Charchit Chehra: कौन हैं देवेंद्रनाथ महतो, जो बन गए रांची के छात्र आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा? जानिए पूरी कहानी

रूपक प्रियदर्शी

• 01:09 PM • 06 Aug 2026

Charchit Chehra Devendra Mahto: रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में छात्र लगातार JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित धांधली को लेकर प्रदर्शन कर रहे है. इसी बीच छात्र नेता देवेंद्रनाथ महतो इस आंदोलन का बड़ा चेहरा बनकर उभरे है. चर्चित चेहरा के इस एपिसोड में जानिए छात्र आंदोलन और देवेंद्र की पूरी कहानी.

Devendranath Mahato Profile
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दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन से समाज भी बदला और देश की राजनीति भी. जो सरकार नहीं झुकने के लिए जानी जाती थी उसने जंतर मंतर के आंदोलन की ताकत के आगे घुटने टेके हुए देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया. जंतर मंतर के शांत होते ही दूर रांची में एक और आंदोलन सुलग उठा. दिल्ली  में छात्रों के अधिकारों की जो अलख जगी थी, ठीक वैसा ही जंतर-मंतर अब रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में सजा हुआ है. 

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देश की सत्ता को हिलाने वाले जंतर-मंतर की ही तर्ज पर रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम भी आक्रोशित युवाओं का कुरुक्षेत्र बन गया, जहां झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन(JPSC) परीक्षा में कथित धांधली के खिलाफ हजारों छात्रों की फौज सड़कों पर उतर आई. इस Gen-Z आंदोलन के निर्विवाद हीरो और चर्चित चेहरा बनकर उभरे 29 साल के युवा तुर्क देवेंद्र नाथ महतो. बिना अन्न-जल के 4 दिनों तक आमरण अनशन पर बैठे देवेंद्र नाथ महतो तो झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार की नींद उड़ गईं. आइए विस्तार से जानते हैं पूरी कहानी.

छात्र क्यों कर रहे प्रदर्शन?

मामला JPSC की 14वीं सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा से जुड़ा है, जिसका परिणाम 5 जुलाई को आया था. छात्रों का आरोप है कि परीक्षा आयोजित करने वाली वेंडर कंपनी टीडीपीएल (TDPL) के ही एक बड़े अधिकारी ने खुद धांधली कर नौकरी पा ली और अपने करीबियों को रेवड़ियों की तरह सीटें बांट दीं. ओएमआर (OMR) शीट में विसंगतियों और कट-ऑफ मार्क्स में हेरफेर को लेकर जब झारखंड सरकार ने छात्रों की इस चीख को अनसुना किया, तो देवेंद्र ने 'अब नहीं तो कभी नहीं' का नारा बुलंद किया. 2 अगस्त की रात से बिना अन्न और पानी के प्रण के साथ आमरण अनशन पर बैठ गए. 

जिद और शांतिपूर्ण तरीके को देखकर झारखंड का सोनम वांगचुक पुकारा जाना जाने लगा. मांग रखी कि 14वीं JPSC PT परीक्षा को तुरंत रद्द किया जाए और पूरी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाई जाए. परीक्षा लेने वाली दागी वेंडर कंपनी टीडीपीएल (TDPL) को ब्लैकलिस्ट किया जाए. पूरे भर्ती घोटाले की जांच राज्य की एजेंसी के बजाय सीबीआई, ईडी (ED) को सौंपी जाए. फास्ट ट्रैक कोर्ट में केस चलाया जाए.

25 जुलाई से शुरू हुआ देवेंद्रनाथ महतो का आंदोलन!

आंदोलन की शुरुआत छात्र नेता और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा से जुड़े देवेंद्रनाथ महतो ने 25 जुलाई को रांची के मोरहाबादी मैदान में गांधी प्रतिमा के सामने धरना देने के साथ की थी. वहां से बढ़ता हुआ ये सत्याग्रह  29 जुलाई कोजयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में पहुंच गया. राज्यभर से आए हजारों परीक्षार्थियों के रहने, सोने और खाने का इंतजाम खुद छात्रों ने चंदा इकट्ठा करके किया था. चारों तरफ छात्रों की अलग-अलग टीमें बनाई गई थीं. कोई देवेंद्र के गिरते स्वास्थ्य की निगरानी के लिए डॉक्टरों के संपर्क में था, तो कोई सोशल मीडिया पर पल-पल की अपडेट 'हैशटैग' के साथ लाइव कर रहा था ताकि पुलिस रात के अंधेरे में देवेंद्र को जबरन उठा न सके. लाउडस्पीकर पर झारखंड आंदोलन के गीत बजे और क्रांतिकारी नारों से रांची का आसमान गूंजता रहा.

रांची के जंतर-मंतर पर देवेंद्र अकेले नहीं थे. उनके साथ मंच पर और स्टेडियम के चारों तरफ झारखंड के कोने-कोने से आए JPSC और JSSC के सैकड़ों पीड़ित छात्र चौबीसों घंटे पहरा दे रहे थे. लगातार 4 दिनों तक बिना पानी और अन्न के रहने के कारण 5 अगस्त तक देवेंद्र की हालत बेहद नाजुक हो गई थी. डॉक्टरों की टीम ने चेतावनी दी कि उनका ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल तेजी से गिर रहा है, जिससे उनकी जान को खतरा हो सकता है.

सोनम वांगचुक का फोन और महतो ने पिया पानी

कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया, जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर 26 दिनों का ऐतिहासिक अनशन करने वाले सोनम वांगचुक ने खुद देवेंद्र महतो को वीडियो कॉल किया. समझाया कि झारखंड के युवाओं को आपकी जरूरत है. बिना पानी के अनशन करना आत्मघाती है. लड़ाई बहुत लंबी है, इसलिए जिंदा रहकर लड़ना जरूरी है. सोनम वांगचुक की इस भावनात्मक अपील को देवेंद्र टाल नहीं सके और उन्होंने नींबू-पानी पीकर अपना अनशन खत्म कर दिया. इस मैसेज के साथ कि अनशन भले ही टूटा हो, लेकिन झारखंड के छात्रों के हक की  जंग अब सीधे विधानसभा तक जाएगी.

देवेंद्र महतो कौन हैं?

आमतौर पर छात्र नेताओं पर पढ़ाई से भागने के आरोप लगते हैं, लेकिन देवेंद्र महतो की कहानी बिल्कुल अलग है. रांची के कापीडीह गांव के शिक्षक परिवार में जन्मे देवेंद्र पढ़ाई में लगातार फर्स्ट क्लास रहे. 2006 में दसवीं की. 2008 में विज्ञान से इंटर और 2017 में रांची के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय संस्कृत से ग्रेजुएशन किया. इसके बाद कुरमाली भाषा से पीजी किया और फिर बीएड भी. 

देवेंद्र चाहते तो सरकारी स्कूल या कॉलेज में शिक्षक बन सकते थे, लेकिन उन्होंने खुद के लिए सुरक्षित भविष्य चुनने के बजाय झारखंड के लाखों बेरोजगार युवाओं के हक की कांटों भरी राह चुनी और 11 मुकदमे सिर पर सजा लिए. उनके समर्थकों और छात्र संगठनों का दावा है कि झारखंड के अलग-अलग थानों में आंदोलनकारी छात्रों के नाम पर की गई शिकायतों को जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या 30 के पार पहुंच जाती है. युवाओं के हक के लिए लाठियां खाना और थानों के चक्कर काटना अब इस युवा नेता की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है.

2015 से ही कर रहे आंदोलन

देवेंद्र कॉलेज के दिनों से ही छात्रों के हितों की लड़ाई लड़ने लगे. पहला आंदोलन 2015 में बीजेपी की रघुवर दास की सरकार के खिलाफ किया जब उन्होंने नियोजन नीति के विरोध में आंदोलन छेड़ा. 2016 में छात्रवृत्ति घटाने के खिलाफ आंदोलन के रास्ते पर उतरे. 2019 से देवेंद्र नाथ बड़े बनने लगे. तब उन्होंने जेपीएससी में कथित गड़बड़ियों को लेकर बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया. उनके आंदोलनों के कारण गड़बड़ी वाली झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमिशन (जेएसएससी)-सीजीएल परीक्षा, झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) की मैट्रिक परीक्षा भी रद्द हुई.

देवेंद्र महतो की संपत्ति का ब्यौरा!

अलग-अलग आंदोलन करते हुए देवेंद्र नाथ महतो ने भी राजनीति में भी एंट्री ली. आंदोलनकारी की निजी जिंदगी कैसी होती है, इसका पतका देवेंद्र नाथ महतो के चुनावी हलफनामे पता चला. 33 साल के देवेंद्र नाथ महतो आंदोलन में इतने रचे-बसे कि उन्होंने शादी नहीं की. लाखों युवाओं के इस नायक की कुल घोषित संपत्ति महज 1.66 लाख है. उनके नाम पर कोई भी आलीशान बंगला, अचल संपत्ति, महंगी कार या सोने-चांदी के गहने दर्ज नहीं हैं. आंकड़े गवाही देते हैं कि लाखों रुपये की सरकारी नौकरियों के घोटालों को उजागर करने वाला यह युवा खुद बेहद सादगी और सीमित संसाधनों में रहकर झारखंड के युवाओं के हक की लड़ाई लड़ रहा है.

देवेंद्र के संघर्ष की कहानी!

देवेंद्र महतो के इस संघर्ष के पीछे उनके परिवार की एक बेहद भावुक और दर्दनाक कहानी छिपी है. देवेंद्र के पिता विशंभर महतो रिटायर्ड सरकारी शिक्षक हैं, जिन्होंने पाई-पाई जोड़कर अपने होनहार बेटे को उच्च शिक्षा दिलाई ताकि वह घर का नाम रोशन करें. लेकिन जब देवेंद्र ने नौकरी छोड़ सड़कों को अपना घर बना लिया, तो पूरा परिवार संघर्ष का हिस्सा बन गया. 

आंदोलन की सबसे बड़ी त्रासदी ये रही कि जब देवेंद्र पिछले जेपीएससी (JPSC) आंदोलनों के दौरान जेल में बंद थे और सड़कों पर लाठियां खा रहे थे, तब उनके घर पर उनकी मां दमयंती देवी की तबीयत बेहद खराब हो गई. बेटे की चिंता और पुलिसिया मुकदमों के मानसिक तनाव के कारण देवेंद्र ने आंदोलन की इस आग में अपनी मां को खो दिया. जब सोनम वांगचुक से उनकी बात हुई, तो देवेंद्र का यह दर्द छलक पड़ा, उन्होंने रोते हुए कहा, 'इसी JPSC के आंदोलन ने मुझसे मेरी मां को हमेशा के लिए छीन लिया, मैं झारखंड के युवाओं के सपनों को मरने नहीं दे सकता.' आज भी उनका पूरा परिवार गांव में बेहद सादगी से रहता है और बेटे की सुरक्षा को लेकर हर पल डरा रहता है, लेकिन उनके हौसले के पीछे चट्टान की तरह खड़ा है.

शिबू सोरेन की तस्वीर के साथ क्यों कर रहे अनशन?

इस आंदोलन की सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह थी कि देवेंद्र जिस मंच पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) सरकार के खिलाफ अनशन कर रहे थे, ठीक उसी मंच पर JMM के संस्थापक और झारखंड आंदोलन के महानायक दिशोम गुरु शिबू सोरेन की तस्वीर सीने से लगाकर वे बैठे थे. देवेंद्र ने सफाई दी कि हम मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के दुश्मन नहीं हैं. हम तो उन्हें उनके पिता शिबू सोरेन के संघर्षों की याद दिला रहे हैं. जिस झारखंड को गुरुजी ने खून-पसीना बहाकर अलग राज्य बनवाया, आज उसी राज्य के मूलनिवासी छात्र नौकरी के लिए तरस रहे हैं. हम सिर्फ गुरुजी के अधूरे सपनों का झारखंड मांग रहे हैं.'

राजनीति में भी बड़े-बड़ों को पछाड़ा!

देवेंद्र नाथ महतो सिर्फ सड़कों पर नारे लगाने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से राजनीति की मुख्य धारा में भी आए. 2024 के लोकसभा चुनाव के समय छात्रों के आंदोलन के कारण देवेंद्र जेल में बंद थे. उन्होंने जेल के भीतर से ही रांची लोकसभा सीट से निर्दलीय पर्चा भर दिया. तब मौजूदा रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ बीजेपी के उम्मीदवार थे. देवेंद्र नाथ जीते तो नहीं लेकिन जेल में रहते हुए इस युवा को जिताने के लिए 1.32 लाख लोगों ने वोट दिए. बड़े-बड़ों को पछाड़कर देवेंद्र तीसरे नंबर पर रहे.  

फिर उन्होंने झारखंड की बड़ी पार्टियां में जाने की बजाय छोटी पार्टी चुनी. छात्र नेता जयराम महतो की पार्टी झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) में शामिल हुए. सिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हुए उन्होंने 41 हजार से अधिक वोट हासिल किए. उनके इस अनशन मंच पर झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के प्रमुख और विधायक जयराम महतो चट्टान की तरह खड़े रहे, जिन्होंने राजभवन जाकर खुद राज्यपाल से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की. 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों का नेतृत्व 'कॉकरोच जनता पार्टी नाम का डिजिटल युवा संगठन कर रहा था, जिसके संस्थापक अभिजीत दिपके ने रांची में देवेंद्र नाथ महतो के अनशन को भी खुला समर्थन दिया था. विवाद तब गहराया जब बीजेपी के अमित मालवीय समेत कई सारे लोगों ने सवाल उठाए कि कॉकरोच नेता  रांची के वास्तविक जमीन से जुड़े गरीब छात्रों की सुध लेने क्यों नहीं आए?

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