देश के इतिहास में ये पहला ही मौका है, जब इतनी मजबूत सरकार के रहते सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस भी सवालों के घेरे में आ गए हैं. ये भी पहली बार हो रहा जब सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हो चुके जज और सुप्रीम कोर्ट के सीटिंग जज एक सुर से बोल रहे हैं कि देश में सब कुछ सही नहीं हो रहा है. जजों के तीखे तीर सीधे सरकार के कलेजे को चुभ रहे हैं. अचानक न्यायपालिका के भीतर सुलगी चिंगारी को डिकोड करने की कोशिशें हो रही हैं. सीटिंग जज जस्टिस उज्जल भुइयां और पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने अलग-अलग लेकिन एक ही दौर, एक ही वक्त में ऐसा कौन सा 'संवैधानिक बारूद' सुलगा दिया है, जिसने दिल्ली की सरकार से लेकर चुनाव आयोग तक को हिलाकर रख दिया है? जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा, उस पर क्या प्रतिक्रिया हुई, वो कहानी बता चुके हैं. आज चर्चित चेहरा हैं जस्टिस रोहिंटन नरीमन जिनका असहमति का बिछाया बारुद सरकार से समेटा नहीं जा रहा. विस्तार से जानिए पूरी बात.
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जस्टिस रोहिंटन ने क्या दिया बयान?
जस्टिस उज्जल भुइयां के ये बोलने से हंगामा मचा कि बिना नोटिस और बिना सुनवाई के किसी को वोटर लिस्ट से बाहर करना शरीर से आत्मा निकालने जैसा है. इस हंगामे के बाद फौरन बाद पूर्व जज जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन को राजकोट में भाषण देने का मौका मिला. उन्होंने केस स्टडी की तरह जिक्र कर दिया कि अकेले पश्चिम बंगाल में 90 लाख मतदाताओं को अवैध रूप से वोटर लिस्ट से बाहर फेंक दिया गया, जिसने वहां की सरकार बदलने में भूमिका निभाई. जब प्रभावित 1 लाख लोगों ने इसके खिलाफ अपील की, तो उनमें से करीब 93% मामलों का फैसला वोटरों के पक्ष में आया. जस्टिस नरीमन ने इसे 'सरकार जो चाहती है उसे हासिल करने के लिए आम आदमी को अवैध रूप से नॉकआउट करना' करार दिया.
पहले भी कई बार कर चुके हैं विरोध!
जज रोहिंटन नरीमन को रिटायर हुए अरसा हो गया लेकिन उन्होंने रिटायरमेंट लाइफ नहीं चुनी. वोटर लिस्ट पर आज बोलने से पहले वो खुलकर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नए कानून का विरोध कर चुके हैं. जस्टिस नरीमन उन लोगों में से जिन्होंने चुनाव आयुक्तों को चुनने वाली समिति से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को बाहर का रास्ता दिखाने का विरोध किया. उनकी नाराजगी सुप्रीम कोर्ट से भी है कि CJI की जगह PM के एक मंत्री को बिठाने के फैसले पर तुरंत स्टे क्यों नहीं दिया? लोकतंत्र के लिए पहला बड़ा 'रेड फ्लैग' यानी खतरे की घंटी बताते हुए कहा कि आप ऐसा चुनाव आयोग नहीं रख सकते जो इस तरह काम करें या मैलफंक्शन करें.
क्यों जस्टिस रोहिंटन को अनदेखी करना मुश्किल?
जस्टिस रोहिंटन नरीमन 7 जुलाई 2014 से 12 अगस्त 2021 तक सुप्रीम कोर्ट के जज रहे. उनका पूरा करियर उस दौर में सुप्रीम कोर्ट में बीता जब मोदी सरकार देश को सरकार चला रही थी. वो पांचवें ऐसे जज बने जो बार यानी वकालत करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज बने. जब रिटायर हुए तो उनके बॉस चीफ जस्टिस ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट का शेर कहकर फेयरवेल दिया था.
जस्टिस रोहिंटन नरीमन के बारे में कहा जाता है कि वो सरकार के एजेंडे पर चलने वाले जज नहीं बने. जब भी सरकार ने नागरिकों की स्वतंत्रता या अधिकारों को दबाने की कोशिश की, जस्टिस नरीमन का पेन सरकार के खिलाफ ही चला. यही कारण है कि आज रिटायरमेंट के बाद जब वे चुनाव आयोग की नियुक्ति और वोटर लिस्ट पर बोल रहे हैं, तो बहुत सारे लोगों को हैरानी नही हो रही. सरकार पसंद करें या नहीं, उनकी अनदेखी करना मुश्किल है.
कई बड़े फैसलों में मौजूद रहे जस्टिस!
नरीमन परिवार की पूरी विरासत को किसी एक राजनीतिक दल के चश्मे जैसे प्रो-कांग्रेस, एंटी-कांग्रेस या एंटी-बीजेपी से देखना गलत होगा. इनके पूरे इतिहास का प्रामाणिक रिकॉर्ड यह साबित करता है कि परिवार किसी पार्टी का विरोधी या समर्थक नहीं, बल्कि 'संवैधानिक मूल्यों' और 'नागरिक स्वतंत्रता' का कट्टर समर्थक रहा है. जब भी सत्ता ने अपनी सीमाओं को लांघने की कोशिश की, चाहे केंद्र में कांग्रेस रही हो या बीजेपी, नरीमन परिवार ने हमेशा सरकार के खिलाफ खड़े होने का साहस दिखाया है.
7 साल के करियर में उन्होंने कई ऐसे फैसले दिए जो सरकार की मर्जी के खिलाफ माने गए. आईटी एक्ट की खूंखार धारा 66A को पूरी तरह रद्द करना ऐसा ही एक केस था. आधार कार्ड विवाद के दौरान केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा था कि नागरिकों के पास प्राइवेसी का कोई मौलिक अधिकार नहीं है. जस्टिस नरीमन उन 9 जजों की बेंच में शामिल थे जिसने प्राइवेसी को नागरिकों का मूलभूत मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21 घोषित कर दिया. तब ये सरकार की सीधी और बड़ी कानूनी हार मानी गई.
जज रोहिंटन नरीमन उन 5 जजों की उस बेंच का भी हिस्सा थे, जिसने 3:2 के बहुमत से तीन तलाक को असंवैधानिक और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करने वाला घोषित किया था. तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करना, सरकार की मर्जी के अनुकूल था. उन्होंने महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटाने का समर्थन किया, जबकि केरल से लेकर दिल्ली तक जमकर राजनीतिक घमासान चल रहा था. समलैंगिकता को अपराध मुक्त करने वाले जजों में भी शामिल रहे जज नरीमन.
अपने दम पर हासिल किया जस्टिस ने मुकाम!
कहते हैं कि बरगद के पेड़ के नीचे अक्सर छोटे पौधे पनप नहीं पाते. जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने इस कहावत को हमेशा के लिए बदल दिया. बॉम्बे के एक छोटे से फ्लैट से निकलकर हार्वर्ड और फिर सुप्रीम कोर्ट के जज की कुर्सी तक पहुंचने का सफर रोहिंटन ने अपने दम पर तय किया. जस्टिस रोहिंगटन नरीमन ने खुद अपना मुकाम हासिल किया लेकिन पैरलल ये परिचित हमेशा रहा वो देश के बड़े संविधान विशेषज्ञ फली एस नरीमन के बेटे हैं. नरीमन परिवार देश का सम्मानित पारसी परिवार है. पिता और पुत्र के बीच सिद्धांतों की दीवार इतनी मजबूत थी कि जब 2014 में रोहिंटन नरीमन सुप्रीम कोर्ट के जज बने, तो सीनियर एडवोकेट फली नरीमन ने कभी भी उस बेंच या कोर्ट रूम में कोई केस नहीं लिया, जिसमें उनके बेटे जस्टिस रोहिंटन नरीमन जज के रूप में बैठे हों. लीगल सर्कल में पिता-पुत्र की इस जोड़ी को 'द लीजेंडरी नरीमन डुओ' कहा जाता है.
पिता से मिली सरकार के सामने ना झुकने की हिम्मत!
जस्टिस रोहिंटन नरीमन को सरकार के आगे न झुकने की हिम्मत भी विरासत में मिली. फली एस नरीमन तो इंदिरा गांधी से उस दौर में टकराए जब वो सबसे शक्तिशाली स्थिति में थीं. 1972 में इंदिरा गांधी सरकार ने फली नरीमन की काबिलियत को देखते हुए देश का अडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) नियुक्त किया था. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन 25 जून 1975 की रात जैसे ही इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी की घोषणा की, फली नरीमन का जमीर जाग उठा. इमरजेंसी के विरोध में उन्होंने पद से एक लाइन का इस्तीफा टाइप करके भेज दिया. फली नरीमन उस दौर में देश के इकलौते टॉप सरकारी कानून अधिकारी माने गए जिन्होंने पावरफुल सरकारी कुर्सी और रुतबे को लात मारकर सीधे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से टकराने का हौसला दिखाया था. पिता के इसी 'डीएनए' और सिद्धांतों की धमक बेटे रोहिंटन नरीमन ने बनाए रखी.
जुलाई 2011 में यूपीए सरकार ने सॉलीसीटर जनरल नियुक्त किया था. तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार और रोहिंटन नरीमन के बीच गंभीर वैचारिक मतभेद और टकराव शुरू हो गया. रोहिंटन नरीमन को सरकारी कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप और काम में दखलअंदाजी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुई. उन्होंने कानून मंत्री से तीखी बहस के बाद सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपना इस्तीफा भेज दिया. अगले साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के जज ही बन गए.
रोहिंटन की नियुक्ति के लिए बदला गया था नियम!
रोहिंटन दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) से पढ़ाई के बाद उन्होंने लॉ में यूनिवर्सिटी में दूसरा स्थान पाया और फिर हार्वर्ड लॉ स्कूल से एलएलएम किया. उनकी प्रतिभा का सबसे बड़ा सबूत 1993 में मिला. तब नियम था कि 45 साल से कम उम्र के व्यक्ति को 'सीनियर एडवोकेट' नहीं बनाया जा सकता. लेकिन तत्कालीन चीफ जस्टिस एम.एन. वेंकटचेलैया ने रोहिंटन नरीमन की असाधारण मेरिट को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के नियमों में संशोधन कर दिया. महज 37 साल की उम्र में उन्हें सीनियर एडवोकेट का तमगा दे दिया.
रोहिंटन नरीमन देश के बड़े वकील बने. सुप्रीम कोर्ट जज बने. उनकी यूनिक कहानी ये है कि ये सब हासिल करने से पहले वो धार्मिक पुरोहित भी बने. मां के कहने पर 12 साल की उम्र में ही उन्होंने दीक्षा लेकर पारसी पुरोहित यानी Parsi Priest बन गए. पारसी धर्म के इनसाइक्लोपीडिया माने जाते हैं. दुनिया भर के धर्मों के इतने बड़े जानकार हैं कि घंटों इस पर लेक्चर दे सकते हैं.
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