दिल्ली का भारत मंडपम, मौका 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का, जहां दुनिया की तीन महाशक्तियों के राष्ट्रध्यक्ष- भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक फ्रेम में हाथ मिलाते दिखे. यही तस्वीर पूरी दुनिया के अखबारों के फ्रंट पेज पर छपी. इसी के साथ तीनों महानायकों के बीच खड़े एक मुस्कुराते हुए 36 साल के अफसर ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया.
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मीडिया में क्वेचन मार्क के साथ हेडलाइंस बनने लगीं. कौन है मोदी, पुतिन और जिनपिंग के बीच खड़ा ये 'मिस्ट्री मैन'? यह चेहरा किसी नेता या सुरक्षा अधिकारी का नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे रहकर 2017 बैच के भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारी सिद्धार्थ बाबू का है. विदेश मंत्रालय (MEA) के ईस्ट एशिया डिवीजन में डिप्टी सेक्रेटरी सिद्धार्थ बाबू आज देश और दुनिया के मीडिया में डिप्लोमेसी का चर्चित चेहरा बनकर उभरे हैं. आइए विस्तार से जानते है पूरी कहानी.
तस्वीर वायरल होते ही शुरू हुई थी ट्रोलिंग!
जैसे ही यह तस्वीर वायरल हुई, कहानी का एक स्याह और निगेटिव एंगल भी सामने आया. सोशल मीडिया के एक धड़े ने सिद्धार्थ बाबू के शारीरिक रंग-रूप और लुक को लेकर ओछी टिप्पणियां और बॉडी-शेमिंग करते हुए ऑनलाइन ट्रोलिंग शुरू कर दी. कुछ यूजर्स ने यहां तक कह दिया कि इतने बड़े ग्लोबल मंच पर किसी हैंडसम या बेटर ग्रूम्ड व्यक्ति को खड़ा होना चाहिए था.
जवाब में उनके समर्थन में भी लोगों ने आवाजें उठाईं कि ऐसे इंटरनेशनल फोरम पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी 'मॉडल' की नहीं, बल्कि देश के सबसे तेज दिमाग, असाधारण ज्ञान और देश के प्रति निष्ठा की जरूरत होती है, जो सिद्धार्थ बाबू के पास कूट-कूट कर भरी है. वे रातों-रात लाखों यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए एक 'नेशनल आइकन' बन गए. जब ट्रोल्स को पता चला कि सिद्धार्थ कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि UPSC में ऑल इंडिया 15वीं रैंक हासिल कर चुके हैं और विदेश मंत्रालय में ऊंचे पद पर हैं तब जाकर ट्रोल्स की बोलती बंद होनी शुरू हुई.
कौन हैं सिद्धार्थ बाबू?
इस साल दूसरा मौका था जब सिद्धार्थ बाबू पीएम मोदी के साथ दिखे थे. इससे पहले 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस की परेड में सिद्धार्थ बाबू पीएम मोदी की टीम में शामिल थे. ग्लोबल डिप्लोमेसी के इतने बड़े मंच पर महाशक्तियों के बीच आत्मविश्वास से खड़े IFS सिद्धार्थ बाबू की कहानी एक दिन में नहीं लिखी गई. इसकी शुरुआत हुई केरल के कोच्चि के एक मिडिल क्लास फैमिली से. सिद्धार्थ का बचपन कोच्चि में बीता. सिद्धार्थ ने बचपन से यही सीखा कि पढ़ना-लिखना ही है. पढ़-लिखकर ही वो सब हासिल करना है जो चाहिए. स्कूलिंग के समय सिद्धार्थ का इंटरेस्ट अलग-अलग भाषाएं सीखने-समझने में जागा जिसने आगे चलकर उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी.
सिद्धार्थ को अपनी लाइफ में जो कुछ करना था वो इंजीनियरिंग करके करना था. स्कूलिंग के बाद उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की. इंजीनियरिंग पूरी करते ही उनका चयन देश की बड़ी आईटी और ई-कॉमर्स कंपनियों में हो गया. सिद्धार्थ बाबू की जिंदगी आगे बदलने से वो सारी डिटेल अब पब्लिक नहीं है. कॉर्पोरेट सेक्टर में कुछ समय तक शानदार नौकरी करने और बेहतरीन करियर बनाने के बावजूद, सिद्धार्थ का मन बंद केबिनों में नहीं लगा. उनके भीतर देश के लिए कुछ बड़ा करने और अंतरराष्ट्रीय मामलों को समझने का एक गहरा जुनून था.
दूसरे अटेम्प्ट में किया UPSC क्लियर, IAS के जगह चुना IFS
इसी जुनून के चलते उन्होंने अपनी अच्छी-खासी कॉर्पोरेट करियर छोड़ दिया. जुट गए देश की सबसे कठिन परीक्षा यूपीएससी पास करने में. पहले अटेम्ट में असफलता हाथ लगी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. अपनी कमियों को सुधारा. 2016 की सिविल सेवा परीक्षा में दूसरे अटेम्ट में ऑल इंडिया 15वीं रैंक (AIR 15) हासिल कर इतिहास रच दिया. अमूमन इस रैंक पर लोग आईएएस (IAS) बनकर देश में प्रशासनिक पॉवर चुनते हैं, लेकिन सिद्धार्थ ने अपनी रुचि के चलते देश की सेवा विदेशी धरती पर करने के लिए जानबूझकर भारतीय विदेश सेवा (IFS) को चुना.
कैसे बने एक डिप्लोमेटिक एसेट?
आईएफएस ज्वाइन करने के बाद उनके शानदार करियर की शुरुआत हुई. चीन की पोस्टिंग के कारण विदेश मंत्रालय ने उन्हें मंदारिन यानी चीनी भाषा सीखने के लिए कहा. चीन के बीजिंग में इंडियन डिप्लोमेट के तौर पर करीब 4 साल तक पोस्टेड रहे. करियर ब्रेक लिया और आगे हायर स्टडीज के लिए अमेरिका चले गए. कैलिफोर्निया के मिडलबरी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज (Middlebury Institute) से 'लैंग्वेज इंटरप्रिटेशन और ट्रांसलेशन' में मास्टर्स डिग्री हासिल की. उस एक डिग्री ने उन्हें देश का दुर्लभ डिप्लोमेटिक एसेट बना दिया.
पीएम मोदी, पुतिन और जिनपिंग के साथ दिखने से पहले सिद्धार्थ बाबू देश के आम अफसर, आम डिप्लोमेट हुआ करते थे. ऐसे किसी आम अफसर की पर्सनल और प्राइवेट लाइफ में क्यों ही किसी का इंटरेस्ट होगा. सिद्धार्थ बाबू सोशल मीडिया पर रील बनाने वाले अफसर भी नहीं रहे इसलिए चर्चाओं और वायरलिटी से दूर रहे. विदेश मंत्रालय में संवेदनशील पदों पर बैठे अफसरों की पर्सनल लाइफ वैसे भी ढेर सारी बंदिशों और प्रोटोकॉल से बंधी होती है. वैसे शादीशुदा हैं और दिल्ली में परिवार के साथ रहते हैं.
पीएम के लिए कितने जरूरी हैं सिद्धार्थ बाबू?
सिद्धार्थ बाबू आईएफएस भी हैं, विदेश मंत्रालय के अफसर भी और Diplomatic Interpreter या दुभाषिया भी. ऐसे दुभाषियों के बिना दुनिया के नेताओं के बीच बातचीत नहीं हुआ करती है. धाकड़ Diplomatic Interpreter या दुभाषिया बने सिद्धार्थ बाबू इसलिए पीएम मोदी,चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, पुतिन के बीच तब मौजूद रहे जब कोई अलाउड नहीं होता. जब पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत होती है, तो वहां एक-एक शब्द, एक-एक विराम और लहजे (Tone) का मतलब युद्ध या शांति, या अरबों डॉलर के समझौतों से जुड़ा हो सकता है. सिद्धार्थ बाबू सिर्फ भाषाओं का अनुवाद नहीं करते, वे प्रधानमंत्री तक चीनी भाषा में बोली गई की कूटनीतिक बारीकियों(Diplomatic Nuances) को हूबहू पहुंचाते हैं.
क्या होता ऐसे अफसरों का प्रोटोकॉल?
अब सवाल उठता है कि पीएम मोदी के इतने करीब रहने वाले इन आईएफएस (IFS) अफसरों का प्रोटोकॉल और सुरक्षा चक्र क्या होता है? कूटनीतिक गलियारों और वियना कन्वेंशन (Vienna Convention 1961) के नियमों के मुताबिक, सिद्धार्थ बाबू जैसे दुभाषियों का प्रोटोकॉल बेहद सख्त और गोपनीय होता है. सिद्धार्थ बाबू या उन जैसे अफसर जिन वार्ताओं का हिस्सा होते हैं, वे देश की सबसे बड़ी सीक्रेट होती है. प्रोटोकॉल के तहत वो ऐसी किसी बातचीत के नोट्स या जानकारी किसी के साथ, यहां तक कि अपने परिवार के साथ भी साझा नहीं कर सकते.
प्रोटोकॉल है कि जब दो देशों के प्रमुख 'वन-ऑन-वन' या द्विपक्षीय वार्ता करते हैं, तो इंटरप्रेटर को ठीक नेता के पीछे या बगल में खड़े रहने की अनुमति होती है ताकि आवाज स्पष्ट सुनाई दे. सुरक्षा एजेंसियां उनका बैकग्राउंड चेक और क्लीयरेंस महीनों पहले करती हैं. एक आईएफएस अधिकारी के रूप में सिद्धार्थ बाबू के पास डिप्लोमेटिक पासपोर्ट मिला है. अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर उन्हें सामान्य यात्रियों से अलग विशेष इमिग्रेशन और सुरक्षा छूट मिलती है. विदेशी दौरों पर उन्हें वियना कन्वेंशन के तहत कानूनी छूट (Immunity) प्राप्त होती है, यानी विदेशी धरती पर उन्हें गिरफ्तार या मजबूर नहीं किया जा सकता.
सिद्धार्थ बाबू की यह कहानी सिर्फ एक अधिकारी के वायरल होने की कहानी नहीं है. यह कहानी है उस बदलते भारत की, जहां एक आम परिवार का लड़का अपनी मेहनत और भाषा की ताकत के बल पर दुनिया के सबसे शक्तिशाली मंच पर भारत की आवाज और कान बनता है. जब अगली बार आप प्रधानमंत्री मोदी को वैश्विक मंचों पर गरजते या किसी विदेशी नेता से गुप्त मंत्रणा करते देखें, तो याद रखिएगा कि उस संवाद को मुकम्मल बनाने के लिए सिद्धार्थ बाबू जैसे कई 'साइलेंट वॉरियर्स' देश के लिए चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं.
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