ (DGMO) और 15 कोर के कमांडर रहे लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) अनिल भट्ट ने एक हालिया साक्षात्कार में 2017 के डोकलाम विवाद की उन परतों को खोला है, जो अभी तक आम जनता की नजरों से दूर थीं. उन्होंने बताया कि कैसे भारतीय सेना ने 'सलामी स्लाइसिंग' की चीनी चाल को बुरी तरह से नाकाम किया और कैसे पहली बार युद्ध के मैदान में 'डोजर बनाम डोजर' के साथ मैन टू मैन डॉमिनेटिंग WAR देखने को मिला जिसमें जंग नहीं हुई पर चीनी सेना के पसीने जरूर छूट गए. चीनी सरकार को ये समझ आ गया कि ये 1962 का भारत नहीं है. ये आज का भारत है जो 1967 की तरह या उससे भी तगड़ा रिएक्शन देना जानता है. 

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भारत Tak के खास शो 'वर्दी वाले' के एक खास एपिसोड में पूर्व डीजीएमओ अनिल भट्‌ट ने 73 दिनों तक चले डोकलाम विवाद का पूरा किस्सा सुना दिया. चूंकि 2 फरवरी 2026 को बजट सत्र में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने लोकसभा में डोकलाम विवाद को पूर्व सेना अध्यक्ष की अनपब्लिश्ड बुक से फिर ताजा कर दिया. चर्चा होने लगी कि आखिर 16 जून 2017 को डोकलाम में क्या हुआ था. चीनी सेना क्या कर रही थी जिससे भारत की सेना को भी जवाबी कार्रवई में उनके सामने उन्हीं के अंदाज में खड़ा होना पड़ा. 

सबसे पहले जान लेते हैं कि डोकलाम कहां पर है. भारत, भूटान और तिब्बत की सीमा जहां मिलती है वहीं डोकलाम है. जिस हिस्से पर चीनी सेना थी वो भूटान का था. अब सवाल ये है कि चीनी सेना कर क्या रही थी? डोकलम में ट्राईजंक्शन है जो एक रणनीतिक पठार है. यह भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर जिसे चिकन नेक कहा जाता है उसके बेहद करीब है. सामरिक दृष्टि से डोकलाम काफी महत्वपूर्ण है. चिकन नेक 20-25 किमी तक का चौड़ा है जो उत्तर भारत को भारत के बाकी हिस्से से जोड़ता है. चीन यहां सड़क बना रहा था जिसे पहले भूटान ने रोका फिर भारत ने भी. चीन यदि सड़क बना लेता तो उसके लिए चिकन नेक तक आना बेहद आसान हो जाता. अब चलते हैं उस घटना की तरह जिसके साक्षी रहे हैं पूर्व डीजीएमओ अजय भट्‌ट. उन्होंने बताया...

'सलामी स्लाइसिंग' और चीन की खतरनाक चाल

लेफ्टिनेंट जनरल अनिल भट्ट ने बताया कि चीन की हमेशा से कोशिश रही है कि वह धीरे-धीरे भारतीय और भूटानी इलाकों में घुसपैठ करे, जिसे 'सलामी स्लाइसिंग' कहा जाता है. 2017 में चीन ने डोकलाम के पास सड़क बनाना शुरू किया. उनका मकसद जामफेरी रिज तक पहुंचना था. अगर चीन वहां पहुंच जाता, तो वह भारत के 'चिकन नेक' (सिलिगुड़ी कॉरिडोर) को सीधे तौर पर डोमिनेट कर सकता था, जो भारत की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा था. 

जनरल रावत का फैसला और 270 सैनिकों की एंट्री

जून 2017 में जब यह खबर हेडक्वार्टर पहुंची कि चीनी सेना डोजर (बुलडोजर) लेकर सड़क बनाने पहुंच गई है, तब तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने बिना किसी देरी के कड़ा फैसला लिया. लेफ्टिनेंट जनरल भट्ट कहते हैं, "हमारे चीफ के डिसीजन और रिस्क लेने की क्षमता बहुत अव्वल थी. हमने तय किया कि चीनी सैनिकों को वहीं रोकना है." 18 जून 2017 को भारत के करीब 270 जवान सीमा पार कर उस इलाके में दाखिल हुए और चीन के काम को रोक दिया. यह चीन के लिए एक बड़ा शॉक था क्योंकि उन्हें भारत से इतने आक्रामक रुख की उम्मीद नहीं थी. 

लेफ्टिनेंट जनरल अनिल भट्ट ने बताया कि हमने पहले ट्रूप्स मूव किया उसके बाद प्रधानमंत्री को बताया. ऐसा इसलिए क्योंकि हमें पता था कि हम सही कर रहे हैं और हमारे राजनेता हमारा हाथ पकड़ेंगे. हम उनको बता रहे थे कि ऐसे हो रहा है... ये हो रहा है....वो हो रहा है. पर ये नहीं हुआ कि हमने पहले कहा कि जी हम जा सकते हैं और उसके बाद हम गए...ऐसा नहीं है.  यह इसलिए हम कर पाए क्योंकि हमको पूरा विश्वास था कि हमारे पिलिटिकल लीडर यानी कि प्राइम मिनिस्टर डिसाइसिव हैं. वो हमारी बात पर एग्री करेंगे.

1962 और अब में सबसे बड़ा फर्क क्या था? 

लेफ्टिनेंट जनरल भट्‌ट ने आगे कहा- 1962 में और आज में यही फर्क है था कि अब फौज पीछे नहीं देख रही थी कि डिसीजन कौन लेगा. ना डिसीजन मेकर डिसीजन को अवॉइड कर रहा था. एक टोटल पॉलिटिकल और हाईएस्ट लेवल की क्लेरिटी थी कि हां यह भारत की सिक्योरिटी को अफेक्ट करता है और इसमें भले ही लड़ाई भी लग जाए हम इस डिसीजन को सपोर्ट करेंगे और आगे बढ़ाएंगे. 

अनोखा मुकाबला: डोजर के सामने खड़े हो गए डोजर 

भट्ट ने बताया कि चीनियों के पास भारी मशीनरी (डोजर) थे, जिन्हें इंसानी तौर पर रोकना मुश्किल था. सौभाग्य से उस वक्त भारत का भी एक रोड प्रोजेक्ट पास में चल रहा था. जब 270 जवान आगे बढ़े, तो हम भी अपने डोजर साथ लेकर गए. हमने अपने डोजरों को चीन के डोजरों के बिल्कुल सामने लगा दिया. यानी वहां सिर्फ जवानों का नहीं, बल्कि 'डोजर टू डोजर' कन्फ्रंटेशन भी चल रहा था. इसका जबरदस्त साइकोलॉजिकल असर चीन पर पड़ा.

दिल्ली में हर शाम होती थी 'सीक्रेट' मीटिंग

लेफ्टिनेंट जनरल भट्ट ने खुलासा किया कि डोकलाम संकट के दौरान दिल्ली में जबरदस्त समन्वय (Coordination) था. हर शाम को आर्मी चीफ, एनएसए (NSA), तब फॉरेन सेक्रेटरी रहे एस. जयशंकर, रॉ (RAW) चीफ और आईबी (IB) चीफ आपस में मिलते थे. पल-पल की जानकारी साझा की जाती थी. सरकार और सेना के बीच भरोसे का यह आलम था कि सेना ने ग्राउंड पर एक्शन ले लिया था और लीडरशिप ने उसका पूरा समर्थन किया. 

पीएम मोदी का वो 'एक्स्ट्रा इनिशिएटिव'

73-75 दिनों तक चले इस तनाव के बीच कई बार लगा कि युद्ध छिड़ सकता है. चीन ने अपनी आर्टिलरी गन, टैंक और भारी फौज सिक्किम सीमा पर तैनात कर दी थी. लेफ्टिनेंट जनरल भट्ट के मुताबिक, इस तनाव को खत्म करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत इनिशिएटिव ने बड़ी भूमिका निभाई. 

हैमबर्ग में एक सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साफ कर दिया था कि वो भारत से बात नहीं करेंगे. बातचीत का कोई पूर्व निर्धारित शेड्यूल भी नहीं था. अचानक पीएम मोदी खुद शी जिनपिंग की तरफ बढ़े और उनसे कहा कि जो हुआ वो तो ठीक है पर इस मुद्दे तो बात करनी पड़ेगी. फिर वहीं से शांति का रास्ता खुला और इस संकट का समाधान निकला. 

डोकलाम से गलवान तक का सबक 

पूर्व डीजीएमओ ने बताया कि डोकलाम के बाद ही भारतीय सेना ने अपना पूरा फोकस 'नॉर्थ' (चीन सीमा) की तरफ कर दिया था. यही कारण था कि जब दो-तीन साल बाद गलवान की घटना हुई, तो भारत वहां पूरी तैयारी के साथ खड़ा था. चीन हमें टेस्ट करना चाहता था, लेकिन भारत की 'रेसोल्यूट' (दृढ़) रणनीति ने उन्हें हर बार कड़ा जवाब दिया. 

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