दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका से प्रदर्शन को लेकर कई सवाल किए. अदालत ने पूछा कि जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की अधिसूचित सूची से हटा दिया गया था, तो वे वहां क्यों गए? कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि बॉन्ड देने के बाद उसे तोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी और जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने के बजाय सीधे हाई कोर्ट का रुख क्यों किया गया.
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सुनवाई के दौरान अदालत ने बैरिकेड तोड़ने, पुलिस की अनुमति और शांति व्यवस्था बनाए रखने जैसे मुद्दों पर भी टिप्पणी की. दोनों नेताओं ने बाद में हाई कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली.
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने क्यों गए?
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने सौरव दास और आशुतोष रांका से पूछा कि जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफाई कर दिया गया था, तो वे वहां क्यों पहुंचे. अदालत ने यह भी पूछा कि क्या इस फैसले पर कोई रोक लगी हुई थी.
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि प्रतिबंधित अधिसूचना के बावजूद वहां जाना कितना गंभीर है. अदालत ने BNSS की धारा 492 के तहत कार्रवाई शुरू किए जाने की संभावना का भी जिक्र किया.
बॉन्ड तोड़ने और 'रिजीम चेंज' के नारे पर सवाल
दिल्ली हाई कोर्ट ने पूछा कि बॉन्ड देने के बावजूद उसका उल्लंघन क्यों किया गया. अदालत ने यह भी सवाल किया कि प्रदर्शन के दौरान 'रिजीम चेंज' का नारा क्यों दिया जा रहा था.
कोर्ट ने कहा कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) को शांति भंग होने की आशंकाओं पर विचार करना होता है. सुनवाई के दौरान अदालत ने आरोपियों से उनकी पहचान, संगठन और उसके उद्देश्य के बारे में भी सवाल किए.
जिला मजिस्ट्रेट के पास क्यों नहीं गए?
हाई कोर्ट ने CJP से पूछा कि उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट के सामने पुनरीक्षण याचिका क्यों नहीं दायर की. अदालत ने कहा कि उनके पास वैकल्पिक कानूनी रास्ते उपलब्ध थे.
याचिकाकर्ताओं के वकील अभीक चिमनी ने बताया कि याचिका 19 अक्टूबर को SEM कोर्ट की ओर से पारित आदेश को रद्द करने के लिए दाखिल की गई थी. इस आदेश में सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ा दी गई थी.
हाई कोर्ट ने सवाल किया कि जब मामला उसी दिन सुनवाई के लिए लगा था, तो जल्दबाजी में यहां आने की क्या जरूरत थी. अदालत ने सुझाव दिया कि याचिका वापस लेकर पहले SEM कोर्ट में होने वाली कार्यवाही देखी जा सकती है. जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने का विकल्प भी मौजूद था.
CJP के वकील ने दलील दी कि यह देखना जरूरी है कि कानून को किस तरह लागू किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि धारा 135 के तहत दो बार कार्यवाही लागू की गई थी.
बैरिकेड तोड़ने पर हाई कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रदर्शन स्थलों पर बैरिकेडिंग के उद्देश्य को समझाया. कोर्ट ने कहा कि बैरिकेड किसी खास मकसद से लगाए जाते हैं. जब प्रदर्शनकारी इन्हें तोड़ते हैं, तो वहां और लोगों के पहुंचने की आशंका बढ़ जाती है. इनमें ऐसे लोग भी हो सकते हैं, जिन पर प्रदर्शन आयोजकों का नियंत्रण न हो.
अदालत ने विदेश में हो रहे प्रदर्शनों का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार छात्र आंदोलन के रूप में शुरू हुआ विरोध आगजनी और लूटपाट तक पहुंच जाता है.
कोर्ट ने कहा कि पुलिस से अनुमति लेने का उद्देश्य केवल प्रदर्शनकारियों को रोकना नहीं है. इसका मकसद यह भी है कि दूसरे लोग प्रदर्शन में शामिल होकर हालात बिगाड़ें नहीं और आयोजकों की छवि को नुकसान न पहुंचे.
'दो किलोमीटर दूर जाने में क्या दिक्कत है?'
दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रदर्शन स्थल को लेकर भी सवाल उठाए. अदालत ने कहा कि प्रदर्शन करने के लिए दो किलोमीटर दूर किसी दूसरे स्थान पर जाने में कोई खास अंतर नहीं होना चाहिए. कोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ताओं के पास दूसरे कानूनी विकल्प भी उपलब्ध थे.
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की अधिसूचित सूची से हटाया है. इसके बाद रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के एक मैदान को प्रदर्शन के लिए निर्धारित किया गया है.
'आप जेन-जी नहीं, मिलेनियल्स हैं'
सुनवाई के दौरान अदालत ने आरोपियों की उम्र भी पूछी. उनके वकील ने बताया कि सौरव दास की उम्र 27 साल और आशुतोष रांका की उम्र 31 साल है. इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि वे जेन-जी नहीं, बल्कि मिलेनियल्स हैं. कोर्ट ने कहा कि शुरुआत में यह छात्रों का विरोध प्रदर्शन था और उसमें बच्चे भी शामिल थे, लेकिन अब मुद्दा बदल गया है.
अदालत ने आगे पूछा कि दोनों नेता कौन हैं, उनकी पहचान क्या है और वे किस संगठन से जुड़े हैं. कोर्ट ने कहा कि जब शांति और सौहार्द्र भंग होने की आशंका होती है, तब संगठन की पहचान और उसके उद्देश्य जैसे सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं.
'तब तक हम कॉफी पीकर आते हैं'
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ताओं के वकील से अपने मुवक्किलों से बात करने को कहा. कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब तक वह बाहर जाकर एक कप कॉफी पीकर आती है, तब तक वकील अपने मुवक्किलों से चर्चा कर लें. इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका ने दिल्ली हाई कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली.
नेहा बोरा की याचिका पर कल सुनवाई
सुनवाई के दौरान नेहा बोरा की याचिका का भी जिक्र हुआ. उनके वकील ने 24 अक्टूबर से पहले सुनवाई की मांग की, क्योंकि उन्हें SEM की अदालत में भी पेश होना था. इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि उनकी याचिका पर अगले दिन सुबह 10:30 बजे सुनवाई होगी.
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