दिल्ली के मावलंकर हॉल में रचनात्मक कांग्रेस के सम्मेलन के मंच पर राहुल गांधी और कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित के बीच हुए एक एक्ट ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है. मोदी सरकार की विदेश नीति पर तंज कसने के लिए राहुल गांधी ने जैसे ही मंच पर संदीप दीक्षित को गले लगाया, वैसे ही संदीप दीक्षित ने कुछ ऐसा कह दिया जिससे खुद राहुल गांधी भी एक पल के लिए सकपका गए. संदीप दीक्षित ने बोलते हुए राहुल को रोककर कह दिया कि मेलोनी समझकर तो नहीं पकड़ा था? राहुल गांधी समझ गए तो जो हुआ उसमें सब ठीक नहीं हुआ. उन्होंने मुस्कुराकर इतना ही कहा कि मैं अभी उस स्टेज तक नहीं पहुंचा हूं.
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राहुल गांधी सरकार की विदेश नीति और विदेशी राष्ट्राध्यक्षों से गले मिलने के अंदाज पर प्रहार कर रहे थे. लाइव डेमो देने के लिए संदीप दीक्षित को जोर से गले लगा लिया. मामला तब बिगड़ा जब संदीप दीक्षित ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का नाम घसीट कर माहौल को बदल दिया. मेलोनी वाला कॉमेंट सुनते ही ऑडिटोरियम में ठहाके तो लगे लेकिन ये हंसी मजाक राहुल गांधी और संदीप दीक्षित को उल्टा पड़ गया. बीजेपी ने महिला राष्ट्राध्यक्ष का घोर अपमान और बेहद स्तरहीन राजनीति करार दिया है. जॉर्जिया मेलोनी कोई साधारण नहीं, इटली की प्रधानमंत्री हैं. भारत में उनकी पहचान सिर्फ इटली पीएम की नहीं, पीएम मोदी के साथ शानदार कूटनीतिक ट्यूनिंग और वायरल सोशल मीडिया केमिस्ट्री के लिए है.
कौन हैं चर्चित चेहरा संदीप दीक्षित
आखिर कौन हैं चर्चित चेहरा संदीप दीक्षित, क्या है रचनात्मक कांग्रेस और क्यों इस बार उनके एक मजाक ने राहुल गांधी को असहज किया हुआ है. जो कुछ हुआ वो रचनात्मक कांग्रेस के स्टेज पर हुआ. रचनात्मक कांग्रेस राहुल का आउटरीच प्लान है जिसे संदीप दीक्षित हेड कर रहे हैं. कांग्रेस के इस एंबिशियस प्रोजेक्ट में जोश भरने राहुल गांधी पहुंचे लेकिन एट द एंड हेडलाइन मेलोनी वाले विवादित बयान को मिल गईं. जिम्मेदारी आ गई संदीप दीक्षित पर.
संदीप दीक्षित का सबसे बड़ा परिचय ये है कि वो दिल्ली में 15 साल तक सीएम रहीं शीला दीक्षित के बेटे हैं. दिल्ली के मॉडर्न स्कूल और सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में मास्टर्स करने वाले संदीप ने गुजरात के इरमा (IRMA) से रूरल मैनेजमेंट में पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है. सक्रिय राजनीति में आने से पहले करीब 15 साल तक मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के ग्रामीण इलाकों में सामाजिक विकास, मानवाधिकार और एनजीओ सेक्टर में काम कर रहे थे.
संदीप दीक्षित के परिवार का इतिहास भारतीय राजनीति के प्रभावशाली परिवारों में से एक है. दीक्षित परिवार कश्मीरी पंडित है. संदीप दीक्षित को 'दीक्षित' सरनेम मां शीला दीक्षित से मिला. शादी से पहले शीला दत्त ने स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पंडित उमाशंकर दीक्षित के बेटे विनोद दीक्षित से शादी की. विनोद दीक्षित का कम उम्र में 1987 में ट्रेन यात्रा के दौरान निधन हो गया. इसके बाद शीला दीक्षित ने अकेले संदीप और उनकी बहन लतिका की परवरिश की. उमाशंकर दीक्षित की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया.
सेंट स्टीफंस कॉलेज में उनकी मोना से मुलाकात
संदीप दीक्षित की पत्नी मोना दीक्षित हैं. दोनों की मुलाकात सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाई के दौरान हुई थी. मोना गैर-कश्मीरी/गैर-ब्राह्मण परिवार से हैं. कॉलेज के दिनों में शुरू हुआ प्यार तब और परवान चढ़ा जब दोनों ने सामाजिक विकास में एक साथ काम करने का फैसला किया. संदीप बाद में राजनीति में आए. मोना दीक्षित लाइमलाइट और राजनीति से कोसों दूर रहती हैं.
लुटियंस दिल्ली के बड़े और आलीशान राजनीतिक परिवारों के मुकाबले संदीप दीक्षित की घोषित संपत्ति चौंका सकती है. चुनावी हलफनामों के मुताबिक, संदीप दीक्षित ने पैसे-प्रॉपर्टी नहीं बनाए. संपत्ति का बड़ा हिस्सा मां शीला दीक्षित से मिला. संदीप की बारे में कहा जाता है कि निजी लाइब्रेरी में रखी हजारों दुर्लभ किताबें हैं. एकदम सादगी वाले नेता हैं.
शीला दीक्षित के कांग्रेस में बड़ा नाम और सीएम होने से संदीप दीक्षित के लिए राजनीति में आना आसान रहा. पहली बार में ही उन्होंने 2004 में लोकसभा चुनाव ईस्ट दिल्ली सीट से जीता और जीतकर सांसद पहुंच गए. मां के रास्ते संदीप राजनीति में आए लेकिन आगे का रास्ता खुद बनाते रहे. 2009 में दोबारा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे. मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री तो नहीं बने लेकिन राहुल गांधी की टीम के सदस्य रहे. 2012 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के दौरान लोकसभा में कांग्रेस के चीफ व्हिप जैसी बड़ी पोस्ट भी संभाली. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बने.
संदीप दीक्षित की राजनीति में कोई अड़चन नहीं थी
कांग्रेस के सत्ता में रहने और मां के दिल्ली सीएम रहते संदीप दीक्षित की राजनीति में कोई अड़चन नहीं थी लेकिन अचानक उनकी राजनीति झटके खाने लगे. 2013 में शीला दीक्षित की सरकार गई. 2014 में यूपीए चुनाव हारी. संदीप दीक्षित की राजनीति में भयंकर हिचकोले आने लगे. ताश के पत्तों की तरह ढह गया दीक्षित परिवार का 'साम्राज्य. 2014 की भीषण 'मोदी लहर' ने कांग्रेस के बड़े-बड़े किलों को ध्वस्त कर दिया. संदीप दीक्षित भारी अंतर से चुनाव हार गए और उनकी संसद से विदाई हो गई. आप का उदय हुआ. बीजेपी तेजी से बढ़ी लेकिन कांग्रेस तीसरे नंबर पर चली गई.
2013 में मां की सत्ता जाना और 2014 में खुद बेटे की सांसदी चले जाना—यह दीक्षित परिवार के लिए एक ऐसा दोहरा राजनीतिक झटका था जिससे उबरना मुमकिन नहीं था. मुख्यमंत्री आवास खाली हो चुका था और लुटियंस दिल्ली के सरकारी बंगले छिन चुके थे. दिल्ली में कांग्रेस पूरी तरह से 'लीडरलेस' हो गई. संदीप दीक्षित के पास न कोई पद बचा र न ही कोई मजबूत राजनीतिक जमीन.
2013-2014 की इस बर्बादी के बाद कांग्रेस के भीतर ही दीक्षित परिवार के विरोधियों ने सिर उठा लिया. दिल्ली हाईकमान तक ये बात पहुंचाई गई कि शीला दीक्षित के अहंकार और संदीप दीक्षित की एलीट लाइफस्टाइल की वजह से ही दिल्ली में पार्टी डूबी. राहुल गांधी की टीम से संदीप दीक्षित दूर होने लगे. अचानक होने वाली उपेक्षा से संदीप दीक्षित धीरे-धीरे कांग्रेस में बागी होने लगे.
संदीप दीक्षित को कांग्रेस का वो 'बागी बुद्धिजीवी' माना जाता है जो किसी के सामने नहीं झुकते. जब कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही थी, तब पार्टी के 23 सीनियर नेताओं जिन्हें G-23 गुट कहा गया ने सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर पार्टी में बड़े बदलावों की मांग की थी. संदीप दीक्षित खुलकर इस गुट के साथ तो नहीं दिखे, लेकिन वे इसके सबसे बड़े वैचारिक समर्थक बनकर उभरे. हालात ऐसे बने कि संदीप दीक्षित सालों के लिए कांग्रेस की मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स से अघोषित वनवास में भेज दिए गए.
दिल्ली में उनकी मौजूदगी का एहसास
संदीप शायद ये मानते रहे कि उन्हें और मां को इस हाल में पहुंचाने के लिए जिम्मेदार अगर कोई है तो अरविंद केजरीवाल हैं. कांग्रेस में साइडलाइन रहे लेकिन दिल्ली में उनकी मौजूदगी का एहसास पार्टी को रहा. दिल्ली कांग्रेस के कई बड़े दिग्गज पार्टी से चले गए. कई बड़े नेता चुनाव लड़ने से भी कतराने लगे. बड़े लीडर्स का एक वैक्यूम पैदा हुआ. फिर भी संदीप दीक्षित ने दिल्ली में कांग्रेस को नहीं छोड़ा.
2025 में जब दिल्ली में चुनाव आए तो कांग्रेस को संदीप दीक्षित ही सबसे मजबूत लगे केजरीवाल के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए. हालांकि संदीप दीक्षित केजरीवाल से बदला चुका नहीं चके. उन्होंने कभी केजरीवाल को माफ नहीं किया. मानहानि का दावा ठोंकने से लेकर आप-कांग्रेस के अलायंस के विरोध तक संदीप दीक्षित ने बार-बार पार्टी की लाइन लांघी.
उनका मेरिट ये कि सबके बाद भी कांग्रेस में बने रहे. राहुल गांधी ने उन्हें साइड में डालकर छोड़ नहीं दिया. रचनात्मक कांग्रेस कांग्रेस में जोरदार वापसी का मौका बना. जिस 'रचनात्मक कांग्रेस' के मंच पर यह ताजा 'मेलोनी' विवाद हुआ, उसकी अपनी एक अलग इनसाइड स्टोरी है. दरअसल, राहुल गांधी लंबे समय से महसूस कर रहे थे कि कांग्रेस केवल एक 'चुनावी मशीन' बनकर रह गई है और उसका समाज के बुद्धिजीवियों, एनजीओ और सोशल एक्टिविस्ट्स से संपर्क टूट चुका है. संदीप दीक्षित ने रूरल मैनेजमेंट (IRMA) की पढ़ाई की है और वे खुद सालों तक एनजीओ सेक्टर में रहे हैं, इसलिए इस विंग की कमान उन्हें सौंपी गई.
बीजेपी की चपेट में राहुल
संदीप दीक्षित के आयोजित कार्यक्रम में राहुल गांधी आए लेकिन आते ही ऐसा बम फूटा जिसने खामखाह राहुल गांधी को फंसा दिया. हो सकता है पीएम की विदेश नीति पर सवाल उठाने के लिए गले मिलना का एक्ट की बस चर्चा होती. संदीप दीक्षित ने मेलोनी को घसीटकर राहुल के एक्ट को ही विवादित बना दिया. बीजेपी की चपेट में राहुल आए तो संदीप दीक्षित के चलते. अगर ऑन द स्पॉट संदीप दीक्षित को टोक देते या रिग्रेट कर देते तो शायद मामला इतना आगे नहीं बढ़ता लेकिन वो बस मुस्कुराकर रह गए.
संदीप दीक्षित का विवादों से नाता नया नहीं है. 2017 में उन्होंने एक ऐसा बयान दिया था जिससे पूरी कांग्रेस पार्टी कांप गई थी. तब एक इंटरव्यू के दौरान पाकिस्तान सेना की हरकतों पर बात करते हुए संदीप दीक्षित ने तत्कालीन भारतीय थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत की तुलना सड़क वाले गुंडे से की थी. तब भी उस बयान ने ऐसा भूचाल लाया कि खुद राहुल गांधी को संदीप दीक्षित की क्लास लगानी पड़ी. राहुल गांधी ने कड़े शब्दों में कहा था कि सेनाध्यक्ष भारत की सेना के प्रमुख हैं और किसी भी राजनीतिक प्रतिनिधि को उन पर ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए. लिखित में माफी मांगकर छूटे से संदीप.
सड़क का गुंडा' वाले बयान से लेकर 'मेलोनी' तक का सफर गवाह है कि संदीप दीक्षित की जुबान जब भी फिसलती है, तो दिल्ली से लेकर इटली तक उसकी गूंज सुनाई देती है. अब बड़ा सवाल यह है कि राहुल गांधी ने जिस भरोसे के साथ संदीप दीक्षित को 'रचनात्मक कांग्रेस' का जिम्मा सौंपकर पार्टी को मेनस्ट्रीम में लाने का टास्क दिया था, क्या इस ताजा बखेड़े के बाद संदीप दीक्षित उस भरोसे पर कायम रह पाएंगे? या फिर एक बार फिर उन्हें पार्टी की मुख्यधारा से किनारे कर दिया जाएगा?
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