बीमार पति के साथ बस में सफर कर रही बुजुर्ग का छूट गया पैसों से भरा थैला, 2 साल बाद उन्हीं पैसों के मिलने की गजब है कहानी

न्यूज तक डेस्क

07 Aug 2026 (अपडेटेड: Aug 7 2026 8:36 PM)

महाराष्ट्र के वाशिम में बस में छूटे 24 हजार रुपये 2 साल बाद बुजुर्ग महिला को वापस तो मिले पर इसकी गजब कहानी चर्चा में आ गई. कंडक्टर राजू वाणी की मुलाकात महिला से 2 साल बाद कैसे हुई और कैसे आधार कार्ड ने राजू को सब याद दिलाया.

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बुजुर्ग ने राजू को 1100 रुपए इनाम में दिए.
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कहानी में यदि सस्पेंस या कोई अजब इत्तेफाक न हो तो वो कहानी बड़ी सीधी-सपाट लगती है. पर महाराष्ट्र के वाशिम जिले की ये कहानी सीधी सपाट नहीं बल्कि दिलचस्प है. इस कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है जो उसे पूरी तरफ फिल्मी बना देता है. कहानी शुरू होती है 2 साल पहले अप्रैल 2024 के एक सफर से और कहानी का अंत होता है अगस्त 2026 के एक सफर से. तो चलिए...चलते हैं अप्रैल 2024 के बस के उस सफर में. 

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महाराष्ट्र के वाशिम जिले में एक बस संभाजी नगर से वाशिम वाले रूट पर बस जा रही थी. एक बुजुर्ग महिला अपने बीमार पति के साथ बस में सवार हुई. बस कंडक्टर राजू वाणी उनके पास पहुंचे और पूछा- माता जी कहां जाना है ? महिला ने कहा- दो टिकट मालेगांव सिटी के दे दो. राजू ने टिकट काटा और दूसरे यात्रियों के टिकट लेने में व्यस्त हो गए. इधर मालेगांव आया और बुजुर्ग महिला अपने पति के साथ उतर गईं. बस बाकी सवारियों को उनके गंतव्य पहुंचाती हुई वाशिम पहुंची. ये आखिरी स्टॉप था. बस डिपो में गई. 

बस छोड़ने से पहले राजू ने एक और ड्यूटी निभाई 

एक नियम के मुताबिक जब भी बस डिपो में जाती है तो कंडक्टर को एक बार बस की पूरी चेकिंग करनी होती है. वो इसलिए कि शायद किसी यात्री का सामान छूट गया हो तो वो उसे निकालकर पूछताछ केंद्र पर जानकारी दे दें और सामान को सुरक्षित रख दें ताकि पैसेंजर सामान के लिए आए तो उसे मिल जाए. राजू ने भी ऐसा ही किया. चेक करते-करते राजू उस सीट तक पहुंचे जहां बुजुर्ग महिला अपने पति के साथ बैठी थीं. वहां एक थैला पड़ा था. 

थैले में पैसों का बंडल और एक कागज मिला 

राजू ने थैला देखा. उसमें नोटों का बंडल था. कुल 24 हजार रुपए थे. बंडल के साथ एक पर्ची थी. वो एक मेडिकल की पर्ची थी जिसपर नाम लिखा था- "कासाबाई गायकवाड". राजू थैला लेकर नीचे उतरे और पूछताछ केंद्र पर गए. वहां उन्होंने सूचना दे दी कि किसी यात्री का थैला छूटा है जिसमें 24 हजार रुपए हैं. नाम है- "कासाबाई गायकवाड". यदि वो आएं तो उन्हें बता दिया जाए ताकि उनका थैला वापस किया जा सके. 

राजू ने काफी इंतजार किया पर किसी ने थैले के बारे में पूछताछ नहीं की. दिन बीते-हफ्ते और महीने बीतने लगे. राजू ने पर्ची पर लिखे कॉन्टैक्ट नंबर पर बात करने की कोशिश की पर बात बनी नहीं. खैर थैला राजू के पास वैसे ही पड़ा रहा इस इंतजार में कि आज नहीं तो कल थैले वाला संपर्क करेगा ही. इस बात को धीरे-धीरे दो साल बीत गए. 

2 साल बाद आधार कार्ड ने महिला से मिलवा दिया 

घटना के करीब 2 साल बाद राजू वाणी अकोला से वाशिम वाले रूट पर बस में बतौर कंडक्टर ड्यूटी कर रहे थे. तारीख था 5 अगस्त दिन बुधवार. उनकी नजर एक बुजुर्ग यात्री पर पड़ी. वो करीब 75 वर्ष की थीं. चूंकि गर्वनमेंट बस में बुजुर्ग लोगों का टिकट नहीं लगता है, लेकिन आधार कार्ड की डिटेल कंडक्टर को लेनी पड़ती है अपने डेटा के लिए. ऐसे में राजू ने भी महिला से आधार कार्ड मांगा. आधार कार्ड पर नाम था-  "कासाबाई गायकवाड". इन्हें जाना भी मालेगांव तक ही था. ये दो बातें राजू को 2 साल पहले अप्रैल महीने की उस घटना तक ले गईं. राजू को जैसे ही वो बात याद आई तो उन्होंने बुजुर्ग से पूछ लिया- 2 साल पहले आप अपने पति के साथ इसी बस में घर जा रही थीं. आपका कोई थैला छूट गया था ? बुजुर्ग ने कहा- हां बेटा. पति बीमार थे. थैले में पैसे लिए थे उनके इलाज के लिए. 

2 साल बाद मिला पैसों वाला थैला तो भर आई आंखें 

कंडक्टर राजू वाणी महिला को लेकर वाशिम के बस डिपो पहुंचे. उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारी से उनके बारे में पूरी बात बताई. अच्छी तरह से छानबीन के बाद महिला के पैसे जो अब तक अकोला डिविजन मे रखे हुए थे, उन्हें वापस कर दिये गए. 2 साल बाद वही पैसों से भरा थैला हाथों में था जिसकी उम्मीद वो पूरी तरह खो चुकी थीं. उनकी आंखें छलक आईं. वो कंडक्टर राजू वाणी की तरफ देखते हुए इमोशनल हो गईं. उन्होंने कहा कि आज भी राजू जैसे लोग इस दुनिया में हैं. अच्छाई अभी भी है. उन्होंने राजू का उपकार मानते हुए उन्हें 1100 रुपए का एक छोटा गिफ्ट अपनी तरफ से दिया और बोली कि वो बहुत खुश हैं. उन्होंने राजू को ढेर सारी दुआएं भी दीं. 

ये सब देख वहां लोग कहने लगे- "जिसे रब रखे उसे कौन चखे ". अब तो राजू की चर्चा खूब हो रही है.

इनपुट: जाका खान

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