कहते हैं कि साम्राज्य खड़ा करने में दशकों लग जाते हैं, लेकिन उसे हिलाने के लिए सिर्फ एक गलती काफी हो सकती है. कॉर्पोरेट वर्ल्ड का गोल्डन रूल माना जाता है कि, आपका विजन आपके बिजनेस से बड़ा हो सकता है, लेकिन विचारधारा कभी ब्रांड से बड़ी और उसके आगे नहीं होनी चाहिए. टाटा, बिरला, अंबानी, अदाणी जैसे देश के बड़े घरानों ने एक बात हमेशा याद रखी कि बिजनेस का कोई धर्म या राजनीतिक रंग नहीं होता. लेकिन लेंसकार्ट के विजनरी पीयूष बंसल और उनकी पत्नी निधि मित्तल से शायद यहीं चूक हो गई.
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जब करोड़ों भारतीयों की आंखों पर चश्मा चढ़ाने का कामयाब बिजनेस जमाते हैं तो ये भूलना नहीं चाहिए कि लाखों-करोड़ों आंखें हर हरकत पर नजर रखे हुए हैं. बंसल्स ने वो गलती कर दी जो पुराने और तपे हुए बिजनेसमैन कभी नहीं करते, उन्होंने अपनी निजी राजनीतिक पसंद और कंपनी की ग्रूमिंग पॉलिसी के बीच की उस बारीक लक्ष्मण रेखा की अनदेखी कर दी. क्या लेंसकार्ट का विजन वाकई साफ है, या फिर कामयाबी के चश्मे पर धार्मिक-राजनीति सोच की धूल जम गई? IIT में फेल होकर माइक्रोसॉफ्ट तक पहुंचने वाले पीयूष बंसल ने अपने विजन से अपनी कंपनी, साम्राज्य, ब्रांड तो बनाया लेकिन उसी विजन के एक छोटे से कण से अपने ही विजन में उलझ गए.
कहानी अरबों की कंपनी के पीछे छिपे उन 23 पन्नों की है, जिसने सोशल मीडिया पर भूचाल ला दिया है. एक तरफ लेंसकार्ट का वो साम्राज्य, जो आसमान छू रहा है और दूसरी तरफ पीयूष बंसल की पत्नी निधि मित्तल के वो पुराने शब्द, जो पीयूष बंसल और उनके बनाए ब्रैंड लेंसकार्ट के लिए अंगारे का काम कर रहे हैं. चर्चित चेहरा के इस एपिसोड में आज जानेंगे क्यों विवाद में हैं पीयूष बंसल और निधि मित्तल बंसल और उनका लेंसकार्ट? साथ ही जानेंगे पीयूष बंसल का ज़ीरो से हीरो बनने का सफर, निधि मित्तल के वो डिलीट किए गए ट्वीट्स और वो ग्रूमिंग गाइड जिसने आस्था और प्रोफेशनलिज्म के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींच दी.
कभी IIT से इंजीनियर बनने का था सपना
लेंसकार्ट में पीयूष बंसल फाउंडर और सीईओ हैं. माइक्रोसॉफ्ट इंजीनियर रहे और इन दिनों शार्क टैंक इंडिया के मशहूर जज हैं. नेट वर्थ करीब 600 करोड़ मानी जाती है. उनका जन्म दिल्ली में हुआ. उनके पिता सीए थे. इसलिए घर में पढ़ाई और हिसाब-किताब का माहौल शुरू से ही था. उन्होंने स्कूलिंग दिल्ली के मशहूर डॉन बॉस्को स्कूल (Don Bosco School) से की. पीयूष का सपना IIT से इंजीनियर बनने का था. जी-तोड़ मेहनत की, कोचिंग ली, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। IIT इंट्रेस तक नहीं निकाल पाए.
छोड़ दिया था करोड़ों का पैकेज
उसी रिजेक्शन से शुरू हुई जिसने उन्हें सेलेक्शन का असली मतलब समझाया. जिस साल वो IIT की परीक्षा में नाकाम हुए, लोगों को खबर भी नहीं लगी होगी कि कोई सपना था जो चूर-चूर हो गया. उस हार ने उनके भीतर की आग को और दहका दिया. दिल्ली से कनाडा की मैकगिल यूनिवर्सिटी तक का सफर सिर्फ मीलों की दूरी नहीं, बल्कि एक साधारण छात्र के असाधारण बनने की जिद थी. वहीं से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री रिज्यूम में एड हुई और किस्मत ने सीधे माइक्रोसॉफ्ट के दरवाजे खोल दिए. लेकिन करोड़ों का पैकेज और अमेरिका की ऐशो-आराम वाली जिंदगी पीयूष के विजन को बांध नहीं सकी. उनके दिमाग में नौकरी नहीं, एक क्रांति चल रही थी. माइक्रोसॉफ्ट की सैलरी से जेब भर रही थी, मन नहीं. वहीं से शुरू हुई खुद का बिजनेस साम्राज्य खड़ा करने की सुगबुगाहट.
एक के बाद एक स्टार्टअप किया लॉन्च
अमेरिका और माइक्रोसॉफ्ट की लग्जरी छोड़कर जब पीयूष भारत लौटे, तो उनके पास सिर्फ एक आइडिया नहीं, बल्कि फेलियर से लड़ने का तजुर्बा था. एक दिन उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट की दीवारें छोड़ीं और लौट आए भारत. जो लड़का कभी एक सरकारी कॉलेज की सीट नहीं पा सका, आज वो भारत के हजारों लोगों के लिए जॉब क्रिएटर बन गया. शार्क टैंक की कुर्सी पर बैठकर जब वो किसी स्टार्टअप को परखते हैं, तो वो सिर्फ एक इन्वेस्टर नहीं होते, बल्कि उस अनुभव की आवाज होते हैं जिसने अपनी हर हार को सफलता की सीढ़ी बना लिया.
पीयूष ने बिजनेस ड्रीम को धार देने के लिए IIM बैंगलोर का रुख किया, जहां उन्होंने डिप्लोमा इन एंटरप्रेन्योरशिप की पढ़ाई की. यहीं से उनके पहले स्टार्टअप 2007 में SearchMycampus का जन्म हुआ. छात्रों के लिए एक ऐसा सोल्यूशन था जहां एक ही पोर्टल पर जॉब्स, हॉस्टल, कोचिंग, इंटर्नशिप और यहां तक कि किताबों का समाधान मिलता था.
लेकिन पीयूष यहीं नहीं रुके. उन्होंने Valyoo Technologies की नींव रखी और Flyrr जैसे कई स्टार्टअप्स लॉन्च किए. ये शुरुआती कदम छोटे थे, लेकिन उनकी रफ्तार और कामयाबी ने साफ कर दिया था कि पीयूष बंसल के पास बाजार की नब्ज पहचानने का वो विजन है, जो बहुतों के पास नहीं होता. यही वो तजुर्बा था, जिसने आगे चलकर लेंसकार्ट के रूप में आईवियर इंडस्ट्री का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया. ये सब तब हो रहा है जब पीयूष बंसल लेंसकार्ट को शेयर मार्केट में ले आए.
पीयूष और निधि ने खड़ा किया साम्राज्य
ये सब अकेले पीयूष बंसल नहीं किया. जब 2008 में लेंसकार्ट शुरू किया था तब कुंवारे थे. 2011 में फॉर्मली निधि मित्तल ने पत्नी और पार्टनर बनकर जिंदगी में दस्तक दी. पीयूष बंसल की सफलता के पीछे उनकी पत्नी निधि मित्तल बंसल एक मजबूत पिलर बनकर खड़ी रहीं. जहां पीयूष ने लेंसकार्ट का साम्राज्य खड़ा किया तो निधि सपोर्ट सिस्टम बनी रहीं. फिर शुरू हुई बंसल्स की सक्सेस की गजब स्टोरी.
पीयूष बंसल की ऐसी कोई कहानी नहीं जिसकी प्रेम कहानी हो. शादी से पहले अफेयर, गर्लफ्रेंड के बारे में कोई जानकारी नहीं. पर्सनल लाइफ को बेहद पर्सनल रखने वाले पीयूष बंसल के बारे में कहा जाता है कि किसी को नहीं पता कि निधि मित्तल से कब कैसे मिले. ये भी नहीं पता कि शादी अरेंज मैरिज थी या लव मैरिज. बस इतना पता है कि पीयूष बंसल की पत्नी निधि बंसल मित्तल हैं. उनकी प्यारी सी जोड़ी परिवार और बिजनेस में लगातार तरक्की कर रही है. पहली बार लगा है इतना बड़ा झटका जिसके बारे में कहा जा रहा है कि बंसल्स पॉलिटिकली एक्सपोज हो गए.
लेंसकार्ट की सक्सेस स्टोरी!
पीयूष बंसल ने अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट की मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ दी ताकि भारत में कुछ बड़ा कर सकें. 2008 में उन्होंने तीन पार्टनर के साथ लेंसकार्ट की शुरुआत की और समस्या को ही अपना अवसर बना लिया. लोग चश्मा खरीदने के लिए पुरानी दुकानों पर निर्भर हैं जहां विकल्प कम, दाम ज्यादा हैं. पीयूष ने आइडिया लगाया और उन्होंने किसी से माल खरीदकर किसी को बेचने का मॉडल नहीं अपनाया. लेंसकार्ट को मैन्युफैक्चरर बनाया. अपना माल खुद बनाते हैं. बिना किसी मिडिल मैन के सीधे कस्टमर्स को बेचते हैं.
इससे प्रॉफिट मिलता है और कस्टमर्स को मन के लायक सस्ते में हाई-क्वालिटी चश्मे भी मिल रहे है. पीयूष बंसल ने समझा कि लोग बिना चश्मा ट्राई किए खरीदते नहीं. उन्होंने ऑनलाइन के साथ-साथ फिजिकल स्टोर्स की चेन खोल दी. ऑनलाइन चश्मा पसंद करें, स्टोर जाकर उसे ट्राई करें. इस मॉडल ने लेंसकार्ट को हिट बना दिया. चश्मा खरीदने के अनुभव को एक गेम की तरह मजेदार बना दिया. सिंगल लाइन में पीयूष बंसल के लेंसकार्ट ने चश्मे को मेडिकल डिवाइस से बदलकर एक फैशन एक्सेसरी बना दिया.
हिजाब सही लेकिन कलावा नहीं!
ये सब तो सक्सेस स्टोरी है. अब जो हुआ उसमें धर्म, राजनीति सब है सिवाय चश्मे के. बिंदी, सिंदूर, कलावा, पगड़ी, हिजाब के बहाने धार्मिक राजनीतिक जंग में पीयूष और निधि मित्तल फंसे हुए हैं. एक लव स्टोरी और बिजनेस पार्टनरशिप आज नेशनल हेडलाइन बन गई. लेंसकार्ट में इतना बड़ा पॉलिटिकल, रिलीजियस हंगामा तब शुरू हुआ जब कंपनी का 23 पेज का इंटरनल कम्युनिकेशन स्टाफ यूनिफॉर्म एंड ग्रूमिंग गाइड लीक हुआ. गाइड में स्टाफ को बताया कि क्या पहनना है, क्या नहीं. शर्तों के साथ गाइड में हिजाब, पगड़ी पहनने की इजाजत दी गई लेकिन हिंदू धार्मिक प्रतीकों जैसे बिंदी, तिलक, कलावा पर पाबंदी या कड़ी शर्तें लगा दीं. एक चुटकी सिंदूर के लिए इतने टर्म्स एंड कंडीशन कि सिंदूर लगाना है तो बहुत कम, पूरे माथे पर फैलने जितना कतई नहीं.
निधि बंसल के पोस्ट क्यों हो रहे वायरल?
जब देश में इतना हिंदू-मुसलमान चल रहा है तब बवाल मचना ही था. जब बवाल मचा था तो सोशल मीडिया पर अतीत की कुंडली खंगाल की गई. दावा किया गया मोदी के दौर में पीयूष बंसल की पत्नी और लेंसकार्ट फाउंडेशन की चेयरपर्सन निधि मित्तल तो केजरीवाल सपोर्टर हुआ करती थीं. 2013 से 2015 तक की उनकी पोस्ट के कई वायरल स्क्रीनशॉट इंटरनेट पर घूम रहे हैं, जिनमें वो हिंदू संगठनों, बीजेपी पीएम मोदी की सरकार की खुलेआम आलोचना कर रही हैं. केजरीवाल के समर्थन में वोट 4 मफलरमैन, एक बिहारी फेकू पर जैसे हैशटैग चलाए.
इतनी ट्रोलिंग हुई कि X अकाउंट @nidhimittal13 डीएक्टिवेट हो गया. ये रहस्य बना है कि निधि मित्तल का X अकाउंट बंद हुआ या बंद कराया गया. इतना हंगामा हुआ कि कंपनी को झुकना पड़ा. फौरन नई स्टाइल गाइड जारी हुई जिसमें बिंदी, तिलक, सिंदूर, मंगलसूत्र, कलावा, हिजाब और पगड़ी- अब सब अलाउड है.
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