देश के सरकारी स्कूलों की खस्ताहाल स्थिति और बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ का एक गंभीर मामला सामने आया है. अभिजीत दीपके ने हिंगोली के सरकारी स्कूल का दौरा करने के बाद प्रशासन और सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने मीडिया के सामने सबूत दिखाते हुए कहा कि सुबह जब उन्होंने स्कूलों का निरीक्षण किया तो वहां स्थिति बेहद चौंकाने वाली थी. मिड-डे मील के लिए इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थ छह से सात महीने पहले ही एक्सपायर हो चुके थे.
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नेताओं और विधायकों से तीखे सवाल
सरकारी तंत्र की इस लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए अभिजीत दीपके ने मंत्रियों, सांसदों और विधायकों से तीखे सवाल किए हैं. उन्होंने कहा कि जो जनप्रतिनिधि और नेता कुर्सियों पर बैठे हैं, वे बताएं कि क्या वे अपने बच्चों को छह-सात महीने पुराना एक्सपायर्ड खाना खिलाते हैं? अगर नहीं, तो गरीब बच्चों के स्वास्थ्य और जिंदगी के साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है? क्या गरीब बच्चों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है?
बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते छात्र
दीपके ने आगे तंज कसते हुए कहा कि, इतने सालों के बाद भी सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत बदलने का नाम नहीं ले रही है. स्कूलों में बच्चों के लिए पीने के पानी के फिल्टर, शौचालय और बैठने के लिए बेंच तक मौजूद नहीं हैं. सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की बुनियादी स्थिति जस की तस बनी हुई है. उन्होंने कहा कि बच्चों को पढ़ाई और स्कूल संभालने में मदद करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन यहां तो बच्चों के लिए सबसे बुनियादी सुविधाएं भी गायब हैं.
शिक्षकों की कमी और बढ़ता मानसिक तनाव
दीपके ने कहा कि, स्कूलों में केवल सुविधाओं का ही अकाल नहीं है, बल्कि शिक्षकों की भारी कमी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है. कई स्कूलों में छह कक्षाओं को पढ़ाने के लिए सिर्फ तीन शिक्षक हैं, तो कहीं आठ कक्षाओं के संचालन का जिम्मा महज चार शिक्षकों पर डाला गया है. स्थिति यह है कि एक-एक शिक्षक को एक साथ दो-दो कक्षाओं के बच्चों को पढ़ाना पड़ रहा है. इसके अलावा, शिक्षकों पर चुनाव, जनगणना और अन्य गैर-शैक्षणिक कार्यों का अतिरिक्त बोझ लाद दिया गया है. दूर-दराज से दो-दो घंटे का सफर तय कर स्कूल पहुंचने वाले शिक्षक भारी मानसिक तनाव और डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं. यहां तक कि शिक्षकों के लिए भी अलग से वॉशरूम की सुविधा उपलब्ध नहीं है.
सरकार की प्राथमिकताओं पर उठाए सवाल
नेताओं और जनप्रतिनिधियों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े नेता अपने ही गांव के स्कूलों का विकास नहीं कर पाते हैं. इससे साफ जाहिर होता है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा देना इनकी प्राथमिकता में शामिल ही नहीं है. सरकार और नेताओं की पहली प्राथमिकता सिर्फ किसी भी तरह सत्ता हासिल करना, दूसरी पार्टियों को तोड़ना और विधायकों व सांसदों की खरीद-फरोख्त करना रह गई है. शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है.
प्रशासन को दिया 10 दिनों का अल्टीमेटम
अपने गृह क्षेत्र हिंगोली में स्थिति सुधारने का संकल्प दोहराते हुए अभिजीत दीपके ने अधिकारियों से मुलाकात की और स्कूल की समस्याओं को हल करने की मांग रखी. उन्होंने अधिकारियों को स्पष्ट चेतावनी दी कि 10 दिनों के भीतर अधिकारियों को स्कूल का निरीक्षण कर मूलभूत सुविधाओं का काम शुरू करना होगा. अगर दिए गए समय के भीतर स्थिति में सुधार नहीं हुआ और काम नहीं हुआ, तो वे इस मुद्दे को और जोर-शोर से उठाएंगे.
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