Charchit Chehra: TCS के इंटर्न से टाटा संस तक के चेयरमैन तक, आखिर क्यों दिया एन.चंद्रशेखरन ने इस्तीफा? जानिए इनसाइड स्टोरी

न्यूज तक डेस्क

• 02:15 PM • 13 Aug 2026

Charchit Chehra N Chandrasekaran: TCS के प्रोजेक्ट इंटर्न से टाटा संस के चेयरमैन बनने तक एन. चंद्रशेखरन का सफर बेहद खास रहा है. रतन टाटा के भरोसेमंद माने जाने वाले चंद्रशेखरन के इस्तीफे की वजह, नोएल टाटा के साथ मतभेद, टाटा ग्रुप में उनके कार्यकाल और पूरी करियर जर्नी की इनसाइड स्टोरी जानिए.

N Chandrasekaran Biography
N Chandrasekaran Biography
Google CTA

देश के सबसे बड़े बिजनेस घराने टाटा साम्राज्य में एक और नया भूचाल आया है. टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने इस्तीफा देकर पूरे देश को चौंका दिया है. चंद्रशेखरन के इस कदम से शेयर बाजार में भूकंप मच गया. टाटा ग्रुप के शेयरों को भारी झटके लगे. ऐसा इसलिए कि जो व्यक्ति कल तक टाटा साम्राज्य का अघोषित सम्राट था, उसने अचानक अपनी बादशाहत छोड़ने का फैसला कर लिया. जो हुआ वो अचानक नहीं हुआ. उसकी स्क्रिप्ट पिछले 6 महीनों से टाटा बोर्ड के क्लोज डोर कॉन्फ्रेंस रूम्स में लिखी जा रही थी. स्क्रिप्ट तब से लिखी जानी शुरू हुई जब रतन टाटा नहीं रहे और उनके सौतेले भाई नोएल टाटा ने टाटा ग्रुप की कमान संभाली. 

Read more!

एन. चंद्रशेखरन की कहानी एक इंटर्न के चेयरमैन बनने की कहानी है. हमेशा से चर्चित चेहरा रहे लेकिन इस महा-विदाई के साथ उनकी और टाटा ग्रुप को लेकर चर्चाएं फिर तेज हैं. रतन टाटा के सबसे भरोसेमंद एन चंद्रशेखरन का टाटा के नए बॉस नोएल टाटा के बीच पिछले 6 महीने से क्या चल रहा था कि चंद्रशेखरन को नौकरी से ज्यादा अपनी गरिमा अहम लगने लगी? एन चंद्रशेखरन टाटा के एक एम्प्लाई नहीं थे. 30 से अधिक कंपनियों और 24 लाख करोड़ रुपये से बड़े साम्राज्य के कमांडर-इन-चीफ थे. 158 करोड़ प्लस CTC पाते थे. फिक्स सैलरी तो करीब 18 करोड़ रही लेकिन प्रॉफिट-लिंक्ड कमीशन 140 करोड़ पाते रहे. 5 साल चेयरमैन रहते हुए उन्होंने करीब 685 करोड़ कमाई की. टाटा ऐसे लोगों की ऐसी जानकारी पब्लिक नहीं करती. मीडिया में अनुमान है कि उनकी नेटवर्थ 1400 करोड़ के आसपास होगी. तो फिर ऐसा क्या हुआ कि रतन टाटा के सबसे भरोसेमंद चंद्रा टाटा से जाना पड़ा. आइए विस्तार से जानते है पूरी कहानी.

क्या है असल कहानी?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक महा-विवाद की नींव अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद पड़ी, जब उनके सौतेले भाई नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट्स के नए बॉस बने. फाइनल काउंडडाउन शुरू हुआ 24 फरवरी की बोर्ड मीटिंग में. चंद्रशेखरन को अगले 5 साल का एक्सटेंशन देने का प्रस्ताव आया. सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट उनके साथ थे, लेकिन बोर्ड के एक बेहद शक्तिशाली सदस्य खुद नोएल टाटा ने इस पर वीटो लगा दिया. टाटा संस में लगभग 66% हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा की राय काटी नहीं जा सकती.

नोएल टाटा चंद्रशेखरन को सिर्फ 2 साल का छोटा कार्यकाल देना चाहते थे. चंद्रशेखरन ने मान लिया कि जब बोर्ड में सर्वसम्मति नहीं बची, तो उन्होंने 18 अगस्त की एजीएम से ठीक पहले सम्मान के साथ टाटा संस का चेयरमैन पद छोड़ने का एलान कर दिया. फरवरी तक बचा हुआ काम पूरा करेंगे. कोई सुलह की गुंजाइश नहीं बची इसलिए कसम खाई कि आगे कोई एक्सटेंशन नहीं लेंगे.

कैसे तय होता है चेयरमैन का एक्सटेंशन?

टाटा संस में असली ताकत 'टाटा ट्रस्ट्स' के पास है, जिसकी इस होल्डिंग कंपनी में 66% की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. चेयरमैन बनाने या हटाने का पावर-गेम ट्रस्ट के लोग खेलते हैं. वही तय करते हैं कि चेयरमैन को आगे एक्सटेंशन देना है या किसी और को लाना है. दरअसल यहां 3 रास्ते होते हैं. पहला, अगर पुराने चेयरमैन का काम पसंद है तो 5 साल के लिए एक्सटेंशन दें. दूसरा, अगर नया चेहरा चाहिए तो सर्च कमेटी देश-विदेश से काबिल उम्मीदवार ढूंढेगी. और तीसरा रास्ता होता है टाटा ग्रुप की ही किसी कंपनी (जैसे TCS या टाटा मोटर्स) के बॉस को प्रमोट करके सीधे टाटा संस की गद्दी पर बैठा दिया जाए. 

एन चंद्रशेखरन तीसरे रास्ते से ही आए थे लेकिन पहले रास्ते से चलता कर दिए गए. फैसला भले ही बोर्ड लेता है, लेकिन असली हुक्म टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन का चलता है जो नोएल टाटा है. टाटा संस प्रमोटर कंपनी है जिसके चेयरमैन एन चंद्रशेखरन हैं जो खुद कोई बिजनेस नहीं करती बल्कि टीसीएस, टाटा मोटर्स जैसी कंपनियों की मालिक है. एन चंद्रशेखरन टाटा संस चेयरमैन के नाते इन कंपनियों के सुपर बॉस थे लेकिन उनके ऊपर भी कोई था जिसका नाम है नोएल टाटा. अभी कोई कन्फर्म नहीं कर सकता कि एन चंद्रशेखरन को चलता करना नोएल टाटा का कोई नोबेल आइडिया या महा रिस्क.

रतन टाटा की मौत के बाद बदला बहुत कुछ!

रतन टाटा के जाने और नोएल टाटा आने के बाद बहुत कुछ बदला. टाटा के कई दिग्गजों से नोएल टाटा की पटरी नहीं बैठी. सबसे बड़ा फ्रेश फ्लैशपॉइंट तो एन चंद्रशेखरन का है. अक्टूबर 2025 में टाटा ट्रस्ट्स के भीतर भी आंतरिक घमासान में ट्रस्टी मेहली मिस्त्री के साथ टकराव हुआ. ट्रस्टी विजय सिंह को भी टाटा संस के बोर्ड में एक्सटेंशन के विवाद पर जाना पड़ा. या तो नए नोएल टाटा पुरानों से तालमेल नहीं बिठा पाए या पुराने नोएल टाटा के बिजनेस आइडियाज के साथ एडजस्ट नहीं कर पाए.

18.37% हिस्सेदारी वाले शापूरजी पल्लोनजी (SP) ग्रुप का भी मामला गडबड़ चल रहा है. हालांकि रतन टाटा के जमाने में 2016 में सायरस मिस्त्री को हटाए जाने के बाद से दोनों समूहों के बीच दशकों पुराना दोस्ताना रिश्ता हिल गया था. ग्रुप गंभीर वित्तीय संकट और भारी कर्ज से निपटने के लिए टाटा के साथ एक 'सम्मानजनक एग्जिट के लिए बातचीत कर रहा है.

सुप्रीम बनते ही नोएल ने लिए कई फैसले!

नोएल टाटा टाटा के सुप्रीम बने क्योंकि उनकी रगों में टाटा का ही खून बह रहा था. रतन टाटा के सौतेले भाई होने के कारण नोएल टाटा ही टाटा को लीड करने के सबसे बेहतर विकल्प माने गए लेकिन इनसाइड सोर्सेज के मुताबिक, नोएल टाटा के आते ही टाटा ग्रुप में बहुत कुछ बदल गया. धंधा क्या चलेगा, कैसे चलेगा, इसी पर विवाद हुआ नोएल और चंद्रा के बीच.

चंद्रशेखरन टाटा संस का आईपीओ लाने के पक्ष में थे. नोएल टाटा की जिद थी कि टाटा संस प्राइवेट-अनलिस्टेड कंपनी ही रहे. किस बिजनेस में पैसे लगाने हैं, किस पर फोकस करना है, इस पर भी विवाद हुआ. चंद्रशेखरन ने एयर इंडिया, सेमीकंडक्टर, ईवी बैटरी, टाटा न्यू जैसे फ्यूचरिस्टिक बिजनेस में पानी की तरह पैसा बहाया. नोएल टाटा ने इन घाटे वाले सौदों और आक्रामक निवेश पर कड़ा ऐतराज जताया. नोएल टाटा की पॉलिसी है जीरो रिस्क, जीरो डेप. ये सोच चंद्रशेखरन की अग्रेसिव एक्सपेंशन प्लान की पॉलिसीज से टकरा रही थी.

चंद्रशेखरन भले ही विदा हो रहे हों, लेकिन वे टाटा ग्रुप को वित्तीय कामयाबी के उस शिखर पर छोड़ जा रहे हैं जहां पहुंचना किसी भी उत्तराधिकारी के लिए एवरेस्ट चढ़ने जैसा होगा. जैसे रतन टाटा के जाने से टाटा में एक युग का अंत हुआ, वैसे ही चंद्रशेखरन का जाना भी टाटा साम्राज्य में एक और युग के अंत जैसा है. आगे सबकी नजरें इस बात पर हैं कि नोएल टाटा आगे किसे लेकर आएंगे टाटा को चलाने के लिए.

कौन हैं एन. चंद्रशेखरन?

एन. चंद्रशेखरन की करियर जर्नी बहुत रेयर है. वो भी तब जबकि आप तमिलनाडु के नमक्कल जिले के गांव मोहनूर से निकले हो. एन चंद्रशेखरन के पिता श्रीनिवास नटराजन खेती-किसानी से परिवार चलाते थे. चंद्रशेखरन का बचपन बेहद सादगी में बीता. पांच भाई-बहनों के साथ गांव के माहौल में पले-बढ़े. बचपन में भाइयों के साथ अक्सर खेतों में पिता का हाथ बंटाने जाया करते थे. तब कहां किसे पता था कि आगे क्या होने वाला है. 

चंद्रशेखरन की शुरुआती पढ़ाई उनके गांव मोहनूर के ही एक सरकारी तमिल मीडियम स्कूल में हुई. गांव से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद त्रिची के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज से अप्लाइड साइंसेज में बैचलर डिग्री (B.Sc) हासिल की. वो दौर देश में टेक्नलॉजी आने का था. चंद्रशेखरन ने भांप लिया कि दुनिया के लिए दुनिया कैसे बदलने वाली है. उन्होंने कंप्यूटर एप्लीकेशंस में मास्टर डिग्री (MCA) पूरी की. 

टाटा में चंद्रशेखरन का सफर

1987 चंद्रशेखरन के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. MCA की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे एक प्रोजेक्ट इंटर्न के रूप में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) से जुड़े. टाटा में उनका निकनेम चंद्रा पड़ा. उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि दफ्तर में कोडिंग करने वाला यह साधारण सा लड़का एक दिन पूरी कंपनी का भाग्य बदल देगा. एक सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर के रूप में करियर शुरू करने वाले चंद्रा कंपनी में लगातार तरक्की करते गए. 

2007 में उन्हें टीसीएस का चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) बना दिया गया. अगले दो सालों में अक्टूबर 2009 में, महज 46 साल  की उम्र में, एन. चंद्रशेखरन को TCS का CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त किया गया. वो टाटा समूह के सबसे यंग सीईओ में से एक थे. उनके समय में टीसीएस ने सफलता के बड़े-बड़े झंडे गाड़े. वो दौर टाटा में रतन टाटा का था. रतन टाटा ने चंद्रशेखरन में वो देखा जो शायद कोई देख नहीं पाता. 

कैसे बने थे चंद्रशेखरन रतन टाटा के खास?

एन. चंद्रशेखरन और रतन टाटा की पहली बड़ी मुलाकात 90 के आसपास बताई जाती है. तब चंद्रा टीसीएस के यंग टेक मैनेजर थे. उन्हें रतन टाटा के सामने बोर्ड प्रेजेंटेशन देने का काम मिला था. वहीं रतन टाटा और चंद्रा की रिलेशनशिप डेवलप होती गई. 2016 में साइरस मिस्त्री और रतन टाटा के बीच विवाद चरम पर पहुंचा. साइरस मिस्त्री निकाले गए तब रतन टाटा के पास कोई और नहीं था जो टाटा का साम्राज्य संभाल सके. 12 जनवरी 2017 को इतिहास रचा गया, जब एन. चंद्रशेखरन को टाटा संस का नया चेयरमैन घोषित किया गया. एन चंद्रशेखरन टाटा के 150 साल के इतिहास में पहले ऐसे चेयरमैन बने जो गैर-पारसी थे, जिनका टाटा परिवार से कोई खून का रिश्ता नहीं था. विशुद्ध काबिलियत के दम पर टाटा संस के चेयरमैन बने जिससे अब उन्होंने इस्तीफा दिया है. 

चंद्रशेखरन की लाइफ जर्नी तब तक अधूरी है जब तक उनकी 'मैराथन' का जिक्र न हो. 2000 के आसपास टाइप-2 डायबिटीज के शिकार हुए. उन्होंने फिट रहने के लिए दौड़ना शुरू किया. फिर तो दौड़ उनका जुनून बन गया. मुंबई में दौड़ते-दौड़ते इतना बड़ा कॉरपोरेट शख्स एम्स्टर्डम, बोस्टन, शिकागो, बर्लिन, न्यूयॉर्क और मुंबई मैराथन में दौड़ने लगा. 

एन. चंद्रशेखरन की पर्सनल लाइफ की कहानी!

एन. चंद्रशेखरन और ललिता की शादी एक पारंपरिक अरेंज्ड मैरिज  थी, जिसे दोनों के परिवारों ने तय किया था. ललिता के लिए टाटा का माहौल नया नहीं था. उनका जन्म ही जमशेदपुर में हुआ जिसे टाटानगर भी कहा जाता है. पिता और दादा दोनों ही टाटा स्टील में नौकरी कर चुके थे. शादी से पहले ललिता इन्वेस्टमेंट बैंकर का करियर शुरू कर चुकी थीं लेकिन शादी के बाद उन्होंने चंद्रा को सपोर्ट करने अपना करियर छोड़ दिया. 

यहां देखें वीडियो

Tata Group में बड़ा भूचाल! चंद्रशेखरन ने छोड़ा Tata Sons चेयरमैन पद, शेयरों में मची हलचल